मोदी सरकार ने भारत को कुपोषित देश में तब्दील किया, महामारी जैसी विकराल समस्या बना अनेमिया

प्रधानमंत्री मोदी ऐसे में जनता को अर्थव्यवस्था और नारी सशक्तीकरण का सब्जबाग दिखा रहे हैं और मीडिया को केवल प्रधानमंत्री मोदी नजर आ रहे हैं। एक ऐसे देश में जहां मतदान से भी जनता बाहर कर दी जाती है, वहां जनता के लिए योजनाओं की तो उम्मीद ही नहीं है।

मोदी सरकार ने भारत को कुपोषित देश में तब्दील किया, महामारी जैसी विकराल समस्या बना अनेमिया
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महेन्द्र पांडे

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प्रधानमंत्री मोदी पिछले एक दशक से बस दो ही काम करते हैं– विपक्ष को कोसते हैं और अपने आप को विकास का मसीहा साबित करते हैं। इन सबके बीच देश हरेक मोर्चे पर नाकामी की नई परिभाषा लिख रहा है। एक ऐसी ही नाकामी है कुपोषण की– समस्या बढ़ती जा रही है और अब देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी इसकी चपेट में है। तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के ख्वाब में मोदी सरकार ने देश को दुनिया के सबसे कुपोषित देश में तब्दील कर दिया है।

कुपोषण का सबसे आसान संकेतक, अनेमिया यानि खून की कमी, है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश के 5 वर्ष से कम उम्र के कुल बच्चों में से 67.1 प्रतिशत और किशोर बालिकाओं में से 59.1 प्रतिशत बालिकाएं खून की कमी की चपेट में हैं। देश में लगभग तीन-चौथाई आबादी को आइरन का पूरा पोषण नहीं मिलता है। प्रधानमंत्री मोदी लगातार भविष्य और वर्ष 2047 की बातें करते हैं, पर आंकड़ों में तो देश का भविष्य कुपोषित और अंधकारमय ही नजर आता है।

ये सभी आंकड़े किसी गैर-सरकारी संगठन के नहीं हैं बल्कि प्रेस इनफार्मेशन ब्युरो द्वारा 18 अप्रैल 2025 की विज्ञप्ति में प्रकाशित हैं। अनेमिया का मुख्य कारण पोषण में आइरन की कमी है जिससे रक्त में हीमोग्लोबिन की कमी हो जाती है। इसके दूसरे कारण फोलेट, विटामिन ए और विटामिन बी12 की कमी भी है। यह सब कुपोषण, कम उम्र में गर्भवती होने, गर्भवती महिलाओं की पूरी देखभाल ना होने और आइरन-समृद्ध खाद्य पदार्थों के उपलब्ध नहीं होने के कारण होता है।

यह स्थिति खतरनाक है क्योंकि इससे पूरा भविष्य प्रभावित होता है– बच्चों में अनेमिया के कारण उचित बौद्धिक विकास नहीं होता और गर्भवती महिलाओं में अनेमिया गर्भ में पल रहे शिशु को असामान्य कर देता है। अनेमिया की देश में चिंताजनक और आपातस्थिति के बाद भी सरकार के पास इससे निपटने की कोई गंभीर योजना नहीं है। मोदी राज में हरेक समस्या व्यापक होती जाती है क्योंकि सरकार के पास केवल भाषण, वादे और मोदी जी की तस्वीर वाले पोस्टर हैं। मोदी सरकार जनता से जुड़ी हरेक समस्या को बाइपास करती है और इसके बदले अर्थव्यवस्था की रंगीन तस्वीर में जनता को उलझाकर रखती है।


पीआईबी की इस विज्ञप्ति में कुछ आंकड़े ऐसे भी हैं जो इस समस्या के निवारण में मोदी सरकार की शर्मनाक असफलता की दास्तान बयान करते हैं। वर्ष 2019 में महज 30 प्रतिशत सामान्य महिलायें और 37 प्रतिशत गर्भवती महिलायें अनेमिया की चपेट में थीं। इसके बाद वर्ष 2019 से 2021 तक राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 5 कराया गया। इस सर्वेक्षण के अनुसार 15 से 48 वर्ष की 57 प्रतिशत और इसी आयु वर्ग में 52.2 प्रतिशत महिलायें अनेमिया की शिकार पाई गईं। इस तरह 2019 के बाद के दो वर्षों के भीतर ही अनेमिया की शिकार में सामान्य महिलाओं की संख्या में लगभग दोगुनी और गर्भवती महिला के संदर्भ में डेढ़-गुनी से अधिक वृद्धि हो गई।

