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आकार पटेल का लेख: वे ‘चार’ जिनके जरिए मोदी का रहेगा बीजेपी, सरकार और देश पर नियंत्रण

चुनावों में विशाल जनमत और देश की राजनीति और अपनी पार्टी बीजेपी पर मोदी के पूर्ण नियंत्रण का अर्थ है कि उनके पास इन सारी चुनौतियों से निपटने की काफी गुंजाइश है और वे तेज़ी से इन्हें बदल सकते हैं। आने वाले कुछ सप्ताहों में हम ऐसा होते हुए देख सकते हैं।

फोटो : सोशल मीडिया
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आकार पटेल

नरेंद्र मोदी का भव्य शपथ ग्रहण समारोह संपन्न होने के साथ ही आर्थिक मोर्चे पर दो खबरें आईं। एक, यह कि देश की तरक्की की रफ्तार 5 साल के निचले स्तर पर पहुंच गई है, और बेरोजगारी की दर 6 फीसदी पर जो 45 साल का निचला स्तर है। दूसरी खबर यह कि नई सरकार अपने पहले 100 दिन में ऐसी नीतियां बनाने वाली है जिससे देश का श्रम कानून (कंपनियों को अपने कर्मचारियों को नौकरी से निकालने की आसानी देने वाली नीति) बदल जाएगा। साथ ही यह भी कि सरकार बड़ी-बड़ी जमीने अधिग्रहीत कर उन्हें कंपनियों को देगी ताकि वैसे हालात न पैदा हों जैसा कि बंगाल के सिंगूर में टाटा के साथ हुआ था। यह ऐसे आर्थिक सुधार हैं जिनसे निवेशक खुश होंगे, खासतौर से विदेशी निवेशक।

बीजेपी के साथ अच्छी बात यह है कि उसके पास विशाल जनमत है और मोदी अपनी इस राजनीतिक पूंजी का इस्तेमाल तेजी से सुधारों के लिए कर सकते हैं। लेकिन समस्या यह है कि ऐसे कदमों का विरोध करने वाले (मजदूर यूनियनें और विपक्षी राजनीतिक दल) भी सामने ही हैं। पिछली सरकारों में इन्हीं कारणों से सुधारों पर विराम लगता रहा है।

लेकिन चुनावों में विशाल जनमत और देश की राजनीति और अपनी पार्टी बीजेपी पर मोदी के पूर्ण नियंत्रण का अर्थ है कि उनके पास इन सारी चुनौतियों से निपटने की काफी गुंजाइश है और वे तेज़ी से इन्हें बदल सकते हैं। आने वाले कुछ सप्ताहों में हम ऐसा होते हुए देख सकते हैं।

आज अगर हम मोदी मंत्रिंडल के उन चेहरों पर नजर डालें जो सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी (सीसीएस) के सदस्य हैं, तो यह ऐसे नाम हैं जिनका अनुमान किसी ने भी सही नहीं लगा। इस कमेटी में प्रधानमंत्री के अलावा वित्त, गृह, रक्षा और विदेश मंत्री होते हैं। इससे स्पष्ट है कि मौजूदा सरकार का सूचनाओं पर कितना सख्त नियंत्रण है।

विदेश मंत्री के रूप में पूर्व विदेश सचिव एस जयशंकर के नाम की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। यह दरअसल उस राष्ट्रपतीय कार्यशैली की झलक है जो लोकसभा चुनावों में भी देखने को मिली है। अमेरिका में राष्ट्रपति अपनी इच्छा से किसी भी विभाग के लिए विशेषज्ञों को चुनकर अपना मंत्रिमंडल बनाता है, और उन्हें निर्वाचित होने की भी जरूरत नहीं होती।

जिस आसानी से नरेंद्र मोदी किसी को भी एक मंत्रालय से हटाकर दूसरे में भेज देते हैं, इससे उनकी कार्यशैली का अच्छी तरह अंदाजा होता है। मोदी स्वंय सभी मंत्रालयों के लिए दिशा-निर्देश तैयार करते हैं और फिर मंत्री उस विभाग के अफसरों के साथ मिलकर उस पर अमल करते हैं।

