मध्य प्रदेश: 'लाड़ली बहना' के भाइयों से ही वसूली कर रही सरकार

चुनावी योजनाओं का बोझ ढोने के लिए मोहन सरकार दनादन ले रही करोड़ों का कर्ज

लाड़ली बहना योजना से मध्य प्रदेश न सिर्फ कर्ज के जाल में फंस रहा है बल्कि प्रदेश के सभी परिवारों पर करों का बोझ भी बढ़ रहा है
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मुख्यमंत्री डाॅ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली मध्यप्रदेश सरकार 2023 से ही बाजार से अधाधुंध कर्ज उठा रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि चार्वाक दर्शन पर उसकी अटूट आस्था है, जिसमें कहा गया है कि 'यावज्जीवेत् सुखं जीवेत, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत....।' मतलब, घी पीने के लिए कर्ज भी लेना पड़े तो जरूर लो, क्योंकि देह को एक दिन जलकर राख हो जाना है और उसका पुनरागमन नहीं होता।

बीजेपी सरकार को भी यही लगता है कि उसकी वापसी तो होनी नहीं है, इसलिए जितना कर्ज लिया जा सकता है, ले लिया जाए। बस, अपने सुखों और वैभव में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। इसी राह पर चलते हुए उसने गवर्नमेंट सिक्यूरिटी यानी सरकारी प्रतिभूतियों को विक्रय बेच कर 1 सितंबर, 2026 को 3,600 करोड़ रुपये का एक और नया कर्ज ले लिया है।

सरकारी प्रतिभूति (गवर्नमेंट सिक्योरिटी) केन्द्र या राज्य सरकार द्वारा जारी किया गया एक ऋण साधन (डेट इन्स्ट्रूमेंट) है, जिसके जरिये सरकार जनता या निवेशकों से अपने खर्चों और राजकोषीय घाटे को पूरा करने के लिए पैसे उधार लेती है। इसे दो भागों में लिए जाने की योजना है। पहला हिस्सा 1,600 करोड़ रुपये का होगा और उसे 18 साल की लंबी अवधि के बाद चुकाया जाएगा। इस पर ब्याज की कूपन दर 7.61 फीसदी होगी और वह साल में दो बार चुकाई जाएगी। कर्ज का दूसरा हिस्सा 2,000 करोड़ रुपये का होगा और उसे 30 साल बाद चुकाया जाएगा। इस पर भी साल में दो बार ब्याज जाएगा।

कूपन दर का मतलब है कि सरकार निवेशकों को एक निश्चित सालाना ब्याज देगी। यह ब्याज दर कर्ज की पूरी अवधि के दौरान स्थिर रहेगी। इस तरह सरकार को आने वाले तीस सालों तक हर साल ब्याज के तौर पर ही कूपन दर से 273.96 करोड़ रुपये चुकाने होंगे। सरकार ने चालू साल में अप्रैल में ही कर्ज लेने की शुरुआत कर दी थी। इस हड़बड़ी का कारण भारतीय रिजर्व बैंक की वह नई नीति है, जिसके अनुसार अब राज्यों की अनयूटिलाइज्ड लोन लिमिट (उपयोग न किए जाने वाले ऋण की सीमा) अगले साल के लिए फॉरवर्ड नहीं की जा सकेगी। यदि सरकार इस साल की 85,000 करोड़ की सीमा का उपयोग नहीं करती, तो वह पैसा लैप्स हो जाता। इसलिए, सरकार ने योजनाओं को जारी रखने के वित्त वर्ष के आरंभ में ही कर्ज उठा लिया था।

कर्ज पर सवाल उठाए जाने पर सरकार का अक्सर यही जवाब होता है कि वह विकास कार्यों के लिए कर्ज ले रही है। पर उसका ज्यादातर भाग उन मदों में खर्च होता है, जो अनुत्पादक होते हैं या चुनाव जीतने की खातिर लोगों को नकद लाभ देने के वादों को पूरा करने में खर्च किए जाते हैं।

मध्यप्रदेश की मौजूदा सरकार ने 2023 में सत्तासीन होते ही कर्ज लेना आरंभ कर दिया था। उसे ऐसा इसलिए करना पड़ा था क्योंकि पूर्ववर्ती शिवराज सिंह चैहान की सरकार पहले ही प्रदेश को भारी कर्जे में डुबा चुकी थी।

2023-24 में 5,348 करोड़, 2024-25 में 67,387 करोड़, 2025-26 में 85,076 और 2026-27 में 1,10,000 करोड़ रुपये कर्ज लिए गए। मध्य प्रदेश का 2026-27 के लिए 4,38,317 करोड़ रुपये का बजट है, और कुल कर्ज 5.61 लाख करोड़ से भी ज्यादा का हो चुका है। इसका सीधा मतलब यह है कि कर्ज प्रदेश के बजट से कहीं ज्यादा हो गया है। इस पर लगने वाले ब्याज की राशि ही करोड़ों रुपयों में चुकाई जाएगी।


