गंगा पर मोदी सरकार का रवैया बिलकुल स्पष्ट है, ‘प्रदूषण से मरिये नहीं तो आवाज उठाने पर हम मार डालेंगे’

स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद की मौत के बाद गंगा के लिए उपवास कर रहे एक और संत स्वामी गोपाल दास को भी ऋषिकेश के एम्स में जबरन भर्ती कराया गया था। स्वामी गोपाल दास ने 16 अक्टूबर को ऋषिकेश एम्स के मेडिकल सुप्रीटेंडेंट पर गंभीर आरोप लगाते हुए अंदेशा जाहीर किया कि स्वामी सानंद की मृत्यु प्राकृतिक नहीं थी

फोटोः महेंद्र पांडे
फोटोः महेंद्र पांडे
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महेन्द्र पांडे

हाल में ही राहुल गांधी ने ट्वीट कर संत गोपाल दास के बिगड़ते स्वास्थ्य पर चिंता प्रकट की थी। 16 अक्टूबर को संत गोपाल दास ने प्रेस कांफ्रेंस कर अपील की थी कि उन्हें प्रशासन फुटबॉल न बनाए, वे गंगा के लिए उपवास ही नहीं, बल्कि तपस्या कर रहे हैं। 11 अक्टूबर को स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद (डॉ जी डी अग्रवाल) की मौत की खबर के साथ-साथ स्वामी गोपाल दास की खबर भी आ रही थी। गंगा को बचाने के लिए 24 जून से बद्रीनाथ से उपवास आरंभ कर ऋषिकेश के त्रिवेणी घाट पहुंचकर अनशन कर रहे स्वामी गोपाल दास को भी ऋषिकेश के एम्स में जबरन भर्ती करा दिया गया था, और वहाँ वे अपने को असुरक्षित महसूस कर रहे थे। 16 अक्टूबर को स्वामी गोपाल दास को अस्पताल से हरिद्वार के कनखल स्थित मातृसदन आश्रम में पहुंचा दिया गया। वहीं पर आश्रम के मुख्य संचालक स्वामी शिवानन्द और स्वामी गोपाल दास ने शाम को 3 बजे एक प्रेस कांफ्रेंस की, जिसमें ऋषिकेश के एम्स के मेडिकल सुप्रीटेंडेंट पर गंभीर आरोप लगाए गए और आशंका प्रकट की गयी कि स्वामी सानंद की मृत्यु प्राकृतिक नहीं थी।

जैसा कि लगातार होता रहा है, प्रेस कांफ्रेंस के बाद प्रशासन ने फिर से अपनी ताकत दिखाते हुए स्वामी गोपाल दास को अगले ही दिन यानी 17 अक्टूबर को फिर से ऋषिकेश के एम्स में भर्ती करा दिया। कई लोगों का अनुमान है कि स्थानीय प्रशासन उनका भी वही हाल करने की तैयारी कर चुका है, जैसा स्वामी सानंद के साथ किया गया। पूरी स्थिति के जानकारों के अनुसार यह सब केंद्र की मोदी सरकार के इशारे पर किया जा रहा है। चुनावों के मौसम में बीजेपी ऐसे भी किसी तरह के विरोध को नहीं पचा पाती है और उस विरोध को कुचलने में लग जाती है।

वर्तमान में केंद्र सरकार की सबसे बड़ी विफलताओं में नमामि गंगे शामिल है। सरकार जितना इसका प्रचार करती है, गंगा की हालत और भी खराब हो जाती है। समस्या यह है कि प्रधानमंत्री, नितिन गडकरी और उमा भारती को लगता रहा है कि गंगा के बारे सारा ज्ञान उन्ही के पास है और गंगा की सफाई के बारे में झूठ बोलकर गंगा को साफ किया जा सकता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण गंगा के प्रवाह से संबंधित अधिसूचना है, जिसका खूब प्रचार किया गया। इस अधिसूचना को बनाने वालों को इतना भी नहीं पता था कि किसी भी नदी के लिए महत्वपूर्ण इकोलॉजिकल फ्लो होता है, जबकि अधिसूचना में लगातार वर्णित इनवायर्नमेंटल फ्लो का कोई मतलब ही नहीं होता है। इकोलॉजिकल फ्लो पानी का वह बहाव और मात्रा होती है, जिसमें नदी में पनपने वाले सभी जीव- जंतु बिना किसी तनाव के पनप सकें। यह अधिसूचना भी केवल उन्नाव तक के लिए है, इसके आगे क्या बहाव होगा यह अभी नहीं पता है।

