मोदी जी का विकसित भारत, जहां अब विकास से लोग मरने भी लगे हैं

विकसित भारत में सत्ता और पूंजीपति अट्टाहास कर रहे हैं, लाभार्थी जनता अफीम के नशे में है, मध्यम वर्ग सरकारी 5 किलो अनाज पर जिंदा है, मीडिया अपराधियों को भगवान बना रही है।

मोदी जी का विकसित भारत, जहां अब विकास से लोग मरने भी लगे हैं
i
user

महेन्द्र पांडे

प्रधानमंत्री मोदी पिछले कुछ वर्षों से लगातार विकसित भारत की बात करते रहे हैं, और अब तो देश में विकास की बाढ़ आ गई है। भारतीय संविधान की शपथ लेने वाले सारे माननीय सत्ता और मोदी जी को ही संविधान मान बैठे हैं। संवैधानिक संस्थाएं केवल हुकूमत को खुश करने का काम कर रही हैं, चुनाव आयोग बेशर्मों की तरह सत्ता की नौकरी में मशगूल है, पूंजीवाद फल-फूल रहा है और न्यायालय भी अपने अधिकतर फैसलों से सत्ता को खुश करने का काम कर रही है। इससे अधिक देश में और क्या विकास हो सकता है? यही प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के सपनों का भारत है।

विकास का आलम यह है कि सत्ता से जुड़े सभी बलात्कारी, हत्यारे, घोषित अपराधी जेल में कम और बाहर अधिक रहते हैं, कुछ की तो सजा में भी अचानक कटौती कर दी जाती है। अधिकतर अपराधी तो सत्ता का सुख भोग रहे हैं। दूसरी तरफ सत्ता से प्रश्न करने वाले सभी सामाजिक कार्यकर्ता बिना किसी अपराध के ही जेलों में बंद हैं। जेलों में तो तमाम अपराधों के पीड़ित भी बंद हैं। इनमें से कुछ कार्यकर्ताओं का तो गुनाह सिर्फ यह है कि वे सत्ता को उनके पुराने वादों की याद दिला रहे थे और कुछ सामाजिक ध्रुवीकरण के विरुद्ध थे। इस विकसित देश में नागरिक अधिकार उन्हीं के पास हैं जो सत्ता से जुड़े हैं या फिर उनके समर्थक हैं।

अब हमारा विकसित देश बख्शीश पर चलने लगा है। रिजर्व बैंक अपनी रिपोर्ट में बताता है कि हमारी अर्थव्यवस्था सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है और आगे भी यह तेजी कायम रहेगी। दरअसल दुनिया में कहीं भी भारत जैसी 'विकसित' अर्थव्यवस्था है ही नहीं, जो केवल पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाती है। देश में आर्थिक तौर पर बस दो ही वर्ग हैं, पूंजीपति और लाभार्थी।

प्रधानमंत्री मोदी के दौर में समाज को एक नया वर्ग मिला है, लाभार्थी का। जब देश की अर्थव्यवस्था दुनिया में सातवें स्थान पर थी तब जो लाभार्थियों की संख्या थी वही संख्या भारत के अर्थव्यवस्था के संदर्भ में चौथे स्थान पर पहुंचने के बाद भी है। यह कारनामा केवल विकसित भारत में ही हो सकता है जहां पूरी अर्थव्यवस्था बख्शीश पर आधारित है। सत्ता पूंजीपतियों को बख्शीश में तमाम सरकारी संपत्तियां सौंप देती है, प्राकृतिक संपदा उनके हवाले करती है और उनके बैंक-लोन की रकम भी माफ कर देती है। इससे पूंजीपतियों की संपदा तेजी से बढ़ रही है और फिर पूंजीपति खुश होकर बीजेपी को भारी भरकम बख्शीश देते हैं जिससे बीजेपी का घोषित बैंक-बैलेंस बड़ी तेजी से बढ़ रहा है।

अब सामान्य जनता कहीं नजर नहीं आती, बस लाभार्थी हैं। सत्ता के लिए यह एक छोटी सी इनवेस्टमेंट है जिसके बल पर कुर्सी पर वापसी सुनिश्चित रहती है। यदि चुनावों के ठीक पहले सत्ता में वापसी पर जरा भी संदेह रहता है तो चुनावी घोषणा के ठीक एक दिन पहले महिलाओं के लिए बख्शीश बैंक-खातों में भेज दी जाती है, जाहिर है चुनावों की घोषणा भी तो सत्ता में बैठे आकाओं के हुक्म से ही की जाती है। दूसरी तरफ चुनावों में अपनी जीत पर आश्वस्त होने की दशा में प्रधानमंत्री द्वारा घोषित महिलाओं को दी जाने वाले बख्शीश भी जीत के बाद ठंडे बस्ते में डाल दी जाती है- जैसा दिल्ली में हो रहा है।


प्रधानमंत्री बार-बार 'ईज़ ऑफ लिविंग' की बात करते हैं, पर उनके विकसित भारत में तो जिंदा रहने का अधिकार ही केवल सवर्ण हिंदुओं को है। सत्ता-संरक्षित पूंजीवाद ने आदिवासियों की जमीनों और संपदा को लूट लिया, पिछड़ी जाति के हिंदुओं की हत्या कभी भी की जा सकती है। सत्ता और कानून ऐसे हत्यारों की सुरक्षा में तत्पर रहते हैं और सत्ता-समर्थक फूल-माला पहनाने को आतुर। मुस्लिम और क्रिश्चियन अधिकार-विहीन नागरिक घोषित कर दिए गए हैं- कहीं भी इनकी संपत्तियों पर कब्जा किया जा सकता है, इनके घरों को बुल्डोज़र से ढहाया जा सकता है, गौ-तस्करी के नाम पर या बिना कारण भी इनकी हत्या की जा सकती है।

