लॉकडाउनः बड़े बिजनेस ग्रुप अभी से अपनी जिम्मेदारी से झाड़ने लगे पल्ला, छोटे साझेदारों को झटका लगना शुरू

कोरोना संकट के बहाने फोर्स मैज्योर के क्लॉज के आधार पर अनुबंध की बाध्यताओं से मुकरा नहीं जा सकता। फोर्स मैज्योर क्लॉज को अमल में लाने के लिए जरूरी है कि कोरोना संक्रमण के कारण सरकार कोई कानून बनाए, जिसके तहत अनुबंध के तहत भुगतान की बाध्यता खत्म कर दी जाए।

फोटोः सोशल मीडिया
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मोहन गुरुस्वामी

बीते हफ्ते 3 अप्रैल के इकोनॉमिक्स टाइम्स में एक रिपोर्ट छपी थी कि रिलायंस, फ्यूचर ग्रुप, मैकडोनाल्ड्स, डोमिनो पिज्जा जैसे देशव्यापी नेटवर्क वाले तमाम जाने-माने रिटेल चेन ने अप्रत्याशित घटना (फोर्स मैज्योर) क्लॉज की आड़ में अपने व्यावसायिक उत्तरदायित्वों से पीछा छुड़ाने की तैयारी कर ली है। ये कंपनियां चेन के अपने छोटे-छोटे सहयोगियों को इस आशय के नोटिस भेज रही हैं और ये लोग विरोध करने की स्थिति में नहीं हैं।

यह जानना दिलचस्प होगा कि क्या रिलायंस और एयरटेल यह कहकर टेलीकॉम स्पेक्ट्रम के बकाये के भुगतान में असमर्थता जता देंगी कि उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं? या क्या प्रिंस मोहम्मद बिन सालेम पहले हो चुके तेल सौदे के भुगतान से पीछे हटने की किसी भी कोशिश को स्वीकार कर लेंगे?

बहरहाल, वह दिन दूर नहीं जब तमाम कंपनियां यही हथकंडा अपनाएंगी। आमतौर पर ऑटो कंपनियां अपना शोरूम चलाती हैं और ऑयल मार्केटिंग कंपनियां समेत तमाम अन्य कंपनियां भी ऐसा ही करती हैं। हमारे कई बड़े व्यापारिक घराने रिटेल में बड़े पैमाने पर काम कर रहे हैं। जैसे क्रोमा के जरिये टाटा समूह और स्पेंसर्स के जरिये गोयनका। गोदरेज, सैमसंग और एलजी ने अपने उत्पादों की बिक्री के लिए देशभर में अपना नेटवर्क बना रखा है। इन कंपनियों ने बाजार में ऐसी पकड़ बना रखी है कि इनके शोरूम किसी मॉल या मार्केट की पहचान बन जाते हैं और इस खूबी के कारण उन्हें अपेक्षाकृत कम किराये पर जगह मिल जाती है।

ये कंपनियां माल खरीद मैनुअल, 2017 में फोर्स मैज्योर की परिभाषा के बारे में 19.02.2020 को वित्त मंत्रालय की ओर से जारी पत्र का हवाला दे रही हैं। लेकिन गौर करने वाली बात है कि यह मैनुअल वस्तु एवं सेवाओं के बारे में भारत सरकार से ठेका लेने के संदर्भ में है और निजी ठेकों में फोर्स मैज्योर का क्लॉज अलग से लागू नहीं होता। सरकारी अनुबंधों की तरह निजी अनुबंधों के संदर्भ में सरकार या किसी सरकारी एजेंसी ने भुगतान संबंधी बाध्यताओं को पूरा करने पर किसी भी कानून, अधिसूचना, नियम या अध्यादेश के जरिये रोक नहीं लगाई है।

निश्चित तौर पर कोविड-2019 एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है और राज्य तथा केंद्र सरकारों ने इसके लिए तमाम कदम उठाए हैं। लेकिन सरकार के ये तमाम आदेश शैक्षणिक संस्थाओं, थिएटर, समारोह स्थलों पर ही लागू होते हैं।

कुछ भी हो, मोटे तौर पर कोविड-19 वायरस को बहाना बनाकर फोर्स मैज्योर के क्लॉज के आधार पर अनुबंध की बाध्यताओं से मुकरा नहीं जा सकता। फोर्स मैज्योर क्लॉज को अमल में लाने के लिए जरूरी है कि कोरोना वायरस के संक्रमण के कारण सरकार कोई कानून बनाए, जिसके तहत अनुबंध के तहत भुगतान की बाध्यता खत्म कर दी गई हो। समझौतों के फोर्स मैज्योर क्लॉज में स्पष्ट तौर पर लिखा गया है कि भुगतान को टाला या रोका जा सकता है, अगरः “सरकार या किसी सरकारी एजेंसी, जिसके क्षेत्राधिकार में संबंधित पक्ष आता हो, उसके द्वारा लाए गए कानून, विनियमन, अधिसूचना या अध्यादेश के अतिरिक्त उस स्थिति में जो संबंधित पक्ष के नियंत्रण के बाहर हो; बशर्ते संबंधित पक्ष ने विलंब को टालने की हरसंभव कोशिश की हो।”

