श्रीलंका से आए अधिकतर तमिल शरणार्थी हिंदू, लेकिन न्यू इंडिया के नागरिकता कानून में उनकी जगह नहीं

गांधीजी ने 8 अगस्त 1947 को कहा था कि हिंदुस्तान हर उस इंसान का है जो यहां पैदा हुआ और यहां पला-बढ़ा। जिसके पास कोई देश नहीं, जो किसी देश को अपना नहीं कह सकता उसका भी। बात बात पर गांधी को याद करने वाले लोग नागरिकता कानून में इसे ध्यान में रखते तो अच्छा होता

फोटोः सोशल मीडिया
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महेन्द्र पांडे

प्रधानमंत्री से लेकर बीजेपी के छुटभैया नेता तक सभी नागरिकता संशोधन कानून के फायदे गिनाने में व्यस्त हैं। तीन देशों के अल्पसंख्यकों के मसीहा बन रहे हैं, अपने नागरिकों की जान लेकर और उन्हें बंद कर बता रहे हैं कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहे हैं। गांधी जी को भी इन सबमें घसीट रहे हैं। दूसरी तरफ देश में बसे लगभग एक लाख तमिल शरणार्थियों की चिंता किसी को नहीं है। श्रीलंका में लगभग तीन दशक तक चले गृह युद्ध के बाद ये शरणार्थी 1980 और 1990 के दशक में भारत आए थे। इन लोगों को उम्मीद थी कि नए कानून में इन्हें भी नागरिकता के लिए शामिल किया जाएगा, गृह मंत्री अमित शाह ने आश्वासन भी दिया था, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ और अब ये सभी शरणार्थी निराश हैं और डरे हुए हैं।

ये जो अब शरणार्थी हैं, दरअसल इन्हें अंग्रेजों ने वहां चाय बागानों में काम करने के लिए भारत से ही भेजा था। ये लोग वहीं बस गए पर तीन दशक तक चले सिंहली और तमिल लोगों के बीच हिंसक गृह युद्ध के बाद इनका सब कुछ छिन गया और ये शरणार्थी के तौर पर वापस भारत आ गए। इनमें से लगभग 65000 शरणार्थी तमिलनाडु में 107 शरणार्थी शिविरों में रहते हैं। इन्हें तमिलनाडु सरकार की तरफ से मुफ्त शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और थोड़ी आर्थिक मदद मिलती है। स्त्रियों को 1000 रुपये, पुरुषों को 750 रुपये और बच्चों को 400 रुपये प्रतिमाह दिए जाते हैं। पर, इनके पास कोई सरकारी कागज नहीं है और न ही मजदूरी छोड़कर कोई अन्य रोजगार के अवसर। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री लगातार पाकिस्तान के अल्पसंख्यक हिन्दुओं की चर्चा करते हैं, पर श्रीलंका के शरणार्थी हिन्दुओं की उन्हें कोई चिंता नहीं है।

अधिकतर शरणार्थी बचपन से भारत में ही रहे हैं। इन शरणार्थी शिविरों में लगभग 25000 बच्चे भी पैदा हुए हैं, जिन्होंने केवल भारत ही देखा है। पर, दुखद तथ्य यह भी है कि इनके भविष्य के बारे में सरकार चुप है। ह्यूमन राइट्स वाच नामक संस्था के दक्षिण एशिया की निदेशक मीनाक्षी गांगुली के अनुसार यह एक गंभीर स्थिति है, क्योंकि भारत सरकार इनके बारे में नहीं सोचती। इन्हें डर है कि इन्हें वापस श्रीलंका जाना पड़ेगा, जहां इनका सबकुछ छीन गया था और वहां की सरकार ने इनके घर और जमीन को छीन लिया था।

इनमें से 65 लोगों ने सम्मिलित तौर पर मद्रास हाई कोर्ट के मदुरै बेंच में भारत की नागरिकता के लिए याचिका दायर किया है, पर कानून के इंसाफ में तो इनकी अनेक पुश्तें बीत जाएंगीं। इस बीच शिव सेना के संजय राउत ने इन शरणार्थियों का मुद्दा उठाया है और इन्हें नागरिकता प्रदान करने की मांग की है। श्री श्री रविशंकर भी लम्बे समय से यह मांग करते रहे हैं, और अब कमल हासन भी इनके समर्थन में उतर गए हैं।

इन शरणार्थियों में दो प्रकार के तमिल हैं- सबसे बड़ी संख्या उनकी है जिन्हें भारत से अंग्रेजों ने चाय बागानों में काम करने के लिए भेजा था, बाकी श्रीलंका के ही मूल निवासी हैं। इनमें अधिकतर लोग हिन्दू हैं और शेष क्रिश्चन हैं। इन सबके बाद भी भारत सरकार को केवल पड़ोसी मुस्लिम देशों के ही हिन्दुओं की चिंता सता रही है तो सरकार की मंशा पर सवाल उठना तो लाजिमी है। कुछ समय से सरकारी तौर पर बाहर से आने वालों के लिए अपनी सुविधा के अनुसार दो अलग शब्द प्रयोग किये जा रहे हैं- घुसपैठिया और शरणार्थीl। शरणार्थी सरकारी लहजे में वो है जो मुस्लिम ना हो, और इसके अतिथि जैसे सत्कार की बात की जा रही है। पर, श्रीलंका से आये सभी लोग तो शरणार्थी ही हैं और हिन्दू भी, फिर भी इनकी चिंता किसी को नहीं है।

बात बात पर गांधी जी को याद करने वाले हमारे प्रधानमंत्री इस मामले में भी गांधी जी को याद करते तो अच्छा होता। आठ अगस्त 1947 को महात्मा गांधी ने 'भारत और भारतीयता' पर जो कहा वो सबसे ज्यादा उल्लेखनीय है- ''हिंदुस्तान हर उस इंसान का है जो यहां पैदा हुआ और यहां पला-बढ़ा। जिसके पास कोई देश नहीं, जो किसी देश को अपना नहीं कह सकता उसका भीl”

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