तीन जनवरी के संदेश और तीन महिलाएं: सावित्री बाई फूले, फातिमा शेख और इंदिरा गांधी

3 जनवरी को इंदिरा गांधी को भी खासतौर से याद किया गया, क्योंकि यह वह तारीख है जब स्वर्ण सिंह की अध्यक्षता वाली समिति की अनुशंसा पर उन्होंने 42वां संविधान संशोधन कर संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद को जोड़ा, जिसकी अहमियत आज समझ आ रही है

फोटोः सोशल मीडिया
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अनिल चमड़िया

बचपन से जन्म तिथियों के अवसरों पर कार्यक्रमों को होते देख रहा हूं। ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ देश में आंदोलन करने वाले कांग्रेस के नेताओं की जन्मतिथि और पुण्यतिथि के कार्यक्रम खासतौर से होते रहे हैं। लेकिन भारतीय समाज में अब एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जिसमें कि राजनीतिक आजादी के अलावा सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक आजादी के लिए आंदोलन करने वाले नेतृत्व को लोग अपनी चेतना की विरासत के रूप में स्थापित कर रहे हैं।

3 जनवरी को सावित्री बाई फूले का जन्मदिन था। जोती बा फूले और सावित्री बाई पति-पत्नी थे। जोती बा ने समाज के उस हिस्से को शिक्षित करने के लिए संस्थाओं की स्थापना की, जिन्हें मनु शास्त्र के अनुसार पढ़ने-लिखने की मनाही थी। उनमें विशेषकर भारतीय समाज की महिलाएं थीं, जिन्हें एक जाति के रूप में उसी तरह पहचान की गई जिस तरह से एक वर्ण के रुप में शुद्रों की पहचान की गई। इनमें अस्पृश्य भी शामिल हैं। इन्हें भी महिलाओं की तरह पढ़ने-लिखने की मनाही थी। जोती बा ने सावित्री बाई को भी पढ़ाया और उन्हें वंचित को शिक्षित करने के उद्देश्य से जोड़ने में भरपूर मदद की। सावित्री बाई ने अपने साथ फातिमा शेख को भी हमसफर बनाया, क्योंकि भारतीय समाज में स्त्रियों का स्त्री होने के अलावा और कोई धर्म नहीं दिखाई देता था।

पिछले कुछ वर्षों का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि भारतीय समाज ने 3 जनवरी 2020 को जितने बड़े पैमाने पर सामाजिक संगठनों और संस्थाओं ने जितनी जगहों पर सावित्री बाई फूले और फातिमा शेख को याद किया, वह भारतीय समाज के इतिहास की एक नई घटना के रुप में सामने आता है। सावित्री बाई फूले और फातिमा शेख महाराष्ट्र से संबंध रखती थीं और उनका कार्य क्षेत्र भी वहीं था। लेकिन समाज के लिए प्रेरणा लेने के लिए कोई भूगोल महत्व नहीं रखता है। बल्कि यह प्रश्न खड़ा करता है कि कैसे बड़ा भूगोल इस तरह की प्रेरणा से वंचित रहा है । खासतौर से उत्तर भारत में यह देखा जा रहा है कि सावित्री बाई और फातिमा शेख को बड़े स्तर पर अपने लिए प्रेरणादायी के रुप में लोग महसूस कर रहे हैं।

यह कहा जा सकता है कि उत्तर भारत यानी हिन्दी पट्टी खासतौर से महाराष्ट्र और दक्षिण के राज्यों में चले राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक आजादी और हिस्सेदारी के आंदोलनों को अपनी विरासत का हिस्सा मान रहा है। यह उत्तर भारत में सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलनों के दायरे के बेहद तंग होने का भी सूचक है। दरअसल उत्तर भारत में वंचित हिस्सों की आजादी और हिस्सेदारी के लिए जो सामाजिक, सांस्कृतिक आंदोलन हुए हैं, वे यहां के वर्चस्ववादी सांस्कृतिक आंदोलनों से बुरी तरह दबे रहे हैं।

सावित्री बाई फूले की तरह डॉ. अम्बेडकर भी हाल के वर्षों में उत्तर भारत के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रेरणा स्रोत के रुप में सामने आए हैं। देश में संविधान की व्यवस्था को सुरक्षित रखने और मजबूत करने की एक राजनीतिक चेतना का विस्फोट यदि उत्तर भारत में भी दिखाई देता है तो वह डॉ. अम्बेडकर को अपनी विरासत समझने वाली चेतना का ही परिष्कार हैं। देश में पिछले कुछ वर्षों में संविधान दिवस बड़े पैमाने पर मनाया जाने लगा है, जबकि पहले यह सरकारी दफ्तरों और कार्यक्रमों में औपचारिकता पूरा करने का एक दिवस मात्र था।

दिवसों का समाजशास्त्र ही नहीं बदला है, बल्कि उसने एक राजनीतिक प्रभाव विकसित किया है। सावित्री बाई फूले और फातिमा शेख को एक साथ याद किया जाना, वास्तव में भारतीय समाज को धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर मजबूत करने की एक विचारधारा का हिस्सा है। इतिहास में एक तिथि में कई समान घटनाएं महज संयोग नहीं होती हैं। यह समाज में चल रहे वैचारिक आंदोलन का हिस्सा होता है। विचार किसी भूगोल का दास नहीं होता है, बल्कि स्थितियां और परिस्थितियां विचार के भूगोल की सीमाओं को तोड़ देती हैं। समय काल के साथ उनके संगठित होने की यात्रा पूरी होती है और उनका एक विस्तृत रुप उभर कर समाज के बड़े हिस्से के बीच भविष्य को सुनिश्चित करने की कोशिश करता है।

3 जनवरी को इंदिरा गांधी को भी कई जगहों पर याद किया गया। यह ठीक उसी तरह की स्थिति कही जा सकती है, जैसे उत्तर भारत में पहले सावित्री बाई को याद करने के गिने-चुने कार्यक्रम होते थे। उत्तर प्रदेश में इंदिरा गांघी को खासतौर से 3 जनवरी को याद किया गया। कई जिलों में उनकी प्रतिमाओं पर लोगों ने जाकर धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद को संविधान में मुखरित करने के लिए उन्हें याद किया।

इंदिरा गांधी के 42वें संविधान संशोधन की कई मायने में आलोचना की जाती है। लेकिन स्वर्ण सिंह की अध्यक्षता वाली समिति की अनुशंसा पर उन्होंने संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद को जोड़ा। जिस समय यह जोड़ा गया उसकी अहमियत को समाज का वह हिस्सा अब समझ रहा है जिसे अपने देश की अखंडता और एकता बिना दूसरी कोई कल्पना नहीं है। भारत जैसे समाज में धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद के विचार उसकी सबसे बड़ी जरूरत के रुप में महसूस किए जा रहे हैं।

ऐसे ही समय में 3 जनवरी को इंदिरा गांधी को खासतौर से कई जगहों पर याद किया गया। यह वह तारीख है जब भारतीय समाज की इन दो बुनियादी अवधारणाओं को 1977 में संविधान में साफ तौर पर रेखांकित किया गया। यह संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है, यह स्वीकार्य किया गया। एक तरह से सावित्री बाई फूले , फातिमा शेख और इंदिरा गांधी तक के प्रयास भारतीय समाज में एक वैसी विचारधारा का विस्तार दिखते हैं, जिन्हें भविष्य के लिए निरंतर मजबूत करने की कोशिश तीन जनवरी के कार्यक्रमों में दिखती है।

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