संघ-बीजेपी के ‘नाखूनों’ से घायल मणिपुर, सीएम बीरेन सिंह छुपा रहे सच्चाई!

हिंसा भड़कने के बाद 17 मई को बीरेन सिंह सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इसका मूल अवैध म्यांमार प्रवासियों और पहाड़ियों में नशीली दवाओं के कारोबार के खिलाफ कार्रवाई है।

फोटोः IANS
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नंदिता हक्सर

मणिपुर में आबादी के मुकाबले पुलिसकर्मी काफी अधिक हैं। राष्ट्रीय औसत से छह गुना। अंदाजा है कि प्रति एक लाख लोगों पर वहां 1,388 पुलिसकर्मी हैं जबकि राष्ट्रीय औसत 250 का है। मई, 2023 के बाद राष्ट्रीय राइफल्स जिसकी राज्य में स्थायी तैनाती है, के अलावा अन्य अर्ध-सैन्य बलों के साथ सीआरपीएफ की लगभग 50 कंपनियों को मणिपुर भेजा गया था।

इतनी बड़ी संख्या में तैनाती का दंगों पर बहुत कम प्रभाव पड़ा। सुरक्षा बल न केवल हिंसा को रोकने में सक्षम नहीं थे बल्कि पुलिस और सशस्त्र बलों में झड़पें भी हुईं। जुलाई, 2023 में ‘द प्रिंट’ के प्रवीण स्वामी के साथ इंटरव्यू में इंस्टीट्यूट ऑफ कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट के संस्थापक सदस्य अजय साहनी ने कहा कि पुलिस के पास आजादी नहीं है और वह सत्ता की इच्छाओं के अनुसार कार्य करती है। उन्होंने कहा कि लंबी हिंसा का कारण न तो अक्षमता थी और न ही योजना की कमी, बल्कि राज्य की मिलीभगत थी: ‘राज्य या तो हिंसा का समर्थन कर रहा है या उसे अंजाम दे रहा है’। साहनी ने बताया कि यह कितना अजीब है कि एक नागरिक समाज संगठन ने सुप्रीम कोर्ट से आदिवासियों की रक्षा के लिए सेना भेजने की मांग की। सुप्रीम कोर्ट ने जवाब दिया कि सशस्त्र बलों को भेजना या न भेजना कार्यपालिका का काम है, न कि न्यायपालिका का। वहीं दूसरी ओर, जब केंद्र ने 27 सितंबर, 2023 को घोषणा की कि मणिपुर के पहाड़ी जिले अफ्स्पा के तहत ‘अशांत’ हैं, तब ज्यादा हिंसा तो घाटी में हुई थी।

संविधान अनुसूचित जनजाति की पहचान के लिए मानदंड परिभाषित नहीं करता है और इसलिए इस मामले में 1931 की जनगणना के दौरान जिन आधार पर इस श्रेणी के लोगों की गणना हुई, वही प्रचलन में रहे। उसके मुताबिक, अनुसूचित जनजातियों को ‘बहिष्कृत’ और ‘आंशिक रूप से बहिष्कृत’ क्षेत्रों में रहने वाली ‘पिछड़ी जनजाति’ कहा जाता है। प्रांतीय विधानसभाओं में ‘पिछड़ी जनजातियों’ के प्रतिनिधित्व के लिए पहली बार प्रावधान 1935 में भारत सरकार अधिनियम में किया गया था।

 1965 में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की सूचियों के संशोधन पर एक सलाहकार समिति का गठन किया गया था जिसके अध्यक्ष तत्कालीन कानून सचिव डी.एन. लोकुर थे। जनजाति की पहचान के लिए लोकुर समिति के पांच मानदंड थे- आदिम लक्षण, विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक अलगाव, दूसरे समुदाय के साथ संपर्क में शर्म और पिछड़ापन।

