मोदी सरकार को आज उसी ‘मनरेगा’ में नजर आ रही है उम्मीद, जिसे बताया था UPA की विफलता का प्रतीक

राहत पैकेज की घोषणा करते समय केंद्र की मोदी सरकार ने मनरेगा के लगभग 60 हजार करोड़ रुपए के बजट में 40 हजार करोड़ रुपए की वृद्धि कर इसे 1 लाख करोड़ रुपए कर दिया है।

फोटो : सोशल मीडिया
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भारत डोगरा

पहले से बदहाल रोजगार की स्थिति कोविड संक्रमण के चलते देश में लगे लॉकडाउन की वजह से और अधिक गंभीर स्थिति में पहुंच गई है। बहुत से लोगों का रोजगार छूट गया है और प्रवासी मजदूरों को तो बिना पैसे, बिना परिवहन सुविधा के भूखे प्यासे कई सौ किलोमीटर पैदल चल कर अपने मूल निवास लौटना पड़ा है। इस लॉकडाउन से पहले भी देश में बेरोजगारी की समस्या गंभीर थी। हाल के समय में आर्थिक विमर्श में यह बार-बार सामने आया है कि संतोषजनक रोजगार सृजन में कमी भारत के आर्थिक विकास की एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। बेरोजगारी की स्थिति लॉकडाउन से पहले भी पिछले 45 वर्षों में सबसे अधिक विकट पाई गई थी। बेहतर आर्थिक संवृद्धि के दिनों में भी रोजगार विहीन संवृद्धि या जॉबलेस ग्रोथ की समस्या सामने आती रही थी तो अब अर्थिक संवृद्धि की घटती दर के दौर में तो रोजगार बढ़ने के संदर्भ में और सजग होना ही पड़ेगा।

वैसे तो रोजगार सृजन के कार्यक्रम सदा महत्त्वपूर्ण रहे हैं, पर मौजूदा आर्थिक संवृद्धि कम होने के दौर में इसका महत्त्व और भी बढ़ गया है। अतः इस बारे में अधिक सजग रहना चाहिए कि यह कार्यक्रम कितने असरदार सिद्ध हो रहे हैं व इनमें क्या कमियां अभी रह गई हैं। आगामी दिनों में इन कार्यक्रमों में वृद्धि व सुधार बहुत जरूरी होंगे व लोगों की आजीविका सुनिश्चित करने में इनकी भूमिका और बढ़ जाएगी। रोजगार सृजन की दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण स्कीम है प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (क्रेडिट आधारित)। इस स्कीम के अंतर्गत वर्ष 2018-19 में 5.9 लाख रोजगारों का सृजन हुआ था। वित्तीय वर्ष 2019-20 में दिसंबर 31 तक के आंकड़े उपलब्ध हैं व इस दौरान इस स्कीम में मात्र 2.6 लाख रोजगारों का सृजन हुआ तो कि पिछले वर्ष की अपेक्षा बहुत ही कम है।

इस कार्यक्रम के लिए 2019-20 के बजट में 3,274 करोड़ रुपए का प्रावधान था। वर्ष 2020-21 में इसे कम करते हुए 2800 करोड़ रुपए कर दिया गया है। वर्ष 2017-18 में इस कार्यक्रम पर वास्तविक खर्च 4113 करोड़ रुपए था। इस तरह इस महत्त्वपूर्ण योजना में कटौती होती रही है। वर्ष 2019-20 में कौशल विकास मंत्रालय का बजट 2,989 करोड़ रुपए रखा गया था पर संशोधित अनुमान तैयार करते समय इसमें कटौती कर इसे 2,531 करोड़ रुपए कर दिया गया। इस मंत्रालय की मुख्य स्कीम प्रधानमंत्री की कौशल विकास योजना है। इसका वर्ष 2019-20 में मूल प्रावधान 2,677 करोड़ रुपए रखा गया था। संशोधित अनुमान तैयार करते समय इसे 2,247 करोड़ रुपए तक कम कर दिया गया। इस योजना का उपयोग पिछले तीन वर्षों से बहुत पीछे चल रहा है।

