CAA से मोदी सरकार ने बिगाड़ी भारत की वैश्विक छवि, विरोध में देश ही नहीं, दुनिया भर में हलचल

भारत के नागरिकता संशोधन कानून को लेकर ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’, ‘वॉशिंगटन पोस्ट’, ब्रिटेन के अखबार ‘इंडिपेंडेंट’ और समाचार चैनल ‘अल जजीरा’ ने कड़ी टिप्पणी की है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव के प्रवक्ता ने कहा कि भारत के इस कानून पर संयुक्त राष्ट्र की भी निगाहें हैं।

फोटोः सोशल मीडिया
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प्रमोद जोशी

मोदी सरकार के नागरिकता संशोधन कानून को लेकर देश के कई इलाकों में रोष व्यक्त किया जा रहा है। सामाजिक जीवन में कड़वाहट पैदा हो रही है और कई तरह के अंतर्विरोध जन्म ले रहे हैं। धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था को लेकर सवाल हैं। इन सबके साथ वैश्विक स्तर पर देश की छवि का सवाल भी जन्म ले रहा है। भारत और भारतीय समाज की उदार, सहिष्णु और बहुलता की संरक्षक छवि को ठेस लगी है। जापानी प्रधानमंत्री शिंजो एबे की यात्रा स्थगित होने के बड़े राजनयिक निहितार्थ भले ही न हों, बांग्लादेश और पाकिस्तान की प्रतिक्रियाएं महत्वपूर्ण हैं। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं और पश्चिमी देशों के मीडिया की प्रतिक्रियाएं महत्वपूर्ण हैं। भारत की उदार और प्रबुद्ध लोकतंत्र की छवि को बनाने में इनकी प्रमुख भूमिका है।

नागरिकता कानून में संशोधन के बाद कुछ अमेरिकी सांसदों ने काफी कड़वी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। राज्यसभा से नागरिकता संशोधन बिल के पास होने के कुछ समय बाद ही अमेरिकी सांसद आंद्रे कार्सन ने बयान जारी कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना की और इस कानून को ‘ड्रैकोनियन’ बताया और कहा कि इसके कारण भारत में मुसलमान दोयम दर्जे के नागरिक बन जाएंगे। ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’, ‘वॉशिंगटन पोस्ट’, ब्रिटेन के अखबार ‘इंडिपेंडेंट’ और समाचार चैनल ‘अल जजीरा’ ने आलोचनात्मक टिप्पणियां की हैं। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेश के प्रवक्ता ने कहा कि भारत के इस कानून पर संयुक्त राष्ट्र की निगाहें भी हैं। संयुक्त राष्ट्र के कुछ बुनियादी आदर्श हैं और हम मानते हैं कि मानवाधिकारों के सार्वभौमिक घोषणा पत्र से प्रतिपादित उद्देश्यों का उल्लंघन नहीं होना चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय मंच से कड़ी प्रतिक्रियाएं

इन प्रतिक्रियाओं के अलावा अमेरिकी संसद की विदेशी मामलों की समिति ने ट्वीट किया कि इस कानून में धार्मिक बहुलता के बुनियादी सूत्रों का उल्लंघन हुआ है। धार्मिक बहुलता के सिद्धांत को अमेरिका और भारत दोनों ही स्वीकार करते हैं। नागरिकता के लिए धार्मिक आधार से इस बात की अनदेखी होती है। उधर अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े अमेरिकी आयोग (यूएससीआईआरएफ) ने भी इस कानून को लेकर काफी कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।

नागरिकता संशोधन विधेयक के पास होने से पहले ही आयोग ने एक बयान में कहा था कि यदि यह कानून पास हुआ, तो अमेरिकी सरकार को भारत के गृहमंत्री तथा अन्य बड़े नेताओं पर प्रतिबंध लगाने पर विचार करना चाहिए। यह कानून गलत दिशा में जा रहा है, जो भारत की सेक्युलर बहुलता के विरुद्ध है। आयोग का कहना है कि इस कानून के बाद देश में नागरिकता रजिस्टर बनाए जाने के बाद करोड़ों मुसलमानों की नागरिकता खतरे में पड़ जाएगी।

