महाराष्ट्र: जरांगे की वापसी, यूसीसी की आहट और ‘फेकू’ बडग्या का लापता होना

महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण का भड़कता असंतोष, समान नागरिक संहिता की सियासत और नागपुर के ऐतिहासिक उत्सव पर सरकारी पहरे के निहितार्थ 

सामाजिक कार्यकर्ता जरांगे पाटील
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लगता है गणेशोत्सव के दौरान मराठा नेता मनोज जरांगे-पाटिल का मुंबई में आंदोलन छेड़ना देवेंद्र फडणवीस सरकार के लिए इतना बड़ा सियासी जोखिम था, जिसे वह उठाने की कतई स्थिति में नहीं थी। 

जरांगे ने मराठा आरक्षण के सवाल पर एक बार फिर भूख हड़ताल शुरू कर दी थी। साल 2014 के बाद से यह उनका 12वां अनशन है, जिसमें वह कुल मिलाकर करीब सौ से ज्यादा दिन अनशन पर काट चुके हैं। वह मराठवाड़ा के जालना जिले में अपने पैतृक गांव अंतरवाली सराटी में अनशन कर रहे थे। जालना में दो हफ्ते गुजारने के बाद उन्होंने मुंबई की ओर कूच कर दिया, जहां ऐन त्योहारी समय वह नए सिरे से अपने आंदोलन को भड़काने की तैयारी में थे।

इस संभावित टकराव ने फडणवीस सरकार के पसीने छुड़ा दिए थे। साल के इस समय मुंबई पहले ही खचाखच भरी रहती है, और विसर्जन-जुलूसों तथा उत्सव के शोर-शराबे के बीच कानून-व्यवस्था संभालना अपने आप में बड़ा सिरदर्द होता है और इसके लिए खासी मशक्कत करनी पड़ती है। ऊपर से लौटते हुए मानसून की मार का साया अलग मंडरा रहा था। इस पर राज्य भर में भीड़ जुटाने की जरांगे की जानी-मानी ताकत ने आग में घी का काम किया। इन सबने मिलकर राज्य सरकार के हाथ-पांव फुला दिए थे।

बुधवार, 16 सितंबर की देर रात मुंबई आते हुए बीड के पास राज्य सरकार के एक दल ने जरांगे को रोककर उनसे बात की। सरकार ने उनकी ज्यादातर मांगें मान लीं और 90 दिनों के भीतर अपना वादा निभाने की बात कही है। लेकिन एक बार जब त्योहार का शोर थमेगा, तब सरकार क्या गुल खिलाएगी-इसका सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है।

जरांगे के विरोध का मुख्य आधार राज्य सरकार का यह दावा है कि मराठों का एक बड़ा वर्ग ऐतिहासिक रूप से कुनबियों जैसी कृषक पहचान साझा करता है, जिन्हें ओबीसी समुदाय का दर्जा हासिल है। सरकार द्वारा गठित एक समिति ने कथित तौर पर कुनबी पहचान से जुड़े 58 लाख ऐतिहासिक दस्तावेज चिह्नित किए हैं, जिनमें मराठवाड़ा के आठ जिलों में निजाम कालीन ‘हैदराबाद गजट’ के रिकॉर्ड भी हैं। सरकार का दावा है कि वह अब तक 3,16,977 कुनबी जाति प्रमाणपत्र जारी भी कर चुकी है।

जरांगे की जिद है कि जब सरकार को दस्तावेज मिल चुके हैं, तो प्रमाणपत्र जारी करने में कैसी देरी? पेंच यहीं फंसा है: राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज कोई ऐतिहासिक प्रविष्टि स्वतः जाति प्रमाणपत्र में तब्दील नहीं होती। हर दावे की पड़ताल होनी है, उसे आवेदक के परिवार और वंशावली से जोड़ना होता है, और प्रशासन को साबित करना होता है कि मिले 58 लाख रिकॉर्ड में से कौन लोग इसके वास्तविक पात्र हैं और यह पात्रता उनके वंशजों तक कैसे आती है। लेकिन जरांगे की मांग में इस तरह की लंबी और पेचीदा अभिलेखीय कवायद के लिए कोई जगह नहीं दिखती-उन्हें यह अधिकार आज और अभी चाहिए।


