मृणाल पाण्डे का लेखः धार्मिक पर्यटन को धनार्जन की फैक्टरी बनाना खतरनाक, त्रासदियों को सीधा निमंत्रण जैसा

मैदानों में चारधाम यात्रा को स्वर्गारोहण की पही पायदान कह कर बेचा जा रहा है। नतीजतन लाखों दर्शनार्थी चार धाम यात्रा के तहत यहां आन तो पहुंचे लेकिन मौसम की खराबी और भूस्खलन से तीन-तीन किलोमीटर लंबी कतारों में दुर्गम पहाड़ों के बीच ठिठके खड़े हैं।

फोटोः सोशल मीडिया
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मृणाल पाण्डे

ब्रिटिश लेखक रडयार्ड किपलिंग ने एक बार व्यंग्य में देश के अंधभक्तों से पूछा था, वे जो सिर्फ इंग्लैंड की ही बात करते हैं, सचमुच के इंग्लैंड की बाबत कितना जानते हैं? इस साल कोविड के दो बरसों तक घरों में बंद रहे मैदानी सैलानियों की पहाड़ों में उमड़ती भीड़ को देख कर किपलिंग का यह सवाल फिर याद आ गया। अगर हम भी पूछें कि जो लोग हिमालयीन इलाके को सिर्फ देवभूमि और पर्यटन का चश्मा लगा कर देख-दिखा रहे हैं, वे सचमुच इस इलाके के सदियों से लागू किए जाते रहे तीर्थाटन या पर्यटन के विधि निषेधों की बाबत कितना जानते हैं? तो अभी इस इलाके की जो दशा दिख रही है, उसके मद्देनजर ईमानदार जवाब होगा, बिलकुल नहीं। श्रद्धालुओं के तीर्थाटन के ठिकाने चारों धाम, हरिद्वार, ॠषिकेश, और सैलानियों के अड्डे- मसूरी, नैनीताल, शिमला- हर कहीं भीड़ ने सैलानियों ही नहीं, लोकल जीवन को भी दुष्प्रभावित कर डाला है। हर जगह पानी की किल्लत, समुचित पार्किंग की कमी, सैनिटेशन की दुर्व्यवस्था सतह पर दिख रही है। केदारनाथ जैसी पवित्र स्थली में पर्यटकों की निरंतर धकापेल अपने साथ सभ्यता का कचड़ा भी ले आई है जो लोकल नालों, गधेरों को सड़ा रहा है। विशेषज्ञ चिंतित हैं कि इतनी गंदगी से कहीं महामारी न फैल जाए।

पिछले कुछ सालों से धनार्जन को ही लक्षित करके पर्यटन उद्योग और औद्योगिक उपक्रमों को देश भर में बढ़ावा दिया गया है। चौड़ी सड़क मने विकास, बड़े टूरिस्ट भवन मने विकास, हर मोड़ पर मैगी पॉइंट मने विकास! उजड़ते गांवों और युवा पलायन से परेशान जनता को यह राहतकारी लगा। देवभूमि कह कर गाहकों को बेचे गए उत्तराखंड में पैकेज टूर्स और हेलिपैडों से थोक के भाव लाए जा रहे सैलानियों से कुछ महीनों में साल भर की कमाई के चतुर दोहन का सिलसिला शुरू हो गया। ठेकेदारों, बिल्डरों की बांछें खिलीं, पर तभी अर्धकुंभ के साथ कोविड घुस आया और नए ‘विकास’ का यह क्रम टूट गया।

पिछले दो बरस सरकारी और निजी पर्यटन उपक्रमी दोनों खिन्न रहे। फिर हालात सुधरते ही देश के मीडिया में भरपूर विज्ञापन दे कर श्रद्धालुओं और सैलानियों को देवभूमि में दोबारा और जोशोखरोश से न्योता जाने लगा। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों का कहना था कि हम भारतीय सनातन धर्मप्रेमी हैं। इस देवभूमि पर तीर्थाटन और पर्यटन बढ़े, तो लोकल आमदनी सहजता से बढ़ेगी, सड़कें और यातायात व्यवस्था बेहतर होंगे, शेष देश का सनातन धर्म, पहाड़ों की खास संस्कृति और इलाकाई कुटीर उद्योगों से परिचय बढ़ेगा और इस तरह इलाके का भरपूर विकास होगा। बहुत अच्छे!


