मोहन भागवत का न्यूयॉर्क दौरा: अमेरिका में भी भारत जैसी वैधता की टोह
भागवत की अमेरिका यात्रा का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि संघ पहली बार अपने को एक वैश्विक सांस्कृतिक संगठन के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है, लेकिन दुनिया उसे भारत की राजनीतिक बहसों से अलग करके देखने को तैयार नहीं है।

मोहन भागवत का अमेरिका दौरा समाप्त होते-होते यह स्पष्ट हो गया है कि इसे केवल किसी धार्मिक-सांस्कृतिक संगठन के प्रमुख की प्रवासी भारतीयों से मुलाकात मानना पर्याप्त नहीं होगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष में अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन की यात्रा एक ऐसे समय में हुई है जब संघ भारत के भीतर अपने सामाजिक विस्तार के साथ-साथ विदेशों में अपनी वैचारिक उपस्थिति को भी अधिक व्यवस्थित रूप देने की कोशिश कर रहा है। संघ ने इस यात्रा को तीन उद्देश्यों से जोड़ा है—भारत, हिंदू समाज और संघ के बारे में अपनी ‘सकारात्मक’ दृष्टि दुनिया के सामने रखना, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश पहुंचाना और विदेशों में हिंदू तथा भारतीय मूल के लोगों के हितों और अधिकारों के संबंध में मुख्यधारा के समाज से संवाद बढ़ाना।
लेकिन किसी संगठन के घोषित उद्देश्य और उसके राजनीतिक-सामाजिक प्रभाव को एक ही चीज मान लेना ठीक नहीं होगा। भागवत की यात्रा का महत्व इस बात में है कि पहली बार संघ का शीर्ष नेतृत्व अमेरिकी सार्वजनिक क्षेत्र में इतने बड़े प्रतीकात्मक मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है। न्यूयॉर्क का मैडिसन स्क्वायर गार्डन केवल एक सभागार नहीं है; वह अमेरिकी लोकप्रिय संस्कृति, सार्वजनिक राजनीति और बड़े पैमाने की जन-उपस्थिति का प्रतीक है। वहां 29 अगस्त को आयोजित ‘Universal Oneness Celebration’ में पांच हजार से अधिक लोगों के पहुंचने की उम्मीद थी और आयोजकों के अनुसार 250 से अधिक हिंदू-अमेरिकी संगठन उससे जुड़े थे।
यही वह बिंदु है जहां इस यात्रा का सांस्कृतिक आवरण और उसका राजनीतिक अर्थ एक-दूसरे से जुड़ते हैं।
भागवत ने न्यूयॉर्क में जिस भाषा का इस्तेमाल किया, वह विशेष ध्यान देने योग्य है। उन्होंने भारत की पहचान को ‘विविधता में एकता’ से जोड़ा और कहा कि यदि कोई व्यक्ति यह चाहता है कि भारत में मुसलमान न रहें तो वह हिंदू नहीं है। यह भाषा भारत में संघ की आलोचना के बीच पैदा हुए अंतरराष्ट्रीय प्रश्न का एक उत्तर भी दिखाई देती है। अमेरिका में संघ को केवल भारत के एक सांस्कृतिक संगठन के रूप में नहीं देखा जाता। उसे बीजेपी की वैचारिक जड़ों से जुड़े संगठन के रूप में देखा जाता है। इसलिए जब भागवत अमेरिकी मंच पर हिंदू-मुस्लिम सह-अस्तित्व, बहुलता और मानवता की बात करते हैं तो वे केवल भारतीय-अमेरिकी श्रोताओं से संवाद नहीं कर रहे होते; वे अमेरिकी सार्वजनिक विमर्श में आरएसएस की एक नई छवि प्रस्तुत कर रहे होते हैं। इसे संघ की ‘वैश्विक रीब्रांडिंग’ कहा जा सकता है।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
प्रवासी भारतीय : केवल समुदाय नहीं, प्रभाव का क्षेत्र