सत्ता में बैठे शीर्ष नेतृत्व से लेकर हरेक छुटभैये नेता तक सवर्ण हिंदुओं को छोड़कर शेष सभी वर्गों और धर्मों के लिए अनर्गल प्रलाप से लेकर हिंसक बयानों के लिए आजाद हैं। हिंसक बयानों वाले नेताओं को सत्ता में बड़े आदर-भाव से देखा जाता है और राजनीति में उनका उत्थान भी जल्दी होता है। दिल्ली सरकार के मंत्रियों की सूची देखकर बीजेपी में हिंसक बयानों और अनर्गल प्रलापों की महत्ता को समझा जा सकता है।

प्रधानमंत्री मोदी के विकास में ईज़ ऑफ लिविंग के नारे के बाद भी आप वायु प्रदूषण से मर रहे हैं, गंदा पानी पी कर मर रहे हैं या फिर अत्यधिक तापमान से मर रहे हैं- मरने के लिए आप स्वतंत्र हैं। दुनिया में भूख और कुपोषित से ग्रस्त व्यक्तियों की संख्या भारत में है, पर 'नॉन-बायोलाजीकल' के प्रताप से यहां कोई भूख से नहीं मरता, प्रदूषण से नहीं मरता। विकास का आलम यह है कि कोविड-19 की अफरातफरी के बीच भी कोई ऑक्सीजन की कमी से नहीं मरा। पूरा देश खुशहाल हो गया है, सभी अपनी पूरी जिंदगी संतुष्टि में बिताते हैं- खुशहाली इंडेक्स में सबसे नीचे भारत को रखने वाले हमारी खुशहाली से जलते हैं।

विकसित भारत के नायाब रत्नों में से एक वित्त मंत्री निर्मल सीतारमण भी हैं, जिनके अनर्गल प्रलाप की कोई सीमा नहीं है। मार्च 2023 में सरकारी स्तर पर बड़े जोर शोर से प्रचारित किया गया था कि वर्ष 2014-2015 से लेकर 2022-2023 के बीच देश में प्रति व्यक्ति आय लगभग दोगुनी बढ़ गई। इसके अगले ही वर्ष, यानि 2024 में, देश की बड़बोली वित्त मंत्री निर्मला सीतारमँ ने ऐलान कर दिया कि अगले 5 वर्षों के दौरान ही देश में प्रति व्यक्ति आय फिर से दोगुना बढ़ जाएगी और सामान्य आबादी के जीवन स्तर में अप्रत्याशित उछाल आएगा।

यह सारे वक्तव्य सुनने में बड़े अच्छे लगते हैं और मीडिया इन्हें खूब प्रचारित करता है- पर वास्तविकता से कोसों दूर हैं। यदि इन वक्तव्यों को सही मान भी लिया जाए तो वास्तविकता यह है कि प्रति व्यक्ति आय के दोगुना होने के बाद से 80 करोड़ से अधिक आबादी को जिंदा रखने के लिए सरकार को 5 किलो मुफ़्त अनाज देना पड़ रहा है जबकि जब आय आधी थी तब इसकी जरूरत नहीं थी। दूसरी तरफ, अगले 5 वर्षों के दौरान जब प्रति व्यक्ति आय दोगुनी हो जाएगी, तब भी 80 करोड़ से अधिक आबादी को मुफ़्त अनाज देने की जरूरत पड़ेगी। सवाल यह उठता है कि, आय दोगुना होने का फायदा किसे मिल रहा है- कम से कम 80 करोड़ से अधिक आबादी को तो बिल्कुल नहीं मिल रहा है, यह तो सरकार स्वयं उजागर कर रही है।


विशेषज्ञों के अनुसार प्रति व्यक्ति आय के सरकारी दावे महज एक छलावा हैं, जुमला हैं। वर्ष 2014 से 2022 के बीच प्रति व्यक्ति आय के दोगुना होने के दावों में डॉलर की तुलना में रुपये के अवमूल्यन और बेतहाशा बढ़ती महंगाई दर को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया था। विशेषज्ञों के अनुसार इस पूरी अवधि में प्रति व्यक्ति आय में वास्तविक वृद्धि महज 35 प्रतिशत ही रही थी, और यह वृद्धि भी देश की सबसे समृद्ध 10 प्रतिशत आबादी के हिस्से ही रही थी।

विकसित भारत की तथाकथित मीडिया अब गोदी मीडिया नहीं रही बल्कि अब तो पूरी तरह से रक्त-पिपासु दानव में तब्दील हो चुकी है– समाज में ध्रुवीकरण और हिंसा फैलाना ही इसका उद्देश्य है और इसीलिए इन्हें सत्ता से संरक्षण प्राप्त है। दिनभर चलने वाले समाचार चैनलों  में हिंसा, घृणा और झूठ परोसा जाता है। प्रधानमंत्री मोदी के विकसित भारत में सत्ता और पूंजीपति अट्टाहास कर रहे हैं, लाभार्थी जनता अफीम के नशे में है, मध्यम वर्ग सरकारी 5 किलो अनाज पर जिंदा है, मीडिया अपराधियों को भगवान बना रही है और इन सबके बीच विकास की बारिश हो रही है, विकास नदियों में बहने लगा है, विकास तो अब कोहरे के पार भी दिखने लगा है। साल-दर-साल विकास की पराकाष्ठा नजर आने लगी है, अब तो विकास से लोग मरने भी लगे हैं।

Google न्यूज़नवजीवन फेसबुक पेज और नवजीवन ट्विटर हैंडल पर जुड़ें

प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए, यहां क्लिक करें @navjivanindia