इस बरस गर्मी रिकार्डतोड़ तरीके से विकट है और जो भी पहाड़ों की जानिब निकल सकता है, उधर भागा जा रहा है। मैदानों में चारधाम यात्रा को स्वर्गारोहण की पही पायदान कह कर बेचा जा रहा है। नतीजतन लाखों दर्शनार्थी चार धाम यात्रा के तहत यहां आन तो पहुंचे लेकिन मौसम की खराबी और भूस्खलन से तीन-तीन किलोमीटर लंबी कतारों में दुर्गम पहाड़ों के बीच ठिठके खड़े हैं। आम जनता को प्रधानमंत्री की केदारनाथ बद्रीनाथ धाम यात्रा की जो छवियां टीवी पर दिखाई गईं, उनमें यहां से वहां तक असीम खुला पहाड़ों का विस्तार, रूई के फाहों सी बर्फ और फूलों से सजे देवालय और धर्मप्रवण प्रधानमंत्री जी के ध्यान और एकांत में चिंतन को बनाई गई गुफाओं की हर्षदायक छवियां दिखी थीं। जो नहीं दिखी, वह कुछ कड़वी सचाइयां जो वे आज यहां आकर भोग रहे हैं- दमघोंटू भीड़भाड़, मनमाना किराया वसूलते टूर ऑपरेटर और होटल और गंदगी। जो टीवी पर दिखा वह बड़े लोगों की बड़ी बात साबित हुई।

दरअसल, जब हम सामान्य जन भी किसी नाजुक पर्यावरण वाले इलाके की यात्रा को राजनीति और धर्म से जोड़ दें, तो बात धुरी से छिटक कर उलझ जाती है। धार्मिक पर्यटन और विकास की सरकारी टेमप्लेट के तहत पहाड़ी इलाके धीमे-धीमे अपना सहज सुंदर भौतिक और आध्यात्मिक रूप खोकर धन कमाने की फैक्टरियों में बदल गए हैं और फैक्टरी है, तो प्रदूषण तो होगा ही। बात यहीं तक सीमित नहीं। अव्यवस्था का शिकार अर्धकुंभ साक्षी है कि जनता की सुरक्षा को ताक पर रख कर चुनावी फायदे के लिए देवभूमि के पर्यटन के तहत धर्म का एक राजनीतिक संस्करण बनाया जा चुका है। दोबारा चुनाव जीतने पर उसे और भी चमकाया जाएगा।

राज्य में दोबारा भाजपा सरकार बनने के साथ ही अल्पसंख्य समुदाय के खिलाफ अनर्गल प्रचार करने वाले धर्म अखाड़ों का आयोजन होने लगा है। उनके आग उगलने वाले वक्ता भारतीय धर्मों की कालातीत विविधता के विपरीत सनातन धर्म को ही राजकीय संरक्षण प्राप्त धर्म बता रहे हैं। उनकी बोली-बानी से जाहिर है कि वे भगवाधारी भले हों, हिन्दू धर्म की उनकी समझ बहुत संकीर्ण और मुस्लिम विद्वेश से प्रेरित है। करुणा और परहित की भावनाएं जो उसमें सदा से बुनी हुई थीं, सायास मिटाई जा रही हैं।

कितने लोग अब यह जानते हैं कि सनातन धर्म खुद में कैसी विविधता रखता है और उसकी पांचरात्र या वैखानस सरीखी उपशाखाएं अपने पवित्र ग्रंथों के चुनाव, और पूजा पद्धतियों में एक-दूसरे से कितनी भिन्न हैं कि शैव धर्म की सनातन धर्म के परे अपनी एक विशिष्ट उपासना शैली और शाखाएं हैं जिनमें औघड़, अवधूत, कूल, शाक्त तंत्र सबकी अपनी छवियां और दर्शन हैं, पर सरकारी किसम का सनातन धर्म विविधता से परहेज करता है। वह हिन्दू धर्म के तहत सदियों से अपनी अलग-अलग पहचान रखते आए सब धर्मों को एक विशाल राजनैतिक कढाही में घोंट रहा है। उससे जो हिन्दुत्व की जादुई खिचड़ी बनी है, उसे खाने वालों को, ‘सबै भूमि गोपाल की’ नजर आती है।