अमेरिका में भारतीय मूल का समुदाय अब केवल प्रवासी समुदाय नहीं रह गया है। वह अमेरिकी विश्वविद्यालयों, तकनीकी कंपनियों, चिकित्सा संस्थानों, उद्यमिता, वित्त, मीडिया और राजनीति में प्रभावशाली उपस्थिति रखता है। इस समुदाय का एक हिस्सा भारतीय राजनीति में गहरी रुचि रखता है और भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर सक्रिय है। इसलिए आरएसएस के लिए अमेरिकी भारतीय समुदाय का महत्व स्वाभाविक है।
संघ का वैश्विक विस्तार भारत में शाखाओं की संख्या बढ़ाने जैसा नहीं हो सकता। विदेशों में उसे स्थानीय संस्थाओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, धार्मिक संगठनों, पेशेवर समूहों, सामुदायिक नेताओं और दूसरी पीढ़ी के भारतीय-अमेरिकियों के माध्यम से अपनी उपस्थिति बनानी होगी। यही कारण है कि भागवत के दौरे में ‘समुदाय’ के साथ-साथ उद्योग, तकनीक और पेशेवर क्षेत्र के लोगों से संवाद भी दिखाई दिया। न्यूयॉर्क में उन्होंने उद्योग और तकनीकी क्षेत्र के प्रतिनिधियों के साथ निवेश, तकनीक, अंतरिक्ष, स्वच्छ ऊर्जा और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसे विषयों पर बातचीत की।
यहां संघ का एक व्यापक दृष्टिकोण दिखाई देता है—सांस्कृतिक पहचान, प्रवासी समुदाय और भारत की वैश्विक आर्थिक आकांक्षाओं को एक ही संवाद में जोड़ना। यह बीजेपी की प्रत्यक्ष राजनीति नहीं है। लेकिन इसके राजनीतिक प्रभाव से इनकार भी नहीं किया जा सकता।
संघ और बीजेपी : यह रिश्ता क्या कहलाता है...
आरएसएस स्वयं राजनीतिक दल नहीं है। लेकिन बीजेपी के साथ उसका वैचारिक और संगठनात्मक संबंध भारतीय राजनीति का स्थापित तथ्य है। अमेरिकी मीडिया और अमेरिकी नीति-संस्थाएं भी संघ को अक्सर बीजेपी के वैचारिक स्रोत या वैचारिक अभिभावक के रूप में वर्णित करती हैं। इसलिए विदेशों में संघ की स्वीकार्यता का प्रभाव केवल उसतक ही सीमित नहीं रहता।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा। बीजेपी की विदेश नीति और संघ की वैश्विक सांस्कृतिक उपस्थिति दो अलग चीजें हैं। भारत सरकार राजनयिक संबंधों के माध्यम से काम करती है; बीजेपी चुनावी और राजनीतिक नेटवर्क के माध्यम से; जबकि संघ सांस्कृतिक और वैचारिक नेटवर्क के माध्यम से। इन तीनों की भूमिकाएं अलग हैं, लेकिन इनके बीच सामाजिक आधार और व्यक्ति-सम्बंधों की कई परतें हो सकती हैं। इसीलिए भागवत की यात्रा को किसी सरकारी कूटनीतिक यात्रा के रूप में देखना गलत होगा। लेकिन उसे राजनीति से पूरी तरह बाहर रखना भी उतना ही गलत होगा।
सवाल अमेरिकी लॉबिंग का
इस यात्रा को समझने में सबसे महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि 2025 में सामने आया अमेरिकी लॉबिंग विवाद है। अमेरिकी कांग्रेस के लॉबिंग खुलासों की रिपोर्टिंग के अनुसार वॉशिंगटन की लॉ फर्म Squire Patton Boggs को 2025 में लगभग 3,30,000 डॉलर का भुगतान एक ऐसी व्यवस्था के तहत किया गया था जिसका उद्देश्य संघ को अमेरिकी अधिकारियों से परिचित कराना था। उस समय रिपोर्टों में यह व्यवस्था संघ से जुड़ी बताई गई थी। आरएसएस ने इसका खंडन किया और कहा कि उसने अमेरिका में किसी लॉबिंग फर्म को नियुक्त नहीं किया है। बाद में Squire Patton Boggs ने अपने डिस्क्लोजर यानी प्रकटीकरण में बदलाव करते हुए कहा कि संबंधित काम के लिए उसका क्लाइंट आरएसएस नहीं बल्कि विवेक शर्मा नाम का व्यक्ति था। इसके बाद उसने आरएसएस से संबंधित काम बंद कर दिया।
यह तथ्य अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है—लेकिन इसे सावधानी से पढ़ना होगा।
यह कहना उचित नहीं होगा कि ‘आरएसएस ने अमेरिका में