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किसानों के खून रिसते जख्मों पर ‘शहरी माओवादी’ होने का नमक

महाराष्ट्र सरकार किसानों को महज आदिवासी कहकर खारिज कर चुकी थी। यह बिल्कुल ऐसा था मानो आदिवासी इंसान नहीं होते, उन्हें भूख नहीं लगती, उन्हें तकलीफ नहीं होती, और ये किसान तो बिल्कुल नहीं थे।

उनके पैरों में छाले पड़ गए थे, खून बह रहा था, पिंडलियां सूज गई थीं, शरीर थकान से चूर होने लगे थे, लेकिन चेहरों पर एक जिद लिए ये लोग करीब दो सौ किलोमीटर का सफर पैदल चलकर पूरा करते हुए जब मुंबई पहुंचे तो लोगों ने खुले हाथों और दिल से उनका स्वागत किया। ये वह तस्वीरें थे जिनसे आंदोलनों की एक नई परिभाषा सामने आई। आधे रास्ते में जब पैरों से बहते खून के बावजूद चलती एक महिला किसान से पूछा गया कि क्या वह अब वापस लौट जाएंगी, तो उसका जवाब था, "मैं अपने गांव में भूख से मरने के बजाय तुलना मुंबई की तरफ मार्च करते हुए मरना पसंद करूंगी। "

इसी बीच बीजेपी सांसद पूनम महाजन ने इन किसानों के जख्मों पर नमक छिड़कने वाला बयान दिया। उन्होंने कहा कि इन किसानों के बीच ‘शहरी माओवादी’ घुसपैठ कर चुके हैं। इस टिप्पणी ने उस अपमान में और इजाफा कर दिया जो मुंबई की तरफ मार्च किसानों को महज आदिवासी कहकर खारिज कर चुकी थी। यह बिल्कुल ऐसा था मानो आदिवासी इंसान नहीं होते, उन्हें भूख नहीं लगती, उन्हें तकलीफ नहीं होती, और ये किसान तो बिल्कुल नहीं थे।

महाराष्ट्र सरकार की दिक्कत इस बात से ज्यादा थी कि यह किसान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी सीपीएम के लाल झंडे तले आंदोलन क्यों कर रहे हैं। त्रिपुरा में सीपीएम को उखाड़ फेंकने के बाद बीजेपी के हौसले बुलंद थे, और उसे लग रहा था कि लाल झंडे तले मुंबई मार्च पर निकले किसान उग्र होकर उपद्रव करेंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। किसानों ने न सिर्फ शांतिपूर्वक बल्कि एक बेहद अनुशासित तरीके से पूरा मार्च किया। न कहीं कोई गड़बड़ हुई और न कहीं कोई हिंसा। किसानों को लेकर पूरे महाराष्ट्र का नजरिया और भी बदल गया जब उन्होंने किसानों ने सोमवार को दिन के बजाय रात में आजाद मैदान की तरफ कूच किया। किसानों का कहना था कि अगर वे दिन में मार्च करेंगे तो परीक्षा देने जा रहे छात्रों को दिक्कत होगी।

किसानों के इस कदम से मुंबई वासियों के मन में उनके लिए प्रेम उमड़ पड़ा। देखते-देखते बड़ी तादाद में लोग उनके लिए खाना, पानी आदि लेकर सामने आ गए। उनका फूलों से स्वागत किया गया। झुलसती गर्मी में करीब 200 किलोमीटर का रास्ता तय कर मुंबई पहुंचे इन थके किसानों के लिए यह एक सुखद अनुभूति थी।

लेकिन किसानों के इस मार्च ने फडणवीस की अगुवाई वाली सरकार की अक्षमता और अयोग्यता दोनों को उजागर कर दिया। पिछले साल हुए इसी तरह के आंदोलन के बाद सरकार ने कर्ज माफी का वादा तो किया था, लेकिन उसे अभी तक पूरा नहीं किया गया है। साथ किसानों को उनकी फसल का न्यूनतम मूल्य तक नहीं मिल पा रहा है।

पिछले साल सभी विपक्षी दलों ने किसानों के पक्ष में अभूतपूर्व एकता दिखाते हुए पूरे राज्य में किसान यात्राएं निकाली थीं। इसके बाद गुस्साए किसानों ने मुंबई को दूध और सब्जियों की आपूर्ति ठप कर दी थी। इससे फड़णवीस सरकार पर जबरदस्त दबाव बना था। पिछले साल नवंबर में भी कांग्रेस और एनसीपी ने एक जन आक्रोश यात्रा निकाली थी, जिसका समापन शरद पवार की अगुवाई में हुए नागपुर मार्च के साथ हुआ था। उस समय नागपुर में विधानसभा का सत्र चल रहा था।

इस सबके बावजूद महाराष्ट्र सरकार कानों में तेल डाले बैठी रही। किसानों को न कोई राहत मिली और न ही फसलों का न्यूनतम मूल्य। पिछले साल अच्छे मॉनसून की बदौलत दाल, सब्जियों और अनाज का बंपन उत्पादन हुआ, लेकिन ज्यादातर फसल बाजारों में पड़े पड़े सड़ गई और किसानों को लागत तक का पैसा नहीं मिल पाया।

आलू, प्याज, कपास और मक्का जैसी फसलें उगाने वाले किसान संपत माउली कहते हैं, "यह सरकार सिर्फ बिचौलियों की परवाह करती है। वे दो रुपये में हम से खरीदते हैं और दस रुपये में बेचते हैं। पिछले दिनों जब प्याज की कमी थी और 20-30 रुपये किलो तक बिक रह थी, उस समय भी हमें सिर्फ पांच रुपये के ही दाम मिले। क्या इतने पैसे पर जिंदा रह सकते हैं?"

किसान मर रहे हैं, आत्महत्या कर रहे हैं। उनके जख्मों से खून अब ज्यादा तेजी से बह रहा है, क्योंकि सत्ताधारी शासन उन्हें ‘शहरी माओवादी’ कहकर खारिज कर रहा है।

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