खरी-खरीः केवल जन आंदोलन ही है मोदी राजनीति की काट

एनआरसी और एनपीआर पर संसद में सरकार के ताजा बयान से साफ है कि अभी वह इस मुद्दे पर पीछे हटने को तैयार है। यह केवल शाहीन बाग की महिलाओं के आंदोलन का दबाव है जिसके आगे मोदी सरकार घुटने टेकने को मजबूर हो गई। हालांकि संशोधित नागरिकता कानून पर सरकार अभी भी अटल है।

फोटोः सोशल मीडिया
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ज़फ़र आग़ा

शाहीन उर्दू का एक शब्द है, जिसका अर्थ आसमान की बुलंदियों पर उड़ने वाला पक्षी बाज होता है। बाज के बारे में सभी जानते हैं कि यह एक अत्यंत निडर और निर्भीक परिंदा होता है। अतः ‘शाहीन बाग’ एक ऐसी जगह होगी जहां शाहीन अर्थात् बाज जैसे निर्भीक व्यक्तियों का बसेरा हो। दिल्ली के ओखला इलाके में बसी शाहीन बाग बस्ती बेशक शाहीनों की बस्ती साबित हुई। क्योंकि इस बस्ती की महिलाओं ने पिछले 50 दिनों से भी ज्यादा से चल रहे अपने आंदोलन के माध्यम से नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे बीजेपी के कट्टरपंथी तथा घमंडी नेताओं को एनआरसी और एनपीआर के मुद्दों पर घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। इसका पहला संकेत स्वयं मोदी सरकार की ओर से चार फरवरी को केंद्रीय गृह राज्यमंत्री ने अपने एक बयान में दिया।

केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने एक प्रश्न के उत्तर में एनआरसी पर लोकसभा में यह जवाब दियाः “अभी तक राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) तैयार करने का सरकार ने कोई निर्णय नहीं किया है।’ फिर तुरंत मंत्री महोदय ने एक और प्रश्न के उत्तर में एनपीआर के संबंध में कहा: ‘एनपीआर की तैयारी के समय किसी प्रकार के दस्तावेज दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं होगी।”

ये दोनों बातें ही इस बात का प्रमाण हैं कि कम से कम गृहमंत्री अमित शाह एनआरसी के लिए जो बयानबाजी कर रहे थे उससे उनको अभी तो पीछे हटना पड़ ही गया है। संशोधित नागरिकता कानून- 2019 के पारित होने के समय से वह ताल ठोककर सारे देश के टीवी चैनलों को यह बता रहे थे कि सबसे पहले नागरिकता कानून में संशोधन होगा, फिर एनपीआर बनेगा और फिर सारे देश में एनआरसी को लागू किया जाएगा। उनके मुताबिक यह काम 2024 तक पूरा हो जाएगा। परंतु अब स्वयं अमित शाह के ही मंत्रालय की ओर से उनके सहयोगी मंत्री ने देश को यह आश्वासन दे दिया है कि एनआरसी अभी नहीं और एनपीआर में भी कागजात की कोई जोर जबरदस्ती नहीं होगी।

सरकार निःसंदेह इस मुद्दे पर पिचक गई और कम से कम अभी पीछे हटने को तैयार है। और यह केवल शाहीन बाग और उसकी महिलाओं के आंदोलन का दबाव है जिसके आगे मोदी सरकार घुटने टेकने को मजबूर हो गई। हालांकि संशोधित नागरिकता कानून पर सरकार अभी भी अटल है। वह इसमें अभी भी कोई संशोधन करने को तैयार नहीं है। परंतु मोदी और शाह को इस मामले में दो कदम ही सही पीछे हटने को मजबूर करने पर शाहीन बाग की शाहीन सिफत औरतें बधाई की पात्र हैं।

परंतु एनआरसी और एनपीआर के मुद्दे पर सरकार के रवैए में यह परिवर्तन क्यों हुआ। इसका एक कारण तो यह समझ में आता है कि एनआरसी और संशोधित नागरिकता कानून को लेकर सारी दुनिया में मोदी सरकार की जैसी नाक कटी उससे प्रधानमंत्री और बीजेपी घबरा गई और उनका रवैया बदलने लगा। परंतु केवल इतनी सी बात नहीं है। इस मुद्दे ने नरेंद्र मोदी सहित संपूर्ण संघ परिवार को इसलिए हिला दिया कि एक मुस्लिम वर्ग ही नहीं अपितु सारे देश में इस बात पर एक क्रांति उठ खड़ी हुई है।