 फरवरी, 2014 में गठित तत्कालीन जनजातीय मामलों के सचिव रुशिकेश पांडा के नेतृत्व में टास्क फोर्स ने कहा कि अपनाई जा रही प्रक्रिया सकारात्मक कार्रवाई और समावेशन के संवैधानिक एजेंडे को खत्म कर रही थी। यह निष्कर्ष निकाला गया कि इन मानदंडों और प्रक्रियाओं के कारण देश भर में लगभग 40 समुदायों को एसटी दर्जा देने में या तो देरी हुई या वे शामिल ही नहीं किए जा सके। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली पहली सरकार ने 2014 में कार्यभार संभालने के कुछ ही दिनों के भीतर टास्क फोर्स की रिपोर्ट के आधार पर प्रक्रिया और मानदंडों को बदलने के लिए एक मसौदा पेश किया गया। हालांकि तब इस पर काम नहीं हुआ और मोदी 2.0 में जनजातीय मामलों के मंत्री अर्जुन मुंडा ने संसद में जोर देकर कहा था कि लोकुर समिति द्वारा निर्धारित मानदंड उचित थे और आदिवासी समाज रस्मों-रिवाजों को नहीं बदलते।

 फिर भी, आशंका है कि सरकार ईसाइयों को अनुसूचित जनजाति श्रेणी से बाहर कर सकती है। इसका सीधा असर मणिपुर के आदिवासियों पर पड़ेगा जहां बड़ी संख्या में ईसाई हैं। दिसंबर, 2021 में विश्व हिन्दू परिषद के केन्द्रीय न्यासी बोर्ड ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें मांग की गई कि केन्द्र सरकार ‘अन्य धर्मों में परिवर्तित होने वाले आदिवासियों को जनजातियों की सूची से हटाने’ के लिए संविधान संशोधन करे।

 विहिप के कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा, ‘संविधान के मुताबिक, जो लोग ईसाई और इस्लाम अपनाते हैं, उन्हें अनुसूचित जनजातियों को दिए जाने वाले आरक्षण और अन्य लाभ का पात्र नहीं होना चाहिए लेकिन धर्मांतरण के बाद भी वे ऐसे लाभ उठा रहे हैं। फरवरी, 2023 में अखबार ‘मेघालयन’ में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, एक अन्य आरएसएस समर्थित संगठन- जनजाति धर्म संस्कृति सुरक्षा मंच (जेडीएसएसएम) ने ईसाइयों को एसटी सूची से हटाने की मांग की थी।


1951 में जन्मे नोंगथोम्बम बीरेन सिंह पेशेवर फुटबॉलर थे जो 1979 से 1984 तक जालंधर में सीमा सुरक्षा बल के लिए खेले। जब वह मणिपुर लौटे, तो नाहरोलगी थौडन नामक एक स्थानीय भाषा का अखबार शुरू किया जिसके वे 2001 तक संपादक रहे। 2002 में वह डेमोक्रेटिक रिवॉल्यूशनरी पीपुल्स पार्टी में शामिल हुए और 2002 में इंफाल पूर्वी जिले के हेइंगेंग से विधानसभा के लिए चुने गए और 2004 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए 2007 में अपनी सीट बरकरार रखी। उन्होंने कांग्रेस सरकार में कई कैबिनेट विभाग संभाले। 2012 में लगातार तीसरा चुनाव जीता। 2016 में बीरेन बीजेपी में शामिल हो गए। अगले साल वह राज्य में गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री बने। वह मणिपुर में बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री थे।

2022 के चुनाव के बाद बीरेन फिर मुख्यमंत्री बने। इस बार बीजेपी 2017 के 21 के मुकाबले 37 सीटों के साथ बहुमत में आई। बीरेन 2021 से लैनिंगथौ सानामाही मंदिर बोर्ड के अध्यक्ष हैं। अगस्त, 2022 में, मणिपुर विधानसभा ने सर्वसम्मति से 1 अगस्त, 2003 को पारित उस प्रस्ताव की फिर से पुष्टि की जिसमें भारत सरकार को सिफारिश की गई थी कि सानामाही धर्म जनगणना रिपोर्ट में दर्ज हो और इसके लिए जनगणना में एक अलग कोड नंबर भी दिया जाए।

2011 की जनगणना के अनुसार, 2,22,315 की कुल आबादी के साथ सानामाही मानने वाले लगभग 7.78 फीसद हैं। 11,81,876 की जनसंख्या में हिन्दू 41.39 फीसद, 11,79,043 आबादी के साथ ईसाई 41.29 फीसद, 2,39,836 आबादी के साथ मुसलमान 8.4 फीसद हैं।