कहने को कर्ज सरकार पर होता है, लेकिन असल में वह कई किस्म के टैक्स के जरिये आम जनता को ही चुकाना पड़ता है। अगर कोई यह समझता है कि लाड़ली बहना को मिलने वाली राशि सरकार दे रही है, तो यह छल ही है। असलियत यह है कि लाड़ली बहनों को उन्हीं के भाइयों, पिताओं, पुत्रों और दादाओं के द्वारा यह रकम चुकानी पड़ रही है। सरकार उनकी जेब से वसूलती है और अपनी तरफ से देने का स्वांग रचती है। लाड़ली बहनों के परिजनों को ही डीजल, पेट्रोल, खाद्य सामग्री और तेल, बैंकों में लगने वाले विभिन्न किस्म के प्रभारों और टैक्स के रूप में हर दिन चुकाने पड़ रहे हैं। इस तरह झांसे में रख कर बहनों के वोट तो बीजेपी ले जा रही है, जबकि उसका भुगतान उन्हीं के घरों के लोगों तथा आने वाली पीढ़ियों को आने वाले तीस सालों तक करना होगा।

मार्च 2023 से अब तक सरकारी खजाने से बहनों के खाते में 63 हजार 248 करोड़ रुपये भेजे गए हैं। रक्षाबंधन के अवसर पर दी जाने वाली 250 रुपये की शगुन राशि से ही प्रदेश के खजाने पर 2,148 करोड़ रुपये का भार आ जाता है। 2026-27 में अब तक इस योजना पर 23,882 करोड़ खर्च किए जा चुके है। इस पर केन्द्र सरकार की ओर से भी प्रदेशों को बड़ी चपत लगाई गई है। उसने राज्यों की टैक्स हिस्सेदारी को 7.850 प्रतिशत से घटाकर 7.347 प्रतिशत कर दिया है। इससे मध्य प्रदेश को अब हर साल 8,000 करोड़ रुपये कम मिलेंगे।

बजट का बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज की किस्त और ब्याज चुकाने में खर्च हो रहा है। इससे भी ज्यादा खतरनाक बात तो यह है कि कर्ज चुकाने के लिए भी कर्ज लिया जा रहा है। सार्वजनिक हितों और योजनाओं को चलाने के लिए सरकार का खजाना खाली पड़ा है। बढ़ती हुई देनदारियों और घटती आय के बीच की खाई निरंतर चौड़ी हो रही है। इसे वित्तीय दिवालियेपन की तरफ बढ़ने वाली सरकारी चाल के सिवाय और क्या कहा जा सकता है?

चुनाव जीतने के लिए मतदाताओं को इस तरह का प्रलोभन देने की प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही है। यह सच है कि निर्धन और ग्रामीण स्त्रियों को मिलने वाली नकद राशि उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भरता और सामाजिक रूप से महत्ता प्रदान करती है, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि उन्हें आत्मनिर्भर बनाने वाला रोजगार कम से कमतर ही हुआ है। महिलाओं के श्रम के घंटे पुरुषों के श्रम के घंटों से ज्यादा होते हैं, पर उनके काम को घरेलू अर्थशास्त्र में भी जगह नहीं मिलती। 

दरअसल, सरकार शेर पर सवारी करने की कोशिश कर रही है जबकि उस पर सवारी तो की जा सकती है, पर खतरा यह भी है कि उससे उतरते ही शेर उसे खा जाएगा। सरकार अपनी आमदनी के नए स्रोत खोज नहीं रही और वह इस मद में खर्च होने वाली राशि भी आम आदमी पर टैक्स लगाकर वसूल रही है।


ऐसा नहीं है कि सत्तारूढ़ पार्टी को वोट देने वाले लोग इस 'खेल' को नहीं समझ रहे। उनके बीच भी कई स्तरों पर अब यह चर्चा होने लगी है कि सत्तारूढ़ पार्टी के हर सांसद हर साल कम-से-कम 5,000 और हर विधायक 1,000 बहनों को अपने वेतन से यह राशि क्यों नहीं दे सकते? नगर निगमों के महापौरों, जिला पंचायत के अध्यक्षों तथा विभिन्न निगमों-मंडलों के अध्यक्षों को भी 500 बहनों को अपने वेतन से यह राशि देनी चाहिए। सत्तासीन पार्टी जिस तरह करोड़ों रुपये का चंदा प्राप्त कर रही है, उस पैसे से अपने ऑफिस के निर्माण के साथ हर साल कम-से-कम सौ करोड़ रुपये का योगदान इसके लिए क्यों नहीं कर रही जबकि इससे उसकी अपनी ही सरकार को मदद मिलेगी?

इसके अलावा पूंजीपति घरानों और कारपोरेट्स पर उत्तराधिकार टैक्स लगा कर भी अरबों रुपयों की आय की जा सकती है। यह टैक्स नए उत्तराधिकारियों पर इसलिए लगना चाहिए, क्योंकि उन्होंने अपने पूर्वजों की मेहनत और विवेक के द्वारा अर्जित की गई परिसंपत्तियों को सिर्फ इसलिए पा लिया, क्योंकि उनका जन्म उनके घरों में हुआ। इसलिए उन पर उत्तराधिकार टैक्स लगाया जाना सामाजिक न्याय की दिशा में बढ़ाया गया एक और कदम ही होगा। निराशाजनक बात तो यह है कि केंद्र की मोदी सरकार पूंजीपतियों पर नए टैक्स लगाने की बजाय उन पर बकाया टैक्स के लाखों करोड़ रुपए माफ कर चुकी है। 

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