मोदी-योगी के विकास के 'हिंदू मॉडल' को विपक्ष के 'सामाजिक न्याय' मॉडल से बेहतर साबित करने में छूट रहे पसीने

यह उस वक्त स्पष्ट हो गया कि राम राज्य यूपी में नहीं आया है जब बीजेपी के ऐसे कई विधायकों ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया जिनका राजनीतिक कॅरियर गैर-यादव पिछड़े वर्गों के समर्थन पर निर्भर था। संकेत साफ है कि इन नेताओं के वर्ग बीजेपी से संतुष्ट नहीं हैं।

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अरुण सिन्हा

जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, उनमें उत्तर प्रदेश बीजेपी के लिए सबसे ज्यादा अहम है। अहम इसलिए कि यह ऐसा राज्य है जिसे बीजेपी प्रशासन के ‘हिन्दू मॉडल’ की प्रयोगशाला के तौर पर इस्तेमाल कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शब्दों में, यह मॉडल ‘विरासत’ और ‘विकास’ को आपस में जोड़ता है।

बीजेपी के लिए इस मॉडल को अमल में लाने के लिए योगी आदित्यनाथ सबसे काबिल व्यक्ति थे और इसीलिए उन्हें उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया। बीजेपी के आकलन के हिसाब से योगी ने शानदार काम किया है। अपने सभी भाषणों में योगी बड़े गर्व के साथ एक हाथ से राम मंदिर (विरासत) और दूसरे हाथ से एक्सप्रेस-वे और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों (विकास) की ओर इशारा करते हैं।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के लिए तो उत्तर प्रदेश का चुनाव और भी अहम है। आरएसएस हिन्दुत्व की विचारधारा का झंडाबरदार है। बीजेपी तो इसके लिए बस एक उपकरण है। ‘विरासत’ और ‘विकास’ को जोड़ने वाला हिन्दू मॉडल दरअसल बीजेपी नहीं, आरएसएस का आइडिया है। आरएसएस नेताओं के भाषणों पर गौर करने वाले जानते हैं कि राम मंदिर का युद्ध जीतने के बाद इसने अगले 25 सालों में ‘राम राज्य’ लाने का बीड़ा उठाया है। राम राज्य और कुछ नहीं बल्कि ‘हिन्दू राष्ट्र’ का ही दूसरा नाम है। ऐसा लगता है कि हाल के वर्षों में आरएसएस को इस बात का अहसास हो गया है कि आम लोगों को ‘हिन्दू राष्ट्र’ की तुलना में ‘राम राज्य’ के प्रति लुभाना कहीं आसान होगा।

जब प्रधानमंत्री मोदी विरासत और विकास की बात करते हैं तो आम लोगों के लिए दो विचारों को सामने रखते लग सकते हैं। लेकिन आरएसएस के लिए वे अलग नहीं। शासक को राम (विरासत) का भक्त होना चाहिए और अपने सभी लोगों के लिए समृद्धि (विकास) लाना चाहिए जैसा कि राम ने अयोध्या के राजा के रूप में अपनी प्रजा के साथ किया था। इस प्रकार शासक ‘राम राज्य’ की स्थापना कर सकता है। यही सरकार का ‘हिन्दू मॉडल’ है जिसे बीजेपी यूपी में स्थापित करने की कोशिश कर रही है।

लेकिन मोदी और योगी को यह साबित करने में दिक्कत हो रही है कि विकास का ‘हिन्दू मॉडल’ समाजवादी पार्टी की सरकार के ‘सामाजिक न्याय’ मॉडल की तुलना में ज्यादा समावेशी है। उनका कहना है कि ‘हिन्दू मॉडल’ ने सभी जातियों और समुदायों को लाभ पहुंचाया है जबकि सपा सरकार ने केवल कुछ जातियों को।

चुनाव की घोषणा के तुरंत बाद यह स्पष्ट हो गया कि राम राज्य यूपी में नहीं आया है जब बीजेपी के ऐसे कई विधायकों ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया जिनका राजनीतिक कॅरियर गैर-यादव पिछड़े वर्गों के समर्थन पर निर्भर था। उनके इस्तीफे का संकेत यह था कि उनके वर्ग बीजेपी से असंतुष्ट हैं। जमीनी रिपोर्टों ने इस धारणा की पुष्टि भी की। इनमें कहा गया है कि कई गांवों में निचले वर्गों को प्रधानमंत्री आवास योजनाके तहत पक्के घर बनाने के लिए वित्तीय सहायता से वंचित किया जा रहा है क्योंकि वे अधिकारियों को रिश्वत नहीं दे सकते। ऐसे गांवों में जयापुर शामिल है जो वाराणसी जिले के उन चार गांवों में से एक है जो प्रधानमंत्री का निर्वाचन क्षेत्र है।


योगी ने दावा किया कि उन्होंने महिलाओं के जीवन को सुरक्षित बनाया है लेकिन गांवों में गरीब लड़कियों को अब भी छेड़छाड़, बलात्कार और हत्या के जोखिमों का सामना करना पड़ता है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, 2020 में राज्य में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार के इरादे से हमले के 9,864 मामले सामने आए। राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की कुल संख्या 2018 में 59,445, 2019 में 59,853 और 2020 में 49,385 थी जो सभी राज्यों से अधिक है।

यूपी के गरीब वर्ग ने हमेशा ऊंची जाति वालों की ओर से उत्पीड़न को झेला है और योगीराज में भी इसमें कोई अंतर नहीं आया। इसलिए निचले तबके में बीजेपी के प्रति असंतोष है। सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना के लिए बीजेपी का विरोध उनकी निराशा को और बढ़ा रहा है। पिछड़े वर्गों के गरीब समुदाय इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि जब तक जाति की गणना नहीं की जाती, सरकारी नौकरियों और कॉलेज में दाखिले का लाभ उन्हें समान रूप से नहीं मिलने वाला। निचली जातियों के असंतोष ने बीजेपी के इस भ्रम को तोड़ दिया है कि वह सभी जातियों को हिन्दुत्व के गोंद से बांध सकती है। निचली जातियों के लिए हिन्दू एकता कल्पना साबित हुई है जो केवल गहरे सामाजिक और आर्थिक विभाजन को कायम रखती है।

बीजेपी ने जो सामाजिक समीकरण बनाए, आज हिन्दुत्व उसी की खंडहरों में दब गया है। पार्टी के लिए बड़ा सबक यह है कि सभी जातियों को हिन्दुत्व के घेरे में बांधे रखने की उम्मीद से पहले उसे सामाजिक असमानता, सामाजिक अन्याय, आर्थिक उत्पीड़न, प्रशासनिक भेदभाव और भ्रष्टाचार जैसे बुनियादी मुद्दों से निपटना होगा।

लेकिन चूंकि ‘बड़े लोग’ ही बीजेपी के वोट हैं, यह काम शायद पार्टी कभी नहीं करना चाहे। इतना तय है कि इससे पार्टी दुविधा में रहेगी और देखना यह है कि आने वाले वर्षों में वह इस दुविधा से कैसे निकलती है।

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