महिलाओं के खिलाफ अपराध और यौन-हिंसा पर उदासीन मीडिया

मीडिया से सामाज की समस्याएं गायब हो चुकी हैं और इसके बदले तिलिस्म को समाचार बता कर परोसा जा रहा है। पूंजीवाद ने दक्षिणपंथी विचारधारा को पूरी दुनिया पर लाद दिया है और इस विचारधारा की टूलबुक की शुरुआत ही महिलाओं के अधिकारों के दमन से शुरू होती है।

महिलाओं के खिलाफ अपराध और यौन-हिंसा पर उदासीन मीडिया
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महेन्द्र पांडे

वैश्विक स्तर पर महिलाओं का उत्पीड़न और यौन-हिंसा के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं- नए हाई-प्रोफाइल मामले सामने आ रहे हैं, सोशल मीडिया पर महिलाओं का उत्पीड़न बढ़ रहा है, आर्टफिशल इन्टेलिजेन्स का इस्तेमाल महिलाओं के विरुद्ध हथियार के तौर पर किया जा रहा है, गृह युद्ध और देशों के बीच सीधे युद्ध में भी यौन उत्पीड़न को मानो वैश्विक स्वीकृति मिल गई है और निरंकुश सरकारें भी जनता के मानवाधिकार दमन में महिलाओं के उत्पीड़न को एक घातक हथियार की तरह उपयोग में ला रही हैं।

ऐसे दौर में सामान्य तौर पर लगता है कि महिला उत्पीड़न और यौन-हिंसा के समाचार मीडिया में साल-दर-साल बढ़ते जा रहे होंगें। पर, यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के सेंटर फॉर जर्नलिजम एंड डेमोक्रेसी द्वारा किए गए अध्ययन से स्पष्ट होता है कि सामान्य धारणा के विपरीत महिला उत्पीड़न के समाचार मीडिया में कम होते जा रहे हैं।

साल 2017 से 2025 के बीच वैश्विक स्तर पर 1.14 अरब ऑनलाइन समाचारों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि साल 2025 में महिला उत्पीड़न और यौन-हिंसा से संबंधित समाचारों की संख्या कुल समाचारों की संख्या में महज 1.3 प्रतिशत रही, जो किसी भी वर्ष के मुकाबले सबसे कम है। ऐसे समाचारों की संख्या सर्वाधिक साल 2018 में रही, उस दौर में महिलाओं का चर्चित “मी टू” आंदोलन चरम पर था। अनेक अफ्रीकी देश लगातार गृह युद्ध की चपेट में रहे और महिलायें यौन-हिंसा का शिकार होती रहीं, पर अफ्रीकी मीडिया में वर्ष 2024 में कुल समाचारों में महज 1.18 प्रतिशत समाचारों में इनकी चर्चा थी।

लैंगिक समानता की लगातार चर्चा करती मीडिया द्वारा महिलाओं के शोषण और उन पर होती हिंसा की उपेक्षा करना पत्रकारिता के सामाजिक सरोकारों की एक बड़ी विफलता है। यौन-हिंसा और महिला उत्पीड़न के अधिकतर समाचारों में भी “लैंगिक असमानता”, उत्पीड़न और हिंसा जैसे शब्द गायब रहते हैं, जबकि यही विषय समाचारों का आधार हैं। ऐसे समाचारों में अधिकतर वक्तव्य पुरुषों के रहते हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार महिला उत्पीड़न के समाचारों में औसतन प्रति महिला के वक्तव्यों की तुलना में 1.5 पुरुषों, यानि डेढ़ गुणा, पुरुषों के वक्तव्य शामिल रहते हैं। ऐसे समाचारों में विशेषज्ञों के तौर पर जिनके वक्तव्य प्रकाशित किए जाते हैं, उनमें पुरुषों की संख्या ही अधिक रहती है।

दुनिया में 9 में 1 महिला पिछले 12 महीनों में कम से कम एक बार हिंसा का शिकार हुई है। लगभग एक-तिहाई महिलायें अपने जीवनकाल में हिंसा का सामना कर चुकी हैं। सोशल मीडिया ने महिलाओं पर हिंसा का पैमाना बड़ा कर दिया है, लगभग 60 प्रतिशत महिलायें ऑनलाइन हिंसा का शिकार हैं। जाहिर है, महिलाओं का दमन किया जा रहा है और दूसरी तरफ मीडिया इस विषय पर खामोश होता जा रहा है। समस्या यह है कि, महिलाओं पर हिंसा के जो समाचार प्रकाशित होते भी हैं, उनमें महिलाओं की समस्या से अधिक दूसरे आयाम डालकर इन समाचारों को सनसनीखेज बनाए जाने का प्रयास रहता है। ऐसे समाचारों को महिलाओं पर हिंसा या लैंगिक असमानता की तरह नहीं बल्कि एक दुर्घटना की तरह प्रकाशित किया जाता है जिसमें पीड़ित महिला का दुख-दर्द छोड़कर सबकुछ रहता है।