महाराष्ट्र में सत्ता में रहीं सरकारें पिछले दो दशकों से मराठा आरक्षण का कानून सम्मत रास्ता खोजने में जुटी हैं। यदि उनकी कुनबी पहचान पुख्ता हो जाती है, तो ओबीसी कोटे के तहत एक रास्ता खुलता है। लेकिन उस राह पर चलने का सीधा मतलब है अन्य ओबीसी जातियों के तीखे गुस्से को न्योता देना- जो राज्य में भाजपा का मुख्य जनाधार हैं।

दस्तक देने वाला है यूसीसी

14 सितंबर को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि इस मसले पर विचार कर रही समिति द्वारा अपनी रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद महाराष्ट्र सरकार राज्य विधानमंडल के आगामी नागपुर शीतकालीन सत्र में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक पेश करने का इरादा रखती है। उनका यह बयान केन्द्रीय गृहमंत्री द्वारा मुंबई में दिए गए उस बयान के ठीक एक दिन बाद आया, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा शासित 21 राज्यों में यूसीसी लागू हो जाएगा।

भाजपा की इस रणनीति में जो बात नई है, वह यह कि संघ परिवार के इस पुराने और बुनियादी एजेंडे को अमलीजामा पहनाने के लिए पूरे देश में एक समान केन्द्रीय कानून लाने के बजाय राज्यों के जरिये चोर दरवाजे का रास्ता चुना जा रहा है। महाराष्ट्र ने जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना देसाई की अध्यक्षता में सात सदस्यीय समिति का गठन किया था। इस पैनल में बॉम्बे हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश आर.सी. चव्हाण और एस.जी. मेहरे, पूर्व मुख्य सचिव डी.के. जैन, पूर्व महाधिवक्ता वीरेंद्र सराफ, संविधान विशेषज्ञ रमेश पतंगे और शिक्षाविद सुवर्णा रावल शामिल हैं, जिन्हें अपनी सिफारिशें देने के लिए छह महीने का वक्त मिला है।

9 जुलाई के सरकारी प्रस्ताव में समिति से यूसीसी के संवैधानिक, कानूनी, सामाजिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक नतीजों की पड़ताल करने को कहा गया है। इसे उत्तराखंड और अन्य राज्यों के अनुभवों का अध्ययन करना है; शादी, तलाक, गोद लेने, विरासत और उत्तराधिकार के मामलों को देखना है; और महाराष्ट्र के लिए जरूरी कानूनी, प्रशासनिक एवं संस्थागत बदलावों की सिफारिश करनी है। समिति से उम्मीद की गई है कि वह ‘विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधियों, महिला संगठनों, गैर-सरकारी संगठनों, विशेषज्ञों और आम नागरिकों की राय लेगी।’

कानूनी और प्रशासनिक दिग्गजों से भरे होने के बावजूद, इस समिति में उन अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों-मुस्लिम, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध या पारसी-का एक भी नुमाइंदा नहीं है जिनके पर्सनल लॉ की समीक्षा का जिम्मा उसे सौंपा गया है। यहां तक कि इसमें आदिवासियों का भी कोई प्रतिनिधि नहीं है। मुंबई में अमित शाह ने साफ कहा था कि आदिवासी समुदाय यूसीसी के दायरे से बाहर रहेंगे और उनकी परंपराओं को सुरक्षित रखा जाएगा।

उत्तराखंड में जनवरी 2025 से यूसीसी लागू है। गुजरात और मध्य प्रदेश इस कानून को अपनी विधानसभाओं से पारित कर चुके हैं, लेकिन उन्हें अभी राष्ट्रपति की मंजूरी का इंतजार है। इस दिशा में कदम बढ़ाने वाला महाराष्ट्र चौथा राज्य है। अब देखना यह है कि महाराष्ट्र राज्य-विशिष्ट कानून का मसौदा तैयार करता है या फिर किसी दूसरे राज्य के कानून की हू-ब-हू नकल करता  है। जस्टिस देसाई उत्तराखंड और गुजरात की समितियों में भी शामिल रही थीं। गठन के बाद से अब तक महाराष्ट्र पैनल ने कोई सार्वजनिक जनसुनवाई नहीं की है। क्या हम उम्मीद कर सकते हैं कि सरकार इस प्रक्रिया को पारदर्शी बनाएगी-किसे बुलाया गया, क्या सुझाव मिले और क्या असहमति के स्वरों ने अंतिम सिफारिशों पर रत्ती भर भी कोई असर डाला?