पर्वतीय इलाके में सदियों से शंकराचार्य ही नहीं, वेद बाह्य धर्मों के अनेक बड़े आध्यात्मिक गुरुओं की आवाजाही रही है। नाग, यक्ष और अगणित स्थानीय देवी-देवता यहां पुजते हैं। गुरु गोरख से लेकर गुरु नानक तक के चरण यहां पड़े। नाथ- सिद्ध परंपरा के अगणित प्रसिद्ध साधु, सूफी पीर यहां आए और लोकल जनता की नजरों में वे सब बहुत समाहित रहे हैं। गांवों में आज भी जब-जब जागर लगता है, तो वे सब आविष्ट जगरिया के शरीर में उतरते हैं, ऐसा माना जाता है। पिछले दो-तीन सालों में हिन्दुत्व के कई बहुत संकीर्ण और आक्रामक प्रचार ने सदियों से ऐसे मधुर सर्वधर्म समभाव और समरसता को खंडित किया है और सरल पहाड़ी जनता के बीच अपने-पराए के भेदभाव को उकसाया है।

इसी के साथ विकास के नाम पर हो रहे सड़क चौड़ीकरण अभियानों तथा भवन निर्माण ने भी नाजुक भौगोलिक पर्यावरण में अवांछित तोड़फोड़ से भूस्खलनों की और नदियों के उफनाने की संभावनाएं भी बढ़ाई हैं। बारिश का मौसम सर पर है और यात्रियों की तादाद देख कर लोकल अधिकारियों के हाथ-पांव फूल रहे हैं। वैसे तो पहाड़ों के जल, जंगल, जमीन के ऐसे निर्मम कमर्शियल दोहन की नींव अंग्रेज डाल गए थे लेकिन जब तक वे और उनके परिवार इन इलाकों में आते, जाते, सुस्ताते रहे, उन्होंने यहां अपनी ही सुविधा को सही लेकिन वैज्ञानिक तरीके से सड़क, भवन निर्माण, जल स्रोत संरक्षण और नदियों के सुगम प्रवाह की व्यवस्था करवाई, महामारी रोकने के लिए बड़े सरकारी अस्पताल तथा प्रोटोकॉल बनाए। उनके वक्त के कई नाले, पुल और सड़कें, अस्पताल अभी भी मौजूद और उपयोग में हैं। लेकिन हमने इधर विज्ञान और वैज्ञानिक सलाहों की उपेक्षा करते हुए धार्मिक तथा राजनीतिक कारणों से विकास का जो मॉडल बनाया और लागू किया, वह भविष्य के लिए खतरनाक है।

संयुक्त राष्ट्र संगठन के विश्व पर्यटन प्रकोष्ठ की राय में धार्मिक पर्यटन प्रोत्साहन की बड़ी मुहिम छेड़ते वक्त सरकार को इस बात का ध्यान सर्वोपरि रखना चाहिए कि क्या उस इलाके में पर्यटकों की भारी आवक संभाल सकने की चुस्त प्रशासकीय क्षमता और दुरुस्त आधारभूत ढांचा मौजूद है? क्योंकि अगर बेतरतीब भीड़ उमड़ी, तो उससे लोकल पर्यावरण, जनता की दैनिक जिंदगी तथा इलाकाई संस्कृति पर तो दुष्प्रभाव होगा ही, भरपूर धन खर्च कर आए पर्यटकों के लिए भी यात्रा और प्रवास निरापद और सुखद नहीं साबित होंगे। अभी भी समय है। युवा और उत्साही मुख्यमंत्री जी अगर अमरनाथ या मानसरोवर यात्रा की ही तरह चारधाम यात्रा के विज्ञापनों के साथ ऊंचे पहाड़ी इलाके में आने वालों के लिए भी स्वास्थ्य प्रमाणपत्र साथ लाने और यात्रा पूर्व फिर से लोकल जांच अनिवार्य कर दें, शहरों में समुचित पार्किंग व्यवस्था और निर्माण कार्यों में विशेषज्ञों की राय पर ध्यान दें, तो आगे कई त्रासदियों से बचा जा सकेगा। पैसा भगवान नहीं होता।

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