पश्चिमी देशों की प्रतिक्रियाओं से देश की वैश्विक छवि बनती है, पर उतनी ही महत्वपूर्ण दक्षिण एशिया के देशों की प्रतिक्रियाएं हैं। खासतौर से पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान की। इस कानून में इन्हीं तीन देशों में वहां के अल्पसंख्यकों की प्रताड़ना की बात कही गई है। पाकिस्तान ने इस कानून को ‘पक्षपातपूर्ण’ बताया और इसे पड़ोसी देशों के मामलों में भारत के ‘दखल’ का ‘दुर्भावनापूर्ण इरादा’ करार दिया। पीएम इमरान ने तो इसे आरएसएस के ‘हिंदू राष्ट्र’ की अवधारणा की दिशा में बढ़ाया गया कदम करार दिया है।

वहीं पाक विदेश मंत्रालय ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए एक दिन का भी समय नहीं लिया और आधी रात को बयान जारी कर कहा कि ‘हम इस विधेयक की निंदा करते हैं। यह भेदभावपूर्ण है और सभी संबद्ध अंतरराष्ट्रीय संधियों और मानदंडों का उल्लंघन करता है। यह पड़ोसी देशों में दखल का भारत का दुर्भावनापूर्ण प्रयास है।’ इसमें कहा गया कि इस कानून का आधार झूठ है और यह धर्म या आस्था के आधार पर भेदभाव को हर रूप में खत्म करने संबंधी मानवाधिकारों की वैश्विक संकल्पों और अन्य अंतरराष्ट्रीय संधियों का पूर्ण रूप से उल्लंघन करता है।

सूप बोले तो बोले…

बेशक पाकिस्तान को इस मामले में प्रतिक्रिया व्यक्त करने का नैतिक अधिकार नहीं है, क्योंकि धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति उसका आचरण जगजाहिर है। दिक्कत यह है कि अब पाकिस्तान जैसा देश हमें उपदेश दे रहा है। धार्मिक आधार पर बना देश भारत के धार्मिक देश बनने के खतरे की ओर इशारा करे, इससे बड़ी विडंबना क्या होगी। भारतीय समाज में व्याप्त सांप्रदायिक दुष्प्रवृत्तियों के लिए जिम्मेदार अनेक कारणों में से एक पाकिस्तानी धार्मिक कट्टरतावाद भी है। पाकिस्तान यदि भारत के साथ मित्रता और भाईचारे के रिश्ते को बनाने की कोशिश करता, तो विभाजन के बावजूद भारतीय भूखंड में यह कड़वाहट होती ही नहीं, जो आज नजर आ रही है।

दुर्भाग्य है कि दक्षिण एशिया की सामाजिक बहुलता और उसकी ऐतिहासिक एकता पर विचार करने के बजाय इस क्षेत्र में राजनीतिक कारणों से आपसी टकराव और सांप्रदायिक विद्वेष की प्रवृत्तियां जन्म ले रही हैं। बहरहाल पाकिस्तानी प्रतिक्रियाओं से ज्यादा महत्वपूर्ण बांग्लादेश और अफगानिस्तान की प्रतिक्रियाएं हैं। इसके दो कारण हैं। एक तो इन दोनों के साथ हमारे दोस्ताना रिश्ते हैं और दूसरे इन दोनों सरकारों पर हम अल्पसंख्यक विरोधी होने का आरोप नहीं लगा रहे हैं, पर प्रकारांतर से संदेश यह जा रहा है कि हम इन दोनों की आलोचना भी कर रहे हैं। इन दोनों देशों में अतीत की सरकारों से हमें शिकायत है।

