एक दूसरे के पूरक हैं मोदी-शाह, पीएम के एनआरसी पर भाषण से किसी भ्रम में न रहें

मोदी-शाह की जोड़ी अक्सर अटल-आडवाणी की जोड़ी की तरह दिखती है। मोदी भी अटल बिहारी वाजपेयी की तरह योजनाएं बनाते हैं, जिन्हें धरातल पर उतारने का काम आडवाणी की तरह अमित शाह करते दिखते हैं- चाहे वह कश्मीर का मामला हो या तीन तलाक का या नागरिकता कानून और एनआरसी का।

फोटोः सोशल मीडिया
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कुमार मयंक

यहां रामलीला मैदान की बीजेपी रैली में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) का काम देश भर में शुरू करने की तैयारी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस तरह मुकरे, मानो, वह अपने हर तरह से लेफ्टिनेंट केंद्रीय गृह मंत्रीअमित शाह को कठघरे में खड़ा ही नहीं कर रहे हों बल्किएक तरह से, झूठा ही साबित कर रहे हों। शाह ने न केवल संसद बल्कि झारखंड की चुनावी रैलियों में भी ताल ठोककर घोषणा की थी कि नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के जरिये पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आए गैर मुसलमानों को नागरिकता दी जाएगी और उसके बाद पूरे देश में एनआरसी के जरिये घुसपैठियों का पता लगाया जाएगा।

इसी तरह पीएम मोदी ने देश में घुसपैठियों के लिए बनाए जा रहे डिटेंशन सेंटर को भी मात्र अफवाह बताते हुए विपक्षी दलों पर निशाना साधा, जबकि केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय और जी कृष्णा रेड्डी संसद में अलग-अलग मौकों पर डिटेंशन सेंटरों के बारे में कई बयान दे चुके हैं।

तो क्या माना जाए कि मोदी और अमित शाह के बीच मतभेद हो गए हैं? क्या शाह के दिन अब पूरे हो गए हैं? पिछले 40 साल से गुजरात की राजनीति पर नजर रखने वाले एक पत्रकार का कहना हैः “यह सोचना व्यर्थ है। वे दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। मोदी के बिना शाह का कोई व्यक्तित्व नहीं है और शाह के बिना मोदी का काम नहीं चलेगा। रणनीति साफ है, बांटो और राज करो। देश की 85 फीसदी आबादी को 15 फीसदी मुसलमानों के खिलाफ खड़ा कर दो। उनमें मुसलमानों के प्रति डर और घृणा पैदा करो और जताओ कि केवल बीजेपी ही उन्हें बचा सकती है। और इस रणनीति को जन्म देने वाले अमित शाह और उनके राजनीतिक गुरु मोदी ही हैं।”

वहीं, बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता का मानना है कि प्रधानमंत्री को स्थिति नियंत्रण में लाने के लिए ऐसा बोलना जरूरी था लेकिन वह बीजेपी की मूल विचारधारा से नहीं भटके हैं। उन्होंने एक बार भी नहीं कहा कि एनआरसी का विचार रद्द कर दिया गया है- वह लगातार यह भी कहते रहे कि घुसपैठियों का पता लगाया ही जाएगा।

अमित शाह की भूमिका में फिलहाल कोई परिवर्तन नहीं होने जा रहा। बतौर गृहमंत्री उन्होंने सिर्फ 6 महीने का कार्यकाल पूरा किया है। अभी साढ़े चार साल बाकी हैं और बाकी है संघ का अपूर्ण एजेंडा। माना जा रहा है कि अगले कुछ दिनों में स्थिति सामान्य होने के बाद वह देशव्यापी एनआरसी, राम मंदिर निर्माण और राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण नीति लाने में अहम भूमिका निभाएंगे। फिर भी समय बचा तो समान नागरिक संहिता भी लाई जा सकती है।

फिलहाल, संभवतः मोदी खुद को खतरों से सुरक्षित रखना चाहते हैं। यदि 370 या नागरिकता विधेयक उल्टा पड़ता है तो वह शाह के सर ठीकरा फोड़कर आसानी से निकल जाएंगे। और अगर सब ठीक रहता है तो उन्हें ही श्रेय मिलना है। खुद ले लेंगे। और ऐसा हुआ भी। पूरे देश में नागरिकता कानून में संशोधनके खिलाफ उठे आंदोलन से मोदी विचलित हो गए। 22 दिसंबर को दिल्ली में आयोजित रैली में मोदी ने खुद को ही नहीं बल्कि पार्टी को भी नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस (एनआरसी) से दूर कर लिया। उन्होंने कहा कि पिछले 5 साल में पार्टी में या सरकार में एनआरसी को लेकर कोई बातचीत हुई ही नहीं है। इसके बारे में विपक्षी दलों द्वारा भ्रम फैलाया जा रहा है।