जयशंकर को मंत्रिमंडल में शामिल करना काफी रोचक है, क्योंकि वे एक बुद्धिजीवी हैं (उनके पास पीएचडी डिग्री है और वे एक बेहद पढ़े लिखे परिवार से आते हैं)। या तो वे खुद को बीजेपी की भावुकतापूर्ण सोच के साथ खुद को ढालेंगे या फिर उन्हें पाकिस्तान जैसे मुद्दों पर किसी नई सोच को सामने लाने के लिए ही मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है। मेरा अनुमान दूसरी बात का है।

उधर निर्मला सीतारमण को वित्त मंत्रालय देकर उन्हें पदोन्नति दी गई है। इससे पहले उन्हें रक्षा मंत्रालय देकर भी मोदी ने सबको चौंकाया था, अब तो उनके पास एक बेहद महत्वपूर्ण विभाग, वित्त मंत्रालय है। सीतारमण की विनम्रता और धैर्य ही उनकी पदोन्नति का कारण है।

राजनाथ सिंह को रक्षा मंत्रालय में भेजा गया है जो कि एक समानांतर विभाग ही है। हालांकि विदेश, वित्त और रक्षा मंत्रालय ऐसे हैं जिन्हें अब तक मोदी निजी तौर पर चलाते रहे हैं। सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट हवाई हमले जैसी कार्रवाइयां, निरंतर विदेश यात्राएं और शी जिनपिंग और बेन्यामिन नेतन्याहु जैसे नेताओँ से रिश्ते बढ़ाना इसकी मिसाले हैं।

अकेला वित्त मंत्रालय जरूर ऐसा था जिसमें 2014 के बाद से कोई खास बदलाव देखने को नहीं मिला। पिछली बार जब मोदी से इस बारे में पूछा गया था तो उनका जवाब था कि भारत पहले ही बहुत बड़े आर्थिक सुधार कर चुका है, और अब जरूरत नीतियों में बदलाव के बजाए गवर्नेंस पर ध्यान देने की है। ऐसे में जमीन और श्रम कानूनों में प्रस्तावित बदलावों के साथ ही प्रक्रिया पूरी हो जाएगी।

गृह मंत्रालय में तो अमित शाह अब मोदी के लिए वहीं करेंगे जो वे गुजरात में उनके लिए करते रहे हैं। गुजरात में मोदी सरकार में अमित शाह गृह राज्यमंत्री थे और सीधे मोदी को रिपोर्ट करते थे। वहां भी वह मोदी के नंबर दो थे। अमित शाह अभी उम्र के पचासवें दशक के मध्य में हैं, और आने वाले 5 सालों में हमें उन्हें और देखना होगा।

अमित शाह को मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने को लेकर जो आखिरी बात देखने की है वह है कि आने वाले दिनों में बीजेपी का राजनीतिक दल के रूप में विकास। बंगाल में पार्टी का विस्तार और 2014 से ज्यादा सीटें जीतने का श्रेय अमित शाह को ही दिया जा रहा है। उनसे पहले जितने भी बीजेपी अध्यक्ष रहे, वह भले ही नितिन गडकरी रहे हों या वेंकैया नायडू, अमित शाह सबसे कामयाब बीजेपी अध्यक्ष हैं।

अमित शाह ने बीजेपी की आरएसएस पर निर्भरता खत्म कर दी और न सिर्फ इसकी सदस्यता को धार दी बल्कि पैसा जुटाने की कला में भी बीजेपी माहिर हो गई। काफी अर्से से बीजेपी एक व्यक्ति एक पद के सिद्धांत पर चल रही है। कई बार खास मामलों में इस सिद्धांत को नजरंदाज़ भी किया गया है, लेकिन शाह को अभी जो जिम्मेदारी मिली है ऐसे में उनके लिए दोनों पदों को संभालना थोड़ा मुश्किल होगा।

इस तरह नया बीजेपी अध्यक्ष प्रधानमंत्री और चार सबसे अहम मंत्रियों के साथ न सिर्फ सरकार पर चलाएंगे बल्कि देश पर नियंत्रण भी इनका ही होगा।

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