लापता ‘फेकू’

नागपुर के मारबत उत्सव का सत्ता के सामने सच बोलने का 145 साल पुराना गौरवशाली इतिहास रहा है। इसे ब्रिटिश हुकूमत के दौर में जन-प्रतिरोध के एक अनूठे औजार के तौर पर शुरू किया गया था-नागरिकों का एक ऐसा सुरक्षा वाल्व जहां लोग अपने समय की बुराइयों, जुल्मों और विसंगतियों को नाम लेकर ललकारते थे, उनका उपहास उड़ाते थे। प्रतीकात्मक रूप से ‘मारबत’ (बुराइयों को सोखने वाली देवी) और ‘बडग्या’ (बुराई का प्रतीक, आमतौर पर एक पुरुष) के पुतले होते जिनमें मारबत को अगले साल के लिए सुरक्षित रख लिया जाता जबकि बडग्या के पुतले को आग के हवाले कर देते। औपनिवेशिक दौर में अगर यह विदेशी हुकूमत के खिलाफ था, तो आज महंगाई, बेरोजगारी, नागरिक बदहाली और सत्ता के सियासी अहंकार के खिलाफ है। इस उत्सव की असली ताकत इसकी बेबाकी और निडरता है। पुराने शहर की संकरी गलियों में बजते ढोल, नारों और उमड़ते हुजूम के बीच बड़े से बड़े नेता को भी नहीं बख्शा जाता।

यह पर्व जनता के नब्ज की सटीक थाह लेने वाला पैमाना माना जाता है। ऐसे में अंतिम क्षणों में ‘फेकू’ बडग्या का रहस्यमय तरीके से गायब हो जाना, और भाजपा शासित नागपुर नगर निगम द्वारा 2 करोड़ रुपये झोंककर इस उत्सव को ‘वैश्विक सांस्कृतिक आयोजन’ का चोगा पहनाने की कवायद को इसकी मूल विद्रोही आत्मा पर सीधे प्रहार के रूप में देखा जा रहा है। सदियों से सत्ता को आईना दिखाने वाले किसी लोक-उत्सव को सरकारी संरक्षण की बैसाखियों पर खड़ा करना उसके बुनियादी विचार का मखौल उड़ाना है।

जहां अन्य बडग्या बेरोजगारी, पेपर लीक, स्मार्ट मीटर, नशाखोरी और नागरिक दुश्वारियों पर सीधा हमला बोल रहे थे, वहीं ‘फेकू’ बडग्या-जिसका इशारा किस ओर था यह किसी से छिपा नहीं है-स्थानीय भाजपा नेताओं के भारी दबाव में अंतिम पलों में हटा दिया गया, और उसकी जगह आनन-फानन में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का पुतला खड़ा कर दिया गया।

बापट का असर

14 सितंबर को जैसे ही दस दिवसीय उत्सव की रंगारंग शुरुआत हुई, महाराष्ट्र भर के दर्जनों गणेश मंडलों ने स्वेच्छा से डीजे और कानफाड़ू साउंड सिस्टम का त्याग कर नजीर पेश की।

नागपुर में प्रतिरोध का दूसरा अनूठा प्रतीक-क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद गणेश मंडल, जिसकी नींव सात दशक पहले स्वतंत्रता सेनानी गुलाब पुरी ने रखी थी और अब उनके बेटे चंद्रशेखर पुरी जिसकी अगुवाई करते हैं-उसने मारबत में हुई इस सेंसरशिप की कसर पूरी कर दी। दिखावे से कोसों दूर और तेवरों में बेहद तीखा, इस साल का यह गणेश पंडाल जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शनों, चीनी की कीमतों में आए उछाल और एथेनॉल विवाद, बेलगाम महंगाई एवं बेरोजगारी, और शिक्षा के अंधाधुंध निजीकरण जैसे ज्वलंत मुद्दों पर केन्द्रित है-जिनके लिए दरबारी गोदी मीडिया के पास कोई जगह नहीं है। यह पंडाल प्रधानमंत्री की जनविरोधी नीतियों को सीधे कटघरे में खड़ा करता है।

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