विचार

महिलाओं को लेकर मोदी सरकार का दोहरा रवैया: ‘मुस्लिम बहनों’ पर तत्परता,लेकिन कनक दुर्गा मामले में चुप्पी क्यों?

सरकार को ऐसी महिलाओं के लिए कानून बनाना ही चाहिए जिन्हें तर्कहीन कारणों से उनके पति छोड़ रहे हैं। वर्ना लोग तो कहेंगे ही तीन तलाक कानून के पीछे मंशा मुस्लिम महिलाओं की भलाई नहीं, बल्कि राजनीति है।

फोटो : सोशल मीडिया

सुरुर अहमद

सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने और वहां पूजा करने के इल्जाम में जब कनक दुर्गा को उसके पति ने घर से निकाल दिया, तो मोदी सरकार के लिए यह एक स्पष्ट वजह हो सकती थी कि वह एक कानून बनाते जिससे महिलाओं पर ऐसे अत्याचार बंद हो सकते। आखिर मुस्लिम महिलाओं के लिए भी मोदी सरकार ने तीन तलाक बिल पेश किया ही। अगर मोदी ऐसा कानून बनाते तो देश की करीब 25 लाख ऐसी महिलाओं को इंसाफ मिलता जिन्हें उनके पतियों ने छोड़ दिया है।

कनक दुर्गा का मामला जरा अलग है। उसे तो उसके पति ने इसलिए घर से निकाल दिया और सास ने उस पर हमला कर दिया क्योंकि वह सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन कर रही थी। ऐसे में मोदी सरकार अगर ‘मुस्लिम बहनों’ को इंसाफ के लिए कानून बना सकती है, तो फिर उन लोगों के खिलाफ क्यों नहीं जो खुलेआम सुप्रीम कोर्ट आदेशों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। वैसे सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक को भी अंवैधानिक ठहरा चुका था।

मान लिया कि किसी एक मामले के सामने आने पर सरकारें कानून नहीं बनातीं या बदलतीं, लेकिन यहां मामला सुप्रीम कोर्ट के फैसले के उल्लंघन का है। और बात, सिर्फ इतनी भर नहीं है। इस घटना से कम से कम यह तो साफ हो जाता है कि देश में महिलाओं को उनके पति कैसी-कैसी वजहों से छोड़ देते हैं।

सरकार के कदम के पीछे अगर मंशा महिलाओं के कल्याण की है, भले ही वह किसी भी मजहब, समुदाय या जाति की हों, तो सरकार को ऐसी महिलाओं के लिए कानून बनाना ही चाहिए जिन्हें तर्कहीन कारणों से उनके पति छोड़ रहे हैं। वर्ना लोग तो कहेंगे ही तीन तलाक कानून के पीछे मंशा मुस्लिम महिलाओं की भलाई नहीं, बल्कि राजनीति है।

लेकिन विडंबना है कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे पर बीजेपी और मोदी सरकार का रुख सुप्रीम कोर्ट के फैसले के एकदम विपरीत है। चूंकि सरकार तीन तलाक और सबरीमाला दोनों ही मुद्दों पर राजनीतिक फायदा देख रही है, इसलिए इस बात की गुंजाइश बहुत कम है कि सरकार के कदमों-फैसलों से महिलाओं की स्थिति में कोई खास बदलाव होने वाला है।

ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो यह कहते नहीं थकते कि सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक मामलों में दखल दिया है, जबकि कनक दुर्गा ने तो कोई गलती की ही नहीं है। उसने कोर्ट के फैसले को उसके मूल रूप में मानने और उस पर अमल किया है। कनक दुर्गा का मामला पति-पत्नी की अलहदगी के मामलों से एकदम अलग सा दिखता है, क्योंकि आम तौर पर पति या ससुराल वाले महिलाओं पर जुल्म करते हैं।

लेकिन अब कनक दुर्गा एकदम अकेली है। यहां तक कि उसके अपने सगे भाई भी उसके साथ नहीं हैं। जबकि तलाक या पति द्वारा छोड़े जाने के ज्यादातर मामलों में महिला के परिवार वाले उसके साथ खड़े होते हैं।

सवाल यह है कि अगर कनक दुर्गा ने कोई गलती की भी है तो भी क्या उसे इस तरह अकेला छोड़ देना सही है? अफसोस तो इस बात का भी है कि यह सब एक ऐसे राज्य में हो रहा है जहां शिक्षा दर सर्वाधिक है और जो मानव विकास इंडेक्स पर शीर्ष पर है।

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