हमारे देश में जब भी महिलाओं पर हिंसा की घटनाएं होती हैं, सबसे पहले पीड़िता और आरोपी का धर्म देखा जाता है। यदि पीड़िता हिन्दू है और आरोपी किसी और धर्म का- तब पुलिस, मीडिया और न्यायपालिकाओं को हिंसा समझ में आती है- वरना दूसरे धर्म की पीड़ित महिलाओं को न्याय नहीं बल्कि चरित्र-हनन का सामना करना पड़ता है और ऊंची जाति के हिन्दू आरोपी को न्याय व्यवस्था और अनेक मामलों में मीडिया भी बचाने में लग जाती है।

वहीं दूसरे धर्मों के आरोपियों के घर अचानक से अवैध करार दिए जाते हैं और इन्हें आनन-फानन में बुलडोजर से गिरा दिया जाता है और इस तमाशे का सीधा प्रसारण सभी समाचार चैनलों पर किया जाता है। हमारा मीडिया महिलाओं पर अत्याचार की घटना को धार्मिक एजेंडा में बदल देती है। ऐसे में मीडिया के समाचारों के सुर ही पूरे बदल जाते हैं। यदि आरोपी सत्ता में रसूख वाला व्यक्ति है तब तो उसे बचाने पूरी सत्ता ही कैमरे के सामने पहुंच जाती है।

देश में गृह मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले नेशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो हरेक वर्ष अपराध के आंकड़े प्रकाशित करता था, इसमें महिलाओं पर अपराध के बारे में भी अलग से आंकड़े होते थे। पर, वर्ष 2023 के बाद के आंकड़े अभी तक प्रकाशित नहीं किए गए हैं। इन आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2021 की तुलना में महिलाओं से संबंधित अपराध वर्ष 2022 में अधिक दर्ज किए गए और वर्ष 2023 में इन दोनों वर्षों से भी अधिक मामले दर्ज किए गए।

हमारे देश में महिलाओं से संबंधित इतने अपराध होते हैं कि जब तक एक मामले की खबर मीडिया में आती है तब तक ऐसे अनेक दूसरे मामले उछलने लगते हैं। ऐसे में किसी एक मामले की चर्चा तो खूब होती है, पर इस चर्चा में दूसरे कई मामले मीडिया से ओझल रह जाते हैं। महिलाओं से संबंधित अपराधों में भी मीडिया इसके धार्मिक और राजनैतिक रंग अधिक प्रचारित करता है। महिला पहलवानों ने लंबे समय तक तत्कालीन बीजेपी सांसद ब्रजभूषण शरण सिंह के खिलाफ प्रदर्शन किया। इसकी रिपोर्टिंग भी व्यापक तरीके से की गई, पर केवल शुरुआती समाचारों में ही महिला पहलवानों के मांगों को लिखा गया– इसके बाद तो समाचारों में प्रदर्शन करने वाली महिलाओं के चरित्र हनन और इसके राजनैतिक पहलू पर पूरा जोर दिया जाने लगा।

ऐसा ही हाल पूरी दुनिया में तहलका मचाने वाली एपस्टीन फाइल मामले का है। इस मामले से पूरी दुनिया के राजनैतिक नेताओं, पूंजीपतियों और अपराधियों द्वारा महिलाओं पर हिंसा के संगठित कारोबार का खुलासा हुआ। इसकी कभी-कभी रिपोर्टिंग मीडिया में की जाती थी और विदेशी नेताओं और पूंजीपतियों के नाम भी बताए जाते थे, पर जब से हमारे देश के सत्ता के शीर्षस्थ नेताओं के नाम सामने आए- यह पूरा मुद्दा ही मीडिया से गायब हो गया।

इस रिपोर्ट में वर्ष 2017 से फरवरी 2026 के बीच एपस्टीन फाइल से संबंधित वैश्विक मीडिया में प्रकाशित 10 लाख से अधिक समाचारों का विश्लेषण किया गया है। इन समाचारों में सनसनीखेज नामों पर खूब चर्चा की जाती है पर लैंगिक असमानता, महिलाओं पर हिंसा या समाज की पितृसत्तात्मक विचारधारा का शायद ही कभी उल्लेख रहता है। इन दस लाख समाचारों में महज 1 प्रतिशत में महिलाओं पर हुए अपराधों का जिक्र है और 0.1 प्रतिशत समाचारों में हिंसा या लैंगिक असमानता का उल्लेख है।

आज के दौर का मीडिया पूंजीपतियों का एक उद्योग है, और उद्योग को मुनाफे में रखने के लिए सामाजिक सरोकारों की नहीं बल्कि सनसनीखेज समाचारों को उत्पाद के तौर पर प्रस्तुत करना जरूरी है। मीडिया से सामाज की समस्याएं गायब हो चुकी हैं और इसके बदले तिलिस्म को समाचार बता कर परोसा जा रहा है। पूंजीवाद ने दक्षिणपंथी विचारधारा को पूरी दुनिया पर लाद दिया है और इस विचारधारा की टूलबुक की शुरुआत ही महिलाओं के अधिकारों के दमन से शुरू होती है।

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