अगस्त, 2021 में, उखरुल के तत्कालीन कांग्रेस विधायक अल्फ्रेड कान-नगम आर्थर ने राज्य विधानसभा में विकास व्यय के मामले में हिल्स के खिलाफ भेदभाव का मुद्दा उठाया: ‘… जनजातीय मामलों और पर्वतीय विभाग के मुताबिक, वर्ष 2017-18 में विकास गतिविधियों के लिए (फंडिंग) 108 करोड़ रुपये थी: 2018-19 में यह 150 करोड़ रुपये और 2019-20 में 120 करोड़ रुपये थी जबकि 2020-21 के लिए यह 41 करोड़ रुपये थी। वहीं, वित्त विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक घाटी के लिए 2017-18 में 5,000 करोड़ रुपये, 2018-19 में 4,900 करोड़ रुपये आवंटित किए गए। हालांकि 2019-20 में वास्तविक व्यय 5,000 करोड़ रुपये है और 2020-21 में यह 7,000 करोड़ रुपये है।’

आर्थर द्वारा पेश आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता जांगहोलम हाओकिप ने फ्रंटियर मणिपुर में लिखा: ‘वित्तीय वर्ष 2020-21 में मणिपुर के लिए कुल बजट आवंटन 7,000 करोड़ रुपये था जिनमें से 6,959 करोड़ घाटी को मिले और हिल्स को 41 करोड़ रुपये। इसके अलावा वित्तीय वर्ष 2017-2021 के दौरान मणिपुर के लिए 21,900 करोड़ के कुल बजट आवंटन में से केवल 419 करोड़ हिल्स को दिए गए जबकि घाटी को 21,481 करोड़। यह गैरवाजिब है क्योंकि घाटी केवल 10 फीसद को कवर करती है जबकि पहाड़ियां कुल भौगोलिक क्षेत्र का 90 फीसद।’


मणिपुर हिंसा पर रैडिकल सोशलिस्ट संगठन का जुलाई, 2023 का एक बयान, जो इंटरनेशनल व्यूप्वाइंट में छपा, पढ़ा जाना चाहिए: ‘केन्द्र में बीजेपी और मणिपुर सरकार और उसके नियंत्रण वाली पुलिस का दोहरापन साफ दिख रहा है। हिंसा भड़कने के बाद 17 मई को बीरेन सिंह सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया... कि इसका मूल अवैध म्यांमार प्रवासियों और पहाड़ियों में नशीली दवाओं के कारोबार के खिलाफ कार्रवाई है। 28 मई को बीरेन सिंह ने फिर झूठ बोला कि झड़पें दो समुदायों के बीच नहीं बल्कि कुकी उग्रवादियों और सुरक्षा बलों के बीच हुईं। इस एकतरफा कार्रवाई के लिए आरएसएस से कथित तौर पर जुड़े दो प्रमुख मैतेई निगरानी समूहों- अर्रामबाई टेंगगोल और मैतेई लीपुन की नापाक भूमिका जिम्मेदार है।’

इतने लंबे समय तक मणिपुर में राष्ट्रपति शासन क्यों नहीं लगाया गया? मोदी इतने समय तक क्यों चुप रहे? जवाब साफ है। केन्द्र की बीजेपी सरकार किसी राज्य में अपनी ही सरकार के खिलाफ कैसे ऐसे कदम उठाती और परोक्ष रूप से मेइतियों को उसका पक्षपातपूर्ण समर्थन। यही वजह है कि दो महीने से अधिक समय तक मोदी देश में चर्च को तहस-नहस करने पर चुप रहे लेकिन ऑस्ट्रेलिया में हिन्दू मंदिर के विध्वंस पर खूब शोर मचाया।

शूटिंग द सनः व्हाइ मणिपुर वाज इन्गल्फ्ड बाय वायलेंस एंड द गवर्नमेन्ट रिमेंड सालेंट, प्रकाशकः स्पीकिंग टाइगर से साभार अनूदित अंश

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