गरीबों का मजाक उड़ाती मोदी सरकार, विश्व बैंक जैसी पूंजीवादी प्रचारक संस्थाएं भी भ्रम फैलाने में शामिल
पूंजीवाद हमेशा गरीबी घटाने पर विमर्श करता है, विमर्श जितना अधिक होता है, गरीबों की संख्या उतनी ही बढ़ती है। चरम पूंजीवाद में आर्थिक असमानता भी अपने सर्वोच्च स्तर पर रहती है, पर पूंजीवाद समर्थित सत्ता हमेशा जनता को इस मसले पर गुमराह करती रहती है।

अमेरिका में मिड-टर्म चुनावों में राष्ट्रपति ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी की करारी हार में महंगाई की प्रमुख भूमिका रही है। यूरोप के तमाम देशों में भी जो जन-आंदोलन हो रहे हैं, उसमें महंगाई एक प्रमुख मुद्दा है। चरम पूंजीवाद में आर्थिक असमानता भी अपने सर्वोच्च स्तर पर रहती है, पर पूंजीवाद समर्थित सत्ता हमेशा जनता को इस मसले पर गुमराह करती रहती है। पूंजीवाद का आधार ही यही है, जनता को लूटने के लिए जरूरी है कि उसके बीच भ्रम फैलाया जाए कि पूंजीवाद है इसीलिए जनता जिंदा है। यही भ्रम मोदी सरकार भी फैला रही है और विश्व बैंक जैसी पूंजीवादी प्रचारक संस्थाएं भी इसमें योगदान करती हैं।
विश्व बैंक ने हाल में ही “पॉवर्टी एंड एक्विटी ब्रीफ– इंडिया” प्रकाशित किया है, जिसमें बताया गया है कि भारत उन देशों में शुमार है जहां अत्यधिक गरीबी सबसे तेजी से कम हुई है। इसे प्रकाशित होते ही प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री समेत तमाम बीजेपी नेताओं ने इसे अपनी महान उपलबद्धि के तौर पर प्रचारित करना शुरू किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि गरीबी हटाओ उनके लिए महज एक नारा नहीं बल्कि जुनून है। खैर, मोदी सरकार द्वारा अधकचरी और अधूरी जानकारी जनता के बीच प्रस्तुत करना और इस पर जश्न मनाना मोदी सरकार की विशेषता रही है।
इस रिपोर्ट में वर्ष 2011 से 2023 तक के आंकड़े हैं, पर ध्यान से पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि वर्ष 2023 के बाद गरीबी कम करने की रफ्तार बहुत धीमी हो गई है। विश्व बैंक के अनुसार, वर्ष 2011 से 2023 के बीच प्रति वर्ष लगभग 4 प्रतिशत आबादी गरीबी से बाहर निकालने में सफल रही, पर इसके बाद से यह दर औसतन 0.8 प्रतिशत पर सिमट गई। स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री मोदी के तीसरे कार्यकाल में गरीबों को उनके हाल पर और 5 किलो मुफ़्त अनाज पर छोड़ दिया गया है।
विश्व बैंक के अनुसार, चरम गरीबी से जूझते लोगों की संख्या वर्ष 2011 में 27.1 प्रतिशत थी, जो वर्ष 2023 तक 2.6 प्रतिशत ही रह गई। चरम गरीबी का पैमाना है कि आप कम से कम 3 डॉलर प्रतिदिन से भी कम कमा पाते हैं। सामान्य नजरिये से यह बेहद बड़ी उपलब्द्धि नजर आती है क्योंकि डॉलर को हम आमतौर पर लगभग 100 रुपये मान, उससे डॉलर को रुपये में बदलते हैं, यानि चरम गरीबी का पैमाना हमारी नजर में 300 रुपये प्रतिदिन या 9000 रुपये प्रति माह नजर आता है।

पर, विश्व बैंक के लिए यह पैमाना भारत के लिए 3 डॉलर प्रतिदिन या 60 रुपये प्रतिदिन है। यानि विश्व बैंक की नजर में हरेक महीने 1800 रुपये या इससे कम कमाने वाला ही चरम गरीब है। जरा सोचिए, कोई सरकार महीने में 1800 रुपये कमाने वाले को भी गरीबी रेखा से बाहर बताकर कैसे खुश हो सकती है? विकास का ढोल लगातार पीटने के बाद भी प्रधानमंत्री मोदी इस तथ्य से आह्लादित हो रहे हैं कि देश में 2.6 प्रतिशत आबादी की आय महीने में 1800 रुपये भी नहीं है।
विश्व बैंक ने भारत को निम्न मध्यम आय वर्ग वाले देशों में वर्गीकृत किया है। इस वर्ग के लिए विश्व बैंक के गरीबी का पैमाना 4.20 डॉलर प्रतिदिन की आय है। भारत के लिए विश्व बैंक ने यह पैमाना 85 रुपये प्रतिदिन रखा है, यानि 2550 रुपये प्रति माह रखा है। इससे नीचे के आय वाली आबादी वर्ष 2011 में 57.7 प्रतिशत थी, पर वर्ष 2023 में 16.1 प्रतिशत आबादी इससे भी कम आय वर्ग में थी। आश्चर्य यह है कि विश्व बैंक की ही दिसंबर 2025 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में यह आंकड़ा भारत के लिए 24 प्रतिशत था, जबकि वैश्विक औसत 19 प्रतिशत ही था।
