सिर्फ चुनावी नाटक है मोदी का महिला सशक्तिकरण !

बीजेपी में महिला सांसदों की संख्या, उसकी विचारधारा और उसका आईटी सेल तीनों एक ही बात कहते हैं, बीजेपी के लिए महिला आरक्षण एक चुनावी दिखावा है, लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता नहीं।

फोटो: Getty Images
i
user

गुरदीप सिंह सप्पल

भारत को महिला अधिकारों के लिए एक नया चैंपियन मिल गया है। वह अपने को महिलाओं का सबसे बड़ा ख़ैरख़्वाह बताता है। वह चाहता है कि आप उस पर यक़ीन करें और पुराने इतिहास को भूल जाएं।

मगर ये हो न सकेगा!

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में संसद में, राज्य विधानसभाओं में और उनके अपने मंत्रिमंडल में महिलाओं का प्रतिनिधित्व हाल के दशकों में सबसे कम रहा है। उनका शासनकाल महिला अधिकारों के लिए नहीं, महिला विरोधी सोच को राजनैतिक हथियार बनाने के लिए याद किया जाएगा।

मोदी ने कुख्यात आईटी सेल को सामाजिक मान्यता दी, जो राजनैतिक और वैचारिक विरोध रखने वाली महिलाओं को बदनाम करने, उन्हें ट्रोल करने के लिए जाना जाता है और उसके सदस्यों को मोदी स्वयं सोशल मीडिया पर फॉलो करते हैं। बिना शर्म, बिना झिझक के! उनकी राजनीति बलात्कारियों को माला पहनाए जाने का मूक समर्थन करती है। जब महिला पहलवान जंतर-मंतर पर ज़ुल्म के ख़िलाफ़ धरने पर बैठती हैं, तो मोदी की चुप्पी उन महिलाओं के ख़िलाफ़ ही जाती है।

यह सब संयोग नहीं है। यह एक ऐसी वैचारिक परंपरा की उपज है, जिसने कभी महिलाओं को केवल देह के रूप में देखती है। ऐसी देह, जिसे सांस्कृतिक-वैचारिक युद्ध में इस्तेमाल किया जा सकता है। सावरकर, जो हिन्दुत्व के वैचारिक जनक हैं, जिनका चित्र संसद के सेंट्रल हॉल में लगा है, उन्होंने इस बारे में अपने विचार छुपाए नहीं हैं। अपनी किताब 'सिक्स ग्लोरियस एपक्स ऑफ इंडियन हिस्ट्री' में उन्होंने शिवाजी की इस बात की आलोचना की कि वह बंदी बनाई गई मुस्लिम महिलाओं के साथ शिष्टाचार से पेश आए। सावरकर ने सवाल उठाया था कि क्या हिन्दू राजाओं को ऐसा करना चाहिए था। वह यौन हिंसा को राजनीतिक हथियार बनाने के पक्ष में स्पष्ट स्टैंड लेते हैं। उनके ये विचार दस्तावेजों में दर्ज हैं, आरएसएस से जुड़े प्रकाशनों ने भी इसे स्वीकार किया है।


ये विचारधारा महिलाओं की देह को सांप्रदायिक सम्मान और वैचारिक लड़ाइयों का मैदान मानती है। 'सुल्ली डील्स' और 'बुल्ली बाई' जैसे ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर मुस्लिम महिलाओं के ख़िलाफ़ निशाना बनाने से लेकर लेंसकार्ट के हिन्दू मालिक की घिनौनी ट्रोलिंग तक, यह सब एक ही सोच की कड़ियां हैं।

मोदी महिलाओं के लिए एक असुरक्षित और दकियानूसी सोच वाली दुनिया रच रहे हैं, लेकिन साथ-साथ उनके सशक्तिकरण का झंडा भी उठा रहे हैं। यह एक सुनियोजित रणनीति है। उनका ध्येय है असली मक़सद छुपा कर ताक़त हासिल करना ताकि आधुनिक, प्रगतिशील भारतीय गणराज्य पर अंतिम हमला बोला जा सके।