राष्ट्रीय कौशल प्रशिक्षण संस्थान व जन शिक्षण संस्थान की स्कीमों में पिछले एक वर्ष में आवंटन में कमी आने से महिलाओं के विकास के अवसरों को भी क्षति पहुंची है। इनका बजट अनुमान 107 करोड़ रुपए कम हुआ है। श्रम मंत्रालय के अंतर्गत रोजगार व कुशलता विकास प्रधानमंत्री रोजगार प्रोत्साहन योजना के लिए वर्ष 2019-20 में 4584 करोड़ रुपए का मूल प्रावधान था, जबकि संशोधित अनुमान तैयार करते समय इसे मात्र 3502 करोड़ रुपए तैयार कर दिया गया। वर्ष 2020-21 में इसके लिए मात्र 2646 करोड़ रुपए का प्रावधान रखा गया है। मनरेगा की ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन में महत्त्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। यदि वर्ष 2019-20 और 2020-21 के बजट अनुमानों की तुलना की जाए तो इस परियोजना के बजट में इतनी मामूली वृद्धि हुई है कि इससे महंगाई का असर भी दूर नहीं होता है। इतना ही नहीं, पिछले वर्ष की बकाया मजदूरी का मुद्दा अलग से है।

पिछले सप्ताह राहत पैकेज की घोषणा करते समय केंद्रीय सरकार ने मनरेगा के लगभग 60 हजार करोड़ रुपए के बजट में 40 हजार करोड़ रुपए की वृद्धि कर इसे 1 लाख करोड़ रुपए कर दिया है। इसका स्वागत होना चाहिए पर साथ ही दो सवाल उठाना जरूरी है। पहला सवाल तो यह है कि करोड़ों प्रवासी मजदूरों के अपने गांव में लौटने की स्थिति में क्या यह पर्याप्त है? वास्तव में जरूरत तो इससे भी अधिक वृद्धि की थी। दूसरा सवाल यह है कि आज कठिन वक्त में एनडीए सरकार को भी सबसे अधिक उम्मीद इसी योजना में नजर आ रही है, तो फिर पहले यूपीए सरकार की विफलता का प्रतीक बताते हुए मनरेगा की इतनी निन्दा क्यों की गई थी?

यह भी ध्यान में रखना होगा कि मनरेगा में अनेक तरह की अनियमितताएं आ गई हैं जिसकी वजह से इसकी रोजगार सृजन क्षमता पर प्रतिकूल असर पड़ा है। निर्धन मजदूरों को जिस राहत की गांवों में जरूरत है, वह मजदूरी के भुगतान में देरी के कारण प्राप्त नहीं हो पा रही है। पहले विशेष सूखा-राहत व आपदा-राहत कार्यों के अंतर्गत जो बहुत सा रोजगार ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को कठिन वक्त में प्राप्त होता था, वह अब प्राप्त नहीं हो रहा है क्योंकि मनरेगा के आने के बाद ऐसे विशेष राहत कार्य अधिकांश राज्यों में नजर नहीं आ रहे हैं। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना की रोजगार उपलब्धि की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।

वर्ष 2019-20 में इसके लिए 19000 करोड़ रुपए का प्रावधान था वह संशोधित अनुमान में मात्र 14070 करोड़ कर दिया गया। शहरी क्षेत्रों को देखें तो दीनदयाल अंत्योदय योजना - राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन रोजगार सृजन के लिए महत्त्वपूर्ण माना गया है। वित्तीय वर्ष 2018-19 में इस स्कीम के अंतर्गत कुशलता प्राप्त 1,80,000 व्यक्तियों का प्लेसमेंट हुआ, जबकि वित्तीय वर्ष 2019-20 के पहले 10 महीनों में मात्र 44,000 का प्लेसमेंट हुआ। इस तरह स्पष्ट है कि जो स्कीमें रोजगार सृजन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण स्कीमें हैं, लॉकडाउन से पहले भी उनमें कमी आई थी। इन स्कीमों को अधिक मजबूत व व्यापक बनाने के लिए जरूरी कदम सरकार को शीघ्र ही उठाने चाहिए। इसके लिए अधिक संसाधन उपलब्ध करवाने चाहिए व क्रियान्वयन को भी सुधारना चाहिए।

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