विश्व बैंक का अनुमान है कि अब गरीबी रेखा को पार करने की दर भारत में कम होती जा रही है और वर्ष 2028 तक यह आबादी 12.1 प्रतिशत रहेगी। इन आंकड़ों के संदर्भ में देखें तो स्पष्ट है कि वर्ष 2011 से 2023 के बीच हरेक वर्ष औसतन 3.5 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से बाहर आ रही थी, पर वर्ष 2023 के बाद से यह दर महज 0.8 प्रतिशत ही रह गई। जाहिर है, अब मोदी सरकार में गरीबी रेखा से जनता को बाहर करना एक उपेक्षित विषय हो गया है। तभी, बड़ी अर्थव्यवस्था, 5 खरब डॉलर वाली अर्थव्यवस्था, विकसित राष्ट्र और गरीबी रेखा पर वक्तव्यों की भरमार है। मोदी सरकार के पास हरेक समस्या का हल रंगीन विज्ञापनों में और विपक्ष को कोसने में ही है, धरातल पर स्थिति और खराब होती जाती है।
विश्व बैंक की इस रिपोर्ट में और भी बहुत कुछ है जिसके बारे में प्रधानमंत्री मोदी या बड़बोली वित्त मंत्री ने कुछ नहीं बताया। उच्च मध्यम आय वाले देशों के लिए गरीबी का पैमाना 8.30 डॉलर प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति आय का है, विश्व बैंक के नजरिए से भारत के लिए यह आय 170 रुपये प्रतिदिन या 5100 रुपये प्रति माह है– भारत की 80 प्रतिशत से अधिक आबादी की आय इससे कम है जबकि इस वर्ग का वैश्विक औसत महज 43 प्रतिशत है।
इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत के सर्वाधिक आय वाली 10 प्रतिशत आबादी की आय सबसे गरीब 10 प्रतिशत आबादी की तुलना में 13 गुणा अधिक है। यानि आर्थिक असमानता देश में बहुत है। गरीबी दर के संदर्भ में यह असमानता और अधिक नजर आती है– ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी दर 19.3 प्रतिशत है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह दर महज 8.6 प्रतिशत है। महिलाओं में गरीबी दर 16.6 प्रतिशत की तुलना में पुरुषों में 15.7 प्रतिशत ही है। 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों और किशोरों में गरीबी दर लगभग 22 प्रतिशत है, जबकि इसके बाद की उम्र में यह दर 14 प्रतिशत रह जाती है।
अभी उत्तर प्रदेश में चुनावों की तैयारियां चल रही हैं और मुख्यमंत्री आदित्यनाथ विकास के अनवरत दावे कर रहे होंगे– पर विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक के क्षेत्र में देश में सबसे अधिक गरीबी है और देश के 57 प्रतिशत गरीब इसी क्षेत्र के निवासी हैं।
हमारे देश में गरीबी हटाने के आंकड़े, विशेष तौर पर चुनावों के ठीक पहले, खूब प्रचारित किए जाते हैं और अनेक विशेषज्ञ इन्हें निराधार बताते हैं। सरकार की अपनी नीतियां भी इन आंकड़ों पर प्रश्न खड़ा करती हैं। वर्ष 2021 से 81 करोड़ से भी अधिक आबादी को हरेक महीने मुफ्त अनाज दिया जा रहा है और वर्ष 2028 तक यह सिलसिला चलता रहेगा। इन आंकड़ों से तो यही स्पष्ट होता है कि गरीबों की संख्या कम करने के दावों से सत्ता स्वयं आश्वस्त नहीं है। प्रधानमंत्री ने जनवरी 2024 में लोकसभा में वक्तव्य दिया था कि 25 करोड़ लोग पिछले 9 वर्षों में गरीबी रेखा से बाहर आकर मध्यम वर्ग में पहुंच गए हैं, पर उन्हें पहले जैसा ही सरकार द्वारा मुफ्त अनाज मिलता रहेगा। इससे इतना तो स्पष्ट है कि मध्यम वर्ग भी गरीब है और उसे भी हरेक महीने 5 किलो मुफ्त अनाज देकर जिन्दा रखने की जरूरत है।
लगातार बढ़ती वैश्विक अर्थव्यवस्था में हरेक व्यक्ति के स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, स्वच्छता, ऊर्जा, और सम्मानजनक जीवन व्यतीत करने के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने का सामर्थ्य है पर ऐसा होता नहीं है। पूंजीवाद समर्थित सत्ता में सभी संसाधन लूटे जाते हैं, जाहिर है ताकतवर ही इसे लूट सकते हैं। गरीबों के संसाधन अमीर लूटते हैं– यही लूट इन्हें पहले से अधिक अमीर बनाती है, और गरीब को पहले से भी अधिक गरीब। पूंजीवाद हमेशा गरीबी घटाने पर विमर्श करता है, विमर्श जितना अधिक होता है, गरीबों की संख्या उतनी ही बढ़ती है।