आंदोलन जो महिलाओं के कंधों पर खड़ा था

बीजेपी के दोहरेपन को समझने के लिए थोड़ा इतिहास में लौटना होगा। वहां, जहां भारत की लोकतांत्रिक चेतना का निर्माण हुआ, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में चले स्वतंत्रता संग्राम में। जब ब्रिटेन, अमेरिका और फ़्रांस ने महिलाओं को मतदान का अधिकार भी नहीं दिया था, तब कांग्रेस में न सिर्फ़ महिलाएं कंधे से कंधा मिला कर चल रही थीं, बल्कि पार्टी के सर्वोच्च पदों को सुशोभित भी कर रही थीं।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1917 में एनी बेसेंट को अपना अध्यक्ष बना दिया था। उसके बाद, 1925 में सरोजिनी नायडू और 1933 में नेली सेनगुप्ता भी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनीं। तीन महिलाएं राष्ट्रीय आंदोलन की अगुआ बन चुकी थीं, आज़ादी से पहले, गणराज्य के निर्माण से पहले, संविधान बनने से पहले। यह कोई दिखावा मात्र नहीं था। यह उस आंदोलन का स्वाभाविक स्वभाव था, महिला अधिकार जिसका एक अभिन्न हिस्सा थे।

1928 की मोतीलाल नेहरू रिपोर्ट में महिलाओं के समान अधिकारों का स्पष्ट प्रस्ताव था, जिसमें स्त्री-पुरुष के भेद बिना सभी को वयस्क मताधिकार देने की बात कही गई थी। 1931 का कराची का ऐतिहासिक प्रस्ताव महात्मा गांधी के मार्गदर्शन में तैयार हुआ। इसे जवाहरलाल नेहरू ने पेश किया था। प्रस्ताव में सबके लिए समान मौलिक अधिकारों का स्पष्ट ज़िक्र था। कराची प्रस्ताव महज़ शब्दों का खेल नहीं था। इसमें एक ऐसे गणराज्य की नींव को परिभाषित किया गया था, जिसका ख़्वाब आज़ादी के दीवानों ने देखा था।

महात्मा गांधी ने ख़ुद भी महिलाओं की स्वायत्तता पर बड़ी स्पष्टता से लिखा और बोला था। उन्होंने लिखा था कि अगर असहयोग आंदोलन को सफल होना है, तो महिलाओं को बराबर की भागीदार होना होगा। उन्होंने कहा था कि महिलाओं का जागना भारत के जागने की सबसे बड़ी निशानी है। जवाहरलाल नेहरू ने ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में कहा था कि महिलाओं की स्थिति किसी समाज की सभ्यता का पैमाना है।

13 दिसंबर 1946 को जब संविधान सभा में उद्देश्य प्रस्ताव पेश हुआ, तो नेहरू ने एक संप्रभु, स्वतंत्र गणराज्य का सपना पिरोया, जो 'सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय' और 'दर्जे और अवसर की समानता' की गारंटी दे। महिलाएं हर क्षेत्र में बराबर होंगी, यह वायदा देश से किया गया।


1925 से 1950 तक की वह ख़ामोशी

आरएसएस की स्थापना 1925 में हुई। इसके अगले 25 वर्षों में और संविधान सभा की बैठकों के दौरान, इस संगठन ने महिला अधिकारों, महिला शिक्षा या महिला राजनीतिक भागीदारी पर एक भी ठोस बयान नहीं दिया। एक भी नहीं। महिला मुक्ति कभी उनके एजेंडे पर थी ही नहीं। उनके नज़रिये में महिलाओं की भूमिका घर की देखरेख करने और हिन्दू सभ्यता की निरंतरता को आगे बढ़ाने की थी। संसद या अदालतों में सक्रिय भागीदार की नहीं थी।

जब 26 नवंबर 1949 को संविधान लागू हुआ और हर भारतीय महिला को गणराज्य में बराबर की हिस्सेदार घोषित किया गया, तो आरएसएस ने मुखपत्र 'ऑर्गनाइज़र' में इसे नकार दिया। 30 नवंबर 1949 के अपने संपादकीय में उसने शिकायत की कि नए संविधान में 'प्राचीन भारत के अनूठे संवैधानिक विकास का कोई उल्लेख नहीं है'। उसने मनुस्मृति की तारीफ़ की और कहा कि मनुस्मृति की कोई छाप इस संविधान पर नहीं है। वह मनुस्मृति, जो महिलाओं की स्वाधीनिता को नकारती है और महिलाओं को बचपन में पिता की निगरानी में, जवानी में पति की, और बुढ़ापे में बेटे की निगरानी में रखने की पक्षधर है।

