10 मई, 1857: पहले स्वतंत्रता संग्राम का वह क्रांतिकारी आग़ाज़

बूढ़े भारत में जब आई फिर से नई जवानी थी। यह बगावत स्वतंत्रता संग्राम में बदलकर देश के बड़े हिस्से में फैल गई थी।

सांकेतिक तस्वीर
i
user

कृष्ण प्रताप सिंह

google_preferred_badge

दस मई 1857। यही वह तारीख थी, जब हमने गोरी ईस्ट इंडिया कंपनी की गुलामी के विरुद्ध अपने पहले स्वतंत्रता संग्राम का आगाज कर उसके आकाओं के होश फाख्ता कर दिए थे। इसकी शुरुआत मेरठ छावनी में कंपनी के देसी सैनिकों ने की थी। वे महसूस करने लगे थे कि कंपनी के बहुविध शोषण ने सारे देशवासियों का सुख-चैन हराम कर दिया है। 

उस दस मई को रविवार था। छुट्टी का दिन। अंग्रेज अधिकारी छुट्टी के मूड में थे। तभी देसी सैनिकों ने मेरठ की जेल पर हमला कर दिया और वहां बंद अपने 85 साथियों को छुड़ा लिया।इन 85 साथियों ने कुछ दिन पहले गाय और सुअर की चर्बी वाले नए कारतूस (बंदूक में भरने से पहले जिनका खोल दांतों से उतारना पड़ता था) इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया था। इसके बाद उन्हें जेल भेज दिया गया था।

इसके बाद जो भी फौजी या गैर फौजी अंग्रेज सामने आया, बागी सैनिकों ने उन्हें मौत के घाट उतार दिया। सारे बंगलों को आग के हवाले कर दिया, जिनमें अंग्रेज अफसर रहते थे। अगले दिन अपनी जीत का परचम लहराते हुए राजधानी दिल्ली जा पहुंचे। वहां उन्होंने अंग्रेजों द्वारा जबरन अपदस्थ कर दिए गए आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर को फिर से गद्दीनशीन कर बादशाह घोषित कर दिया। उनसे कहा, ‘आप हुक्म भर दे दें हमें, हम ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा लूटा गया आपका सारा खजाना लाकर फिर आपके कदमों में डाल देंगे।’    

हिन्दी की प्रतिष्ठित कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान के शब्दों में कहें तो इसके बाद बूढ़े भारत में फिर से नई जवानी आ गई थी और यह बगावत स्वतंत्रता संग्राम में बदलकर देश के बड़े हिस्से में फैल गई थी। 

सब के सब लड़े 

यह सब एक-दो दिन में ही संभव नहीं हो गया था। आजादी  के दीवाने ईस्ट इंडिया कंपनी की सेनाओं को अगले दो वर्षों तक पश्चिम में पंजाब, सिंध और बलूचिस्तान से लेकर पूर्व में अरुणाचल और मणिपुर और उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में केरल और कर्नाटक तक छकाते रहे थे। मैदानी इलाकों में अन्य लोगों ने अपनी-अपनी तरह से अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था। 

बीस दिन बाद 30 मई को लपटें अवध की राजधानी लखनऊ पहुंचीं। बागियों ने वहां ईस्ट इंडिया कंपनी की सत्ता रेजीडेंसी तक सीमित कर दी। अंग्रेजों को उसी में कैद कर दिया और अपदस्थ एवं निर्वासित नवाब वाजिद अली शाह के अवयस्क बेटे बिरजिस कद्र को नवाब बनाकर गद्दीनशीन कर दिया।

इतिहासकार, पत्रकार व स्वतंत्रता सेनानी पंडित सुंदरलाल ने अपनी बहुचर्चित पुस्तक 'भारत में अंग्रेजी राज' में लिखा है कि इस स्वतंत्रता संग्राम की जितनी अच्छी तैयारी अवध में की गई, देश में और कहीं नहीं की गई थी। इन तैयारियों की ही बदौलत बिरजिस की संरक्षक बनीं उनकी मां बेगम हजरतमहल अवध को फिर से हथियाने की ताक में लगी कंपनी की सेनाओं को दिल्ली के उनके फिर से कब्जे में आ जाने के कई महीनों बाद तक मजा चखाती रहीं।


अयोध्या में साधु-फकीर

अब अयोध्या और उसके आस-पास के स्वतंत्रता संग्राम का हाल। 1858 की सर्दियां आते-आते अंग्रेजों ने अवध के ज्यादातर हिस्सों पर फिर से नियंत्रण स्थापित कर लिया था, लेकिन अयोध्या के सरयूपार के पड़ोसी गोंडा जिले में संग्राम की आग अभी भी धू-धू करके जल रही थी। वहां के महाराजा देवीबख्श सिंह की हिन्दू-मुस्लिम एकता की शक्ति से मंडित विशाल सेना जांबाजी में अपना सानी नहीं रखती थी और अंग्रेजों के किसी भी हमले को नाकाम कर डालती थी। 