यहां यह जानना आवश्यक है कि केवल इस व्यर्थ की अधिसूचना को जारी कर नितिन गडकरी ने बयान दे डाला था कि हमने स्वामी सानंद की 80 प्रतिशत मांगें पूरी कर दी हैं। स्वामी सानंद कोई आम आदमी नहीं थे, वे पर्यावरण के विशेषज्ञ थे और उन्होंने अधिसूचना को देखकर डस्टबिन में फेंक दिया था। इस 80 प्रतिशत मांग को मानने वाले वक्तव्य का विरोध केवल स्वामी सानंद ने ही नहीं बल्कि जल पुरुष राजेन्द्र सिंह समेत अनेक पर्यावरणविदों ने किया था।

जिस गंगा पर सरकार अपने काम पर इतना इतराती है, उसकी कलई एक आरटीआई के जवाब में केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने खोल कर रख दिया है। इसमें बताया गया है कि वर्ष 2013 से 2017 के बीच किसी भी स्थान पर गंगा का पानी पहले से साफ नहीं हुआ है, अलबत्ता अनेक महत्वपूर्ण स्थानों, जिसमें वाराणसी और इलाहाबाद (प्रयाग) भी शामिल है, में प्रदूषण का स्तर पहले से बढ़ गया है। गंगा में प्रदूषण बढ़ गया है, यह जानने के लिए किसी भी आंकड़े की जरूरत नहीं है, सब इसे महसूस कर रहे हैं।

सरकार का रवैया पर्यावरण के क्षेत्र में बिलकुल स्पष्ट है- आवाज उठाने वाले हर व्यक्ति को मार दिया जाएगा। स्टरलाईट कॉपर के मामले को सभी जानते हैं, स्वामी सानंद का हाल भी देख चुके। स्वामी गोपाल दास भी उसी रास्ते पर हैं। उनके बाद फिर कोई और होगा। स्वामी गोपाल दास ने अपने प्रेस कांफ्रेंस में साफ-साफ बताया कि ऋषिकेश के एम्स में उनके साथ किस तरह का व्यवहार किया जाता है, जिसमें बड़े अधिकारी से लेकर निचले स्तर तक के कर्मचारी सम्मिलित रहते हैं। पुलिस का रवैया भी दमनकारी से अधिक कुछ नहीं होता। स्वामी गोपाल दास के अनुसार एम्स में उनके साथ जिस तरह व्यवहार किया जाता है, उसे देखकर उन्हें पक्का यकीन है कि स्वामी सानंद को मारा गया है। स्वामी शिवानन्द ने भी अपने प्रेस कांफ्रेंस में सबूतों के साथ बताया कि क्यों स्वामी सानंद की मौत सामान्य नहीं है।

गंगा के साथ समस्या यह है, स्वामी या संत एक-एक कर गंगा के लिए अपनी जान देने पर तुले हैं, इन मामलों के विशेषज्ञ जो हैं वे वातानुकूलित कमरों में सेमीनार और कांफ्रेंस में उलझे हैं और आम जनता पूरे विषय पर उदासीन है। स्वामी सानंद के समय प्रेस और मीडिया को एक-दो दिनों के लिए गंगा की याद आयी, फिर सब कुछ शांत हो गया। इन सबके बीच सरकार का रवैया भी बिलकुल स्पष्ट है, प्रदूषण से मरिये नहीं तो आवाज उठाने पर हम मार डालेंगे।

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