आरएसएस का विरोध सिर्फ संपादकीय तक ही सीमित नहीं रहा। जब हिन्दू कोड बिल पेश हुआ, जो हिन्दू महिलाओं के लिए समान विरासत और तलाक़ के अधिकार तय करना चाहता था, तो आरएसएस कार्यकर्ताओं ने संसद भवन तक मार्च किया, नेहरू और आम्बेडकर के पुतले जलाए और बिल को 'हिन्दू समाज पर परमाणु बम' कहा। भाजपा की पूर्व पार्टी भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा कि यह बिल 'हिन्दू संस्कृति की भव्य इमारत को तोड़ देगा।' उनके लिए महिला समानता का मतलब था हिन्दू संस्कृति का विनाश।

वह विरासत जो आज भी जारी है

ऐसा नहीं है कि ये सब बातें पुरानी हो गई हैं। जनवरी 2013 में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि विवाह एक अनुबंध है, और अगर पत्नी घर नहीं संभालती, तो पति उसे छोड़ सकता है। यहां कोई ज़ुबान नहीं फिसली थी। यह उनके सर्वोच्च वैचारिक नेता की एक सोची-समझी राय थी। इसीलिए महिला आरक्षण विधेयक जब भाजपा के कार्यकाल में आया भी, तो उसमें एक प्रावधान कर दिया, जो अनिश्चितकाल के लिए टाल दे।


उधार का मुद्दा

महिला आरक्षण की भावना सिर्फ़ संसद में सीटों तक सीमित नहीं है। यह तय करेगा कि भारत में एक महिला की आवाज़ का कितना वज़न है। आरएसएस तो महिला अधिकारों की कभी भी चैंपियन नहीं रहा। बल्कि उसने तो वह मुद्दा, वह भाषा, वह प्रतीक, वह विधायी ढांचा, उस सब का हमेशा विरोध किया जिसे कांग्रेस ने देश में विकसित किया था। लेकिन अब वह उन्हीं महिला अधिकारों के पक्ष में उधार का स्टैंड ले रही है, जिससे उसका वैचारिक तालमेल ही नहीं है।

भारत में महिला अधिकार किसी चुनावी अभियान की उपज नहीं हैं। वह तो उस लोकतांत्रिक परंपरा का हिस्सा है, जो आज़ादी के आंदोलन के दौरान उपजी थी। ये उन महिलाओं की विरासत है, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की लाठियां खाईं, जिन्होंने गांधी जी के साथ मार्च किया, बहस की, क़ानून बनाए और नेतृत्व किया। यह सरोजिनी नायडू, सुचेता कृपलानी, अम्मु स्वामीनाथन, हंसा मेहता, दुर्गाबाई देशमुख, अरुणा आसफ़ अली, विजया लक्ष्मी पंडित की विरासत है। ये वो महिलाओं थीं जिन्होंने भारत के गणराज्य की रूपरेखा को गढ़ा है।

लेकिन बीजेपी और आरएसएस की एक अलग ही विरासत है। वे एक भी महिला का नाम नहीं बता सकते हैं, जो स्वतंत्रता संग्राम में उनकी नेता रही हो या जिसने हिस्सा लिया हो। बता भी नहीं सकता। स्वाधीनता संग्राम में न तो वो ख़ुद थे, न ही उनके संगठन में महिला नेतृत्व का हिस्सा थी।

यह सच है कि अभी उनका प्रचार धुंआधार है। लेकिन उनके इतिहास का रिकॉर्ड सार्वजनिक है, उनकी विचारधारा उन्हीं के लेखों में दर्ज है। उनके मंसूबों की वही स्पष्ट निशानी है।

सच यही है कि कोई भी एक साथ मनु का वारिस और महिलाओं का चैंपियन नहीं हो सकता। बीजेपी में महिला सांसदों की संख्या, उसकी विचारधारा और उसका आईटी सेल तीनों एक ही बात कहते हैं: बीजेपी के लिए महिला आरक्षण एक चुनावी दिखावा है, लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता नहीं।

Google न्यूज़नवजीवन फेसबुक पेज और नवजीवन ट्विटर हैंडल पर जुड़ें

प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए, यहां क्लिक करें @navjivanindia