इसका कारण यह है कि भारतवर्ष कुछ भी हो सकता है, लेकिन वह धर्म आधारित राष्ट्र नहीं हो सकता है। पुराणों के समय से ‘सर्वधर्म समभाव’ के सिद्धांत पर आधारित इस देश को संघ क्या कोई भी चाहे कि वह इसको संपूर्णतया हिंदू राष्ट्र बना दे तो यह संभव नहीं है। तभी तो संशोधित नागरिकता कानून पारित होते ही इस देश की आत्मा विचलित हो उठी। फिर जैसे ही शाहीन बाग की औरतें इस भयंकर सर्दी में दिन-रात संविधान के सरंक्षण में धरने पर बैठीं वैसे ही मानो सारा देश उनके समर्थन में उमड़ पड़ा। देश के कोने-कोने से क्या हिंदू, क्या सिख, क्या ईसाई इस देश के किस मत का आदमी नहीं था जो कि शाहीन बाग नहीं पहुंचा।

देखते ही देखते शाहीन बाग इस देश के हर नगर में एक आंदोलन बनकर उठ खड़ा हुआ। केवल देश भर में ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सारे संसार में संशोधित नागरिकता कानून के खिलाफ धरने-प्रदर्शन आयोजित हो गए। क्योंकि यह मामला केवल नागरिकता कानून से जुड़ा नहीं था बल्कि यह तो नागरिकता कानून की आड़ में सदियों से चली आ रही भारत की गंगा-जमुनी सभ्यता और उसकी आत्मा पर एक प्रहार था। ऐसे में एक तूफान तो उठना था ही, सो वह शाहीन बाग से उठा और देखते ही देखते उसने सारे देश को अपनी चपेट में ले लिया। इसी तूफान से उठने वाली घटाओं से मोदी सरकार घबरा गई। और चार फरवरी को मोदी सरकार ने एनआरसी और एनपीआर पर पीछे हटने के संकेत दे दिए।

लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि संघ अथवा नरेंद्र मोदी अपने हिंदू राष्ट्र के पक्ष से ही हट गए। वह खतरा अभी भी पूरी तरह से मंडरा रहा है क्योंकि संविधान में नागरिकता को धर्म से जोड़कर सरकार ने हिंदू राष्ट्र का ढांचा तैयार कर लिया है। जब तक संशोधित नागरिकता कानून-2019 कायम है तब तक भारत को एक हिंदू राष्ट्र बनाने का खतरा कायम है। अतः इस संबंध में चलने वाला आंदोलन किसी न किसी रूप में चलता रहना चाहिए। भले ही वह स्वरूप शाहीन बाग का धरना हो या इसका कोई दूसरा स्वरूप हो, यह अब तय करना होगा।

क्योंकि दिल्ली चुनाव के अवसर पर बीजेपी की ओर से शाहीन बाग धरने को लेकर दिल्ली में हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण की भरपूर चेष्टा हुई। हालांकि, बीजेपी दिल्ली में अपने इस प्रयास में सफल नहीं हुई। परंतु शाहीन बाग एक दोधारी तलवार है जो कभी भी अपनों को भी काट सकती है। अतः इस संबंध में आगे क्या रणनीति हो, यह बहुत सोच-समझकर तय करना होगा।

शाहीन बाग आंदोलन ने एक और बात तय कर दी है। वह यह कि मोदी सरकार और बीजेपी की राजनीति की काट का केवल एक ही रास्ता है, जो सड़कों पर जन आंदोलन से निकलता है। शाहीन बाग विपक्ष की राजनीति के लिए एक सबक है। केवल चुनावी सभाओं और कभी-कभी जनता के बीच रैलियां करने से काम चलने वाला नहीं है, क्योंकि बीजेपी के पास सांप्रदायिकता का ब्रह्मास्त्र है। उसका प्रयोग कर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के रास्ते बीजेपी अंतिम समय में भी जीती बाजी हरा सकती है। पिछले लोकसभा चुनाव में यही हुआ। बीजेपी लगभग चुनाव हार चुकी थी लेकिन एक बालाकोट ने मोदीजी की डूबती नाव बीच मझदार में बचा ली।

इस कारण जनता के बीच केवल मुद्दे उठाने से काम नहीं चलेगा। अपितु अब जनता की राजनीतिक चेतना को बढ़ाना होगा। यह कार्य केवल जन आंदोलन से ही किया जा सकता है। अतः विपक्ष को भी अब सड़क का रास्ता ही अपनाना होगा। इंदिरा गांधी जब 1977-80 के बीच विपक्ष में थीं तो उन्होंने भी यही रणनीति अपनाई थी। शाहीन बाग इस बात को सिद्ध करता है कि गांधीवादी शांतिपूर्ण जन आंदोलन ही मोदी सरकार पर दबाव बना सकता है और उसको हरा भी सकता है। देश की अर्थव्यवस्था एक ऐसा ज्वलंत मुद्दा है कि जिस पर देशव्यापी एक बड़ा जन आंदोलन खड़ा किया जा सकता है। अब शाहीन बाग एक मॉडल है जिस पर चलकर ही मोदी की राजनीति की काट हो सकती है।

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Published: 07 Feb 2020, 8:04 PM