विष्णु नागर का व्यंग्यः मोदी जी तो विनम्रता के कल्कि अवतार हैं और घमंड में उनके भाई शाह का जवाब नहीं

पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह

एक बेचारे मोदी जी हैं, विनम्रता का साक्षात कल्कि अवतार! इतना बड़ा पद और इतने अधिक विनम्र। इतने विनम्र कि गिनीज नहीं तो लिम्का बुक आफ रिकार्ड में तो उनकी विनम्रता टॉप कर ही जाएगी। वह कहते हैं हम सबसे लड़ सकते हैं, लेकिन विपक्ष के ‘झूठ’ से लड़ नहीं सकते।

क्या घमंड है भाई, गजब का घमंड! “अखलाक वाली घटना हुई, क्या हुआ, हम जीते! अवार्ड वापसी हुई, क्या हुआ, हम जीते! कुछ और भी होगा तो क्या होगा, हम जीतेंगे! चुन-चुनकर बांग्लादेशी मुसलमानों को निकालेंगे। जितना विरोध करना हो, कर लो। पचास साल तो अब इस देश से कोई माई का लाल भी बीजेपी को हिला नहीं सकता।” ये तो हुए अपने अमित भाई।

उधर एक बेचारे मोदी जी हैं, विनम्रता का साक्षात कल्कि अवतार। इतना बड़ा पद और इतने अधिक विनम्र! इतने विनम्र कि गिनीज नहीं तो लिम्का बुक आफ रिकार्ड में तो उनकी विनम्रता टॉप कर ही जाएगी। वह कहते हैं हम सबसे लड़ सकते हैं, लेकिन विपक्ष के ‘झूठ’ से लड़ नहीं सकते! गौर कीजिये, इस देश का ‘फकीर’ झूठ से यानी झूठ से, फिर जोर दूं, तो झूठ से लड़ नहींं सकता! कैसा भोलापन बचा है न उनमें! अगर मैं आज 16 साल की, बल्कि 18 साल की छोकरी होता तो 68 साल के इस बुजुर्ग पर मर मिटता, लेकिन क्या करूं, किस्मत ही खोटी है, भाग्य में दालरोटी है।

ये दोनों भाई हैं। अभी तो सगे से भी ज्यादा सगे दीखते हैं। मगर कमाल का अंतर है! एक अहंकारी, एक अहंकार से कई-कई किलोमीटर दूर! भगवान दे और एक नहीं, दो दे, तो ऐसी ही संतानें दे।
तो क्यों साहब आप इनमें से किसे वोट दोगे? इस घमंडी को या उस विनम्र को? किसी को भी दो, जाएगा तो वहीं- कमलवाले फकीर की झोली में!

गणेश चतुर्थी आ गई है, मेरा तो जी कर रहा था कि अमित भाई की स्तुति में ‘जय घमंड, जय घमंड, जय घमंड देवा गाऊं’। गाने भी लगा था मगर पत्नी ने समझा कि मैं ‘जय गणेश, जय गणेश देवा’ गा रहा हूं और रिक्त स्थान की पूर्ति करते हुए वह गाने लगी - ‘माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा’ और पूरी आरती ही गाकर मानी! मेरे देवता की पूजा में, अपने देवता को घुसेड़कर और फिर अपने देवता की आरती गाकर मेरा प्लान ही चौपट कर दिया! मैं बेचारा भी क्या करता- ‘जय गणेश,जय गणेश’ करने लगा। खैर चिंता की बात नहीं, घर-परिवार में ऐसी दुर्घटनाएं होती रहती हैं। इधर उम्र बढ़ती है, उधर दुर्घटनाओं की गति बढ़ जाती है। यह भी तब होता है, जब सड़क पर यह पढ़ते-पढ़ते सिर घूम चुका होता है कि ‘देर से दुर्घटना भली’, ‘सॉरी दुर्घटना से देर भली’!

खैर अब तो हालत ये हो चुकी है कि घमंड इनसे है, ये घमंड से नहीं। वरना इस जमाने में पचास साल राज करने के ख्वाब देखना बच्चों का खेल नहीं। हां, बड़ों का मोबाइल जरूर है, जिसे बच्चे, बड़ों से चलाना बेहतर जानते हैं। घमंड तो इतना है साहब कि ये आकाश को तो खैर धरती पर उतार ही देंगे, धरती को भी आकाश पर बिठा, लिटा या खड़ा कर देंगे। घमंड ऐसा कि ये आदमी को ही चूहा बनाकर नहीं छोड़ेंगे बल्कि चूहे को भी आदमी बनाकर, उसके पीछे बिल्ली छोड़कर मानेंगे। घमंड ही उनकी बचत है, पूंजी है, सोना है, शेयर है, ताजोलय है, रामजन्म भूमि है। घमंड ही उनकी परंपरा है, विरासत है, थाती है, अंधेरे में बाती है, टार्च की रोशनी है।

अगर घमंड, ना जाने कितना ऊपर रहने वाला नीचे वाले को दिया करता है, तो दे तो वह अमित शाह जैसा घमंड ही दे या फिर ना दे। ऐसे घमंडी बताइए, पचास साल तक क्यों राज नहीं करेंगे? अवश्य करेंगे और अगर ऊपर से ऐसी ‘विनम्रता’ भी दे दे कि छप्पन इंची भी कह उठे कि मैं विपक्ष के ‘झूठ’ का सामना नहीं कर सकता तो फिर पचास और साठ और सत्तर क्या, सौ साल भी ये राज करेंगे! झूठ बोल-बोल कर, बोल-बोल कर ऐसा घमंड और ऐसी ‘विनम्रता’ आ ही जाती है कि अपना झूठ, सच लगता है और विपक्ष का सच, इतना झूठ लगता है कि कहना पड़ जाता है कि सॉरी मैं मैदान छोड़ने जा रहा हूं। मेरे झूठ का सिक्का अब घिस गया है, जिससे भक्तों को लगे कि हमारा अभिमन्यु बेचारा चक्रव्यूह में फंस गया है और वह बोलें- ‘चल भाई चल, तू लाठी ले, मैं बंदूक लेता हूं और ए तेरा क्या नाम है, तू पिस्तौल ले संगे-संगे चल, अपन अपने अभिमन्यु को बचाते हैं’!

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