यदि आप प्रधानमंत्री मोदी के वक्तव्यों को देखें तो स्पष्ट है कि जिस तेजी से देश की महिलायें अनेमिया की चपेट में आती जा रही हैं उससे अधिक तेजी से प्रधानमंत्री का महिला-सशक्तीकरण, नारी शक्ति और नारी वंदना का नारा बुलंद होता जा रहा है। पीआईबी के बुलेटिन में बताया गया है कि वैश्विक स्तर पर 15 से 49 वर्ष के आयुवर्ग की लगभग 50 करोड़ और पांच वर्ष से कम आयु के 27 करोड़ बच्चे अनेमिया-पीड़ित हैं– इन आंकड़ों के अनुसार तो यही समझ में आता है कि दुनिया में केवल भारत ऐसा देश है जहां की महिलायें और बच्चे अनेमिया के शिकार हैं। ऐसे में विकास, बड़ी अर्थव्यवस्था, विश्वगुरु और महिला सशक्तीकरण– सारे नारे महज चुटकुले नजर आते हैं। देश में मीडिया से तो कोई उम्मीद नहीं है पर आश्चर्य यह है कि विपक्ष भी इस स्वास्थ्य-आपात पर आवाज नहीं उठाता है।

नारी सशक्तीकरण के नारों के बीच अनेमिया के संदर्भ में लैंगिक असमानता पर भी ध्यान देना जरूरी है। राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 5 (2019-2021) के अनुसार, 15 से 49 वर्ष के आयुवर्ग के पुरुषों में अनेमिया की दर 25 प्रतिशत है, जबकि इसी आयुवर्ग की महिलाओं में इसका विस्तार 57 प्रतिशत है। किशोर बालकों (15 से 19 वर्ष) में 31.1 प्रतिशत बालक अनेमिया की चपेट में हैं जबकि किशोर बालिकाओं में यह दर 59.1 प्रतिशत है। गर्भवती महिलाओं में अनेमिया की दर 52.2 प्रतिशत है। सबसे बुरी स्थिति में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे हैं– 6 से 59 महीने के कुल बच्चों में से 67.1 प्रतिशत बच्चे अनेमिया की चपेट में हैं।

अनेमिया के संदर्भ में सबसे प्रभावित राज्यों में से अधिकतर ऐसे राज्य हैं जो बीजेपी शासित हैं। केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में लगभग 94 प्रतिशत 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चे, 78 प्रतिशत गर्भवती महिलायें और 94 प्रतिशत महिलायें अनेमिया की चपेट में हैं। गुजरात में 80 प्रतिशत बच्चे, 63 प्रतिशत गर्भवती महिलायें और 65 प्रतिशत महिलायें इस स्वास्थ्य समस्या से जूझ रही हैं। मध्य प्रदेश में 73 प्रतिशत बच्चों में रक्त की कमी है।


मोदी सरकार में कभी किसी भी समस्या का समाधान नहीं मिलता, क्योंकि कोई समस्या को समझना ही नहीं चाहता। देश में नारे, पोस्टर और विपक्ष पर हमले कर ही समस्याओं के समाधान की कोशिश की जाती है। अनेमिया की समस्या भविष्य की पीढ़ियों को भी प्रभावित कर रही है, बच्चों का बौद्धिक विकास प्रभावित हो रहा है और कमजोर बच्चे पैदा हो रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी ऐसे में जनता को अर्थव्यवस्था और नारी सशक्तीकरण का सब्जबाग दिखा रहे हैं और मीडिया को केवल प्रधानमंत्री मोदी नजर आ रहे हैं। एक ऐसे देश में जहां मतदान से भी जनता बाहर कर दी जाती है, वहां जनता के लिए योजनाओं की तो उम्मीद ही नहीं है।