शाह ऐसे ही मोदी के पूरक नहीं हैं। गोल-मटोल शरीर, गंजा सिर, गंभीर चेहरा, खिचड़ी दाढ़ी, पैनी नजरें और ताने मारने-सी बोलने की उनकी शैली लगभग किसी दक्षिण भारतीय फिल्म के विलेन जैसी है। उसी तरह भय पैदा करने की उनकी स्टाइल भी है- कम-से-कम नौकरशाही, अपनी पार्टी और मीडिया के अधिकांश वर्ग में तो है ही। भाषण देते समय ही नहीं, मीडिया से भी बात करते समय एक-एक शब्द चबा-चबाकर बोलते हैं। हर वाक्य धमकी सरीखा लगता है। संसद में बोलते समय जब वह बायां हाथ कमर पर रखकर दाहिने हाथ की उंगली हिला-हिलाकर भाषण देते हैं, तो लगता है जैसे धमका रहे हों। बीजेपी में शाह का इस कदर खौफ है कि मोदी को छोड़कर पार्टी का कोई भी नेता शाह के सामने मुंह खोलने में घबराता है- पता नहीं, कब-किस बात पर किसे डांट पड़ने लगे।

अमित शाह अपने को चाणक्य कहलवाना पसंद करते हैं। लेकिन उनके चुनावी करिश्मे की एक्सपायरी डेट निकल गई है। पिछले एक साल में एक-एक कर सभी बड़े राज्य बीजेपी के हाथ से फिसलते जा रहे हैं- राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के बाद पहले महाराष्ट्र और अब झारखंड में बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा। न बूथ मैनेजमेंट काम आया, न पन्ना प्रमुख और न ही सोशल मीडिया या नरेंद्र मोदी की रैलियां।

स्टॉक ब्रोकर और पीवीसी पाइप बनाने वाली फैक्ट्री लगाने वाले शाह की राजनीति का मूल मंत्र सिर्फ एक रहा हैः नेता के पीछे-पीछे चलो। फॉलो द लीडर। उनके लिए नेता का सिर्फ एक ही अर्थ हैः साहब, मतलब मोदी। चाहे सोहराबुद्दीन शेख, तुलसी प्रजापति और कौसर बी की मुठभेड़ हो या किसी आर्किटेक्ट की छात्रा की जासूसी- शाह की भूमिका को लेकर अंगुली उठती रही है। यहां तक कि सोहराबुद्दीन मुठभेड़ की सुनवाई कर रहे जस्टिस लोया की संदिग्ध मौत में भी शाह पर ही उंगलियां उठीं। खैर।

बीजेपी अध्यक्ष के रूप में उन्होंने मोदी के सिर पर कई राज्यों के ताज डाले। केंद्रीय गृहमंत्री बने ,तो मोदी-संघ के सारे एजेंडे पूरा करते रहेः तीन तलाक कानून पास करवा लिया, जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटवा लिया, भले ही वहां 5 अगस्त के बाद से ही पूरा इलाका एक तरह से नजरबंद है- अघोषित कर्फ्यू, जहां अधिकतर राजनीतिक हस्तियां या तो जेल में है या अपने ही घर में नजरबंद। नागरिकता (संशोधन) बिल (कैब) पर संसद में चर्चा के दौरान उन्होंने बिल्कुल गलत तर्क देकर जिस तरह इतिहास की घटनाओं को तोड़ा-मरोड़ा, उससे साफ है कि वह वास्तविक तथ्यों की किस तरह अनदेखी करते हैं। अगर अपने राजनीतिक उद्देश्य पूरे हो रहे हों, तो शाह के लिए सच और झूठ में ज्यादा फर्क भी नहीं है।

मोदी-शाह की जोड़ी अक्सर अटल-आडवाणी की जोड़ी की तरह नजर आती है। मोदी भी अटल बिहारी वाजपेयी की तरह योजनाएं बनाते हैं, जिन्हें धरातल पर उतारने का काम आडवाणी की तरह अमित शाह करते नजर आते हैं- चाहे वह कश्मीर का मामला हो या तीनत लाक का या नागरिकता कानून और एनआरसी का। जानबूझकर मोदी इन मामलों में शाह को आगे रखते हैं। कश्मीर और नागरिकता विधेयक पर संसद के दोनों सदनों में घंटों चली बहस में मोदी एक शब्द नहीं बोले। यहां तक कि एक दक्षिण भारतीय मीडिया समूह द्वारा अनुच्छेद 370 पर इंटरव्यू देने से भी मोदी ने साफ इनकार कर दिया। उनका कहना था कि इसे अमित शाह देख रहे हैं और उन्हीं का साक्षात्कार लिया जाना चाहिए।

(नवजीवन के लिए कुमार मयंक का लेख)

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