घाघरा और सरयू नदियों के संगम पर स्थित तुलसीपुर के मांझा में एक भिड़ंत में इस सेना ने अपने दुस्साहसों के लिए प्रसिद्ध अंग्रेज जनरल होपग्रांट तक को अपना-सा मुंह लेकर वापस लौट जाने को विवश कर दिया, तो उसने खीझकर ब्रिगेडियर रोक्राफ्ट के साथ गोंडा पर दुतरफा हमले की योजना बनाई। इसके तहत रोक्राफ्ट तो जल्दी ही घाघरा पारकर टेढ़ी नदी के उत्तरी तट पर स्थित लमती-लोलपुर के ऐतिहासिक मैदान में जा पहुंचा, लेकिन बेहद कड़े प्रतिरोध ने अयोध्या की ओर से होपग्रांट का सरयू पार करना दूभर कर दिया। होपग्रांट ने देखा कि सैन्यबल से काम नहीं चल रहा तो छल-छद्म से अयोध्या के राजा मान सिंह को अपनी ओर मिला लिया। 

जून 1857 में बागियों ने अयोध्या को अंग्रेजों से मुक्त कराया तो उसका प्रबंध इन्हीं मान सिंह को सौंपा था। तब मान सिंह बेगम हजरतमहल के सिपहसालारों में से एक थे और गोंडा की सेना को अभी भी उनसे वफा की उम्मीद थी। लेकिन उन्होंने विश्वासघात करके होपग्रांट के ज्यादातर सैनिकों को सरयू के विभिन्न घाटों से साधुओं-फकीरों और दूधियों के वेश में उस पार उतरवा दिया। इस निर्देश के साथ कि वे मुकाबले के वक्त तक अपने अस्त्र-शस़्त्र छिपाए रखें। मान सिंह जानते थे कि उन घाटों पर साधुओं-फकीरों और दूधियों की आवाजाही इतनी आम है कि उनकी संख्या थोड़ी ज्यादा हो जाने पर भी कोई संदेह नहीं करेगा। गोंडा की सेना तो उन पर इसलिए भी गोलियां चलाने से रही कि वे उसके लिए अंग्रेजों की सैन्य गतिविधियों के महत्वपूर्ण सूचना-स्रोत थे। 

 खैर, लमती-लोलपुर में घमासान आरंभ हुआ तो गोंडा के सैनिकों को एकबारगी समझ में ही नहीं आया कि ये साधु-फकीर और दूधिये अचानक उनपर आक्रामक क्यों हो उठे हैं? जब तक वे माजरा समझ पाते, घिरकर रह गए। उनके एक ओर रोक्राफ्ट था, दूसरी ओर होपग्रांट और तीसरी ओर मान सिंह। इसके बावजूद वे उन्हें हफ्ते भर छकाते रहे। भले ही उनके प्रतिद्वंद्वियों के पास कहीं ज्यादा उन्नत अस़्त्र-शस़्त्र और साजोसामान थे। 


मान सिंह का विश्वासघात इस हद तक पहुंच गया कि गोंडा के तोपचियों को बारूद की जगह बालू भरे गोले पहुंचा दिए गए, जो वक्त पर दगे ही नहीं, तो भी इन सैनिकों ने हार नहीं मानी और लाठियों, भालों, बर्छियों और तलवारों आदि पारंपरिक हथियारों से युद्ध जारी रखा। गोलों के अभाव में भी तोपचियों काले खां, हुसैन खां और मशीयत खां ने मैदान छोड़ना गवारा नहीं किया और आमने-सामने दो-दो हाथ करते शहीद हो गए। यह तब था, जब शाम को युद्ध थमने पर सेवक और चोबदार लाशों उठाते-उठाते थक जाते। 

हफ्ते भर की अनिर्णीत भिड़ंतों के बाद छह दिसंबर 1858 की सुबह गिनती हुई तो 21 हजार में सिर्फ आठ सौ सैनिक बचे थे। लाचार सेनापति ने उन्हें मैदान छोड़ने का आदेश दिया तो अंग्रेजों ने महाराजा देवीबख्श को जिन्दा या मुर्दा पकड़ने में अपनी पूरी शक्ति झोंक दी। उन आठ सौ ने जान की बाजी लगाकर महाराजा को बचाया और उन्हें बनकसिया के किले में ले गए तो अंग्रेज वहां भी जा धमके। इतिहासकार कहते हैं कि वहां उनमें आधे यानी चार सौ ने अपनी लाशें बिछा दीं, लेकिन महाराजा को खरोंच नहीं लगने दी। महाराजा ने भी उनके बलिदान की लाज रखी। सब कुछ गंवा देने के बावजूद आत्मसमर्पण कर क्षमादान पाने का महारानी विक्टोरिया का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। अंततः शिवालिक की पहाड़ियों में मलेरिया ने उनसे आखिरी सांस भी छीन ली।  उन दिनों जिस घाट से सर्वाधिक अंग्रेज सैनिक सरयू पार गए थे, लोग उसे अभी भी घृणापूर्वक ‘चोरघटवा’ यानी चोरों का घाट कहते हैं। 

Google न्यूज़व्हाट्सएपनवजीवन फेसबुक पेज और नवजीवन ट्विटर हैंडल पर जुड़ें

प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए, यहां क्लिक करें @navjivanindia