भले ही कोई कंपनी यह दावा करे कि कोविड-19 से संबंधित सरकारी अधिसूचनाओं के परिणाम के तहत अनुबंधित राशि का भुगतान करना मुश्किल हो गया है, किसी भी सरकारी अधिसूचना ने कंपनियों के लिए माल और सेवाओं का लाभ उठाने से नहीं रोका या भुगतान करना असंभव नहीं बनाया। किसी कंपनी की मासिक मुनाफा कमाने की क्षमता किसी सार्वजनिक निगम की अनुबंधित राशि के भुगतान की योग्यता से नहीं जुड़ी है।

लॉकडाउन की अधिसूचना के बाद भी इन कंपनियों ने वर्तमान या भविष्य की बिक्री के लिए वाणिज्यिक वस्तुओं के भंडारण के लिए अपने परिसरों का उपयोग जारी रखा हुआ है। उदाहरण के लिए, अधिकांश रिटेल कंपनियां सभी जगहों के लिए ऑनलाइन ऑर्डर और भुगतान ले रही हैं। अभी देशभर में जारी लॉकडाउन के दौरान डिलीवरी देकर बिक्री पूरा नहीं कर पाने के बावजूद ये कंपनियां अपने परिसरों में पड़े उत्पादों के लिए भी पैसे प्राप्त कर रही हैं।

तो स्पष्ट है कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है जो किराये का भुगतान असंभव बना दे। बिजनेस में आने वाला कोई भी अस्थायी व्यवधान रिस्क इंश्योरेंस से कवर होता है, जो लोग लेते ही हैं। किराये के बोझ से पल्ला झाड़ने के लिए यह दलील नहीं दी जा सकती कि कोविड-2019 से बचाव के लिए उठाए गए कदमों के कारण उसके लिए व्यापार के अवसर घट गए।

इस संदर्भ में 2003 में आई महामारी सार्स के दौरान के अदालती फैसलों पर गौर करना चाहिए। तब अदालत ने किरायेदार को लीज एग्रीमेंट की बाध्यताओं के मुताबिक किराये के भुगतान में किसी तरह की छूट देने से इनकार कर दिया था, जबकि उस समय तो सरकार के आदेश के कारण किरायेदार को लीज पर लिए गए परिसर में प्रवेश की इजाजत भी नहीं थी। तब अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि लीज की लंबी अवधि को देखते हुए दो हफ्ता कोई बड़ा समय नहीं और यह भी कहा था कि निश्चित तौर पर सार्स एक अप्रत्याशित घटना थी लेकिन इससे “इस केस से संबद्ध पक्षों के अनुबंधित अधिकारों अथवा बाध्यताओं में कोई बड़ा बदलाव नहीं आ जाता।”

लीज एग्रीमेंट के बारे में हमारा कानून कहता है कि “जब तक लीज पर ली गई संपत्ति नष्ट या बुरी तरह तथा स्थायी तौर पर बेकार नहीं कर दी जाती, लीज पर लेने वाला इस आधार पर अपने दायित्व से नहीं मुकर सकता कि उसने जिस उद्देश्य के लिए उक्त संपत्ति लीज पर ली, उसे पूरा नहीं कर सका।” इसके अतिरिक्त अदालतों ने यह भी स्पष्ट किया था कि अगर किसी अप्रत्याशित घटना के कारण पैदा हालात के परिणामस्वरूप कोई आर्थिक दिक्कत आती भी है तो संबंधित पक्ष अपनी बाध्यताओं से पीछे नहीं हट सकता, अगर आवंटित संसाधन पर उसका आंशिक नियंत्रण भी बना रहता है।

सभी बड़ी कंपनियां मोटा मुनाफा दर्शा रही हैं। रिलायंस इंटस्ट्रीज ने 2019 मार्च में समाप्त वित्त वर्ष के दौरान कर देने के बाद 35,000 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा कमाया। इसकी सालाना रिपोर्ट भी दिखाती है कि रिलायंस रिटेल भारत की पहली रिटेल कंपनी है जिसका कारोबार 100,000 करोड़ को पार कर गया। रिलायंस रिटेल ने 2019 की तीसरी तिमाही में ही 2727 करोड़ का मुनाफा कमाया। कहा जा सकता है कि ऐसे मुश्किल वक्त में बड़े बिजनेस ग्रुप अपनी अनुबंधात्मक बाध्यताओं से पल्ला झाड़ने की फिराक में लगे हैं। उन्हें इस बात की फिक्र नहीं कि इस तरह पीछे हट जाने से उनके छोटे सहयोगियों का क्या होगा।

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