बांग्लादेश की पीड़ा

‘इंडिया टुडे’ टीवी के साथ एक भेंट में अफगानिस्तान के राजदूत ताहिर कादरी ने कहा कि अफगानिस्तान को पाकिस्तान के साथ जोड़कर नहीं देखना चाहिए। अशरफ गनी सरकार अपने देश में अल्पसंख्यकों को पूरे सम्मान के साथ रखती है। उधर बांग्लादेश के विदेश मंत्री एके अब्दुल मोमिन, जिन्होंने अपनी भारत यात्रा स्थगित कर दी, ने कहा कि बांग्लादेश पर यह तोहमत गलत है। शायद भारत सरकार इन दोनों देशों की वर्तमान सरकारों पर आरोप लगाना चाहती भी नहीं थी, पर अपनी बात कहते समय सरकार ने सावधानी नहीं बरती।

हालांकि, गृहमंत्री ने संसद में कहा कि शेख मुजीबुर्रहमान ने तो बांग्लादेश को सेक्युलर देश ही बनाया था, पर वहां सैनिक शासन के दौरान हालात बदले। अफगानिस्तान में तालिबान शासन के दौरान अल्पसंख्यकों पर ही नहीं, अपने देश की मुस्लिम महिलाओं पर भी अत्याचार ढाए गए। बामियान की बुद्ध प्रतिमाओं को नष्ट करके तालिबान ने पूरी दुनिया की नाराजगी मोल ली थी। भारत सरकार ने इस बात को रेखांकित करने की कोशिश नहीं की कि ये मामले आज के नहीं दो-तीन दशक पुराने हैं। हाल के वर्षों में बांग्लादेश ने अल्फा उग्रवादियों से लेकर इस्लामिक स्टेट और आईएसआई के एजेंटों तक के खिलाफ कार्रवाई में भारत से सहयोग किया है।

सहयोग और समर्थन

हाल तक भारत में बांग्लादेश के राजदूत सैयद मुअज्जम अली ने कुछ दिन पहले ही अखबार ‘दि हिंदू’ से कहा था कि हमें अपनी सेक्युलर बुनियाद को मजबूत करने के लिए भारत का समर्थन और सहयोग चाहिए। दूसरी तरफ पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान अमित शाह भारत में रह रहे बांग्लादेश के लोगों को ‘दीमक’ का दर्जा दे चुके हैं। साल 1971 में बांग्लादेश से काफी लोग भागकर भारत आए थे, पर दक्षिण एशिया में बांग्लादेश की कहानी पाकिस्तान जैसी नहीं है। इस क्षेत्र में सबसे तेज गति से विकास करने वाला यह देश मानव विकास के तमाम मानकों में पाकिस्तान से तो काफी आगे है ही, भारत से भी आगे है। सामाजिक विकास के मानकों पर बांग्लादेश की प्रगति बहुत अच्छी है। नागरिकों की औसत आयु, जन्म दर, स्त्रियों की सामाजिक भूमिका, शिशु मृत्यु दर जैसे तमाम क्षेत्रों में उसका प्रदर्शन भारत से बेहतर है।

सबसे बड़ी बात यह कि वह अपने यहां कट्टरपंथियों पर लगाम लगा रहा है। इस प्रयास में उसने भी हिंसा का सामना किया है। वह पाकिस्तान की तरह आतंकवाद से लड़ने का दिखावटी दावा नहीं करता, बल्कि लड़ता है। संभव है कि गरीबी के कारण वहां से लोग भारत आए हों, पर इस आगमन के दूसरे कारण भी हैं। आखिरकार बंगाल की एक संस्कृति है। यह आवागमन सदियों से चल रहा है। इसका स्थायी समाधान है क्षेत्र का आर्थिक विकास, जिसके लिए हमें सहयोग की जरूरत है, टकराव की नहीं। दक्षिण एशिया में पाकिस्तान के अलावा भारत के रिश्तों में नेपाल और श्रीलंका के साथ भी तनातनी चलती है। नेपाल के साथ काला पानी क्षेत्र को लेकर विवाद चल ही रहा है। इन देशों की भावनाओं पर भी हमें ध्यान देना चाहिए। नागरिकता कानून के छींटे हमारे सभी पड़ोसियों पर पड़ेंगे। इनका प्रभाव काफी दूर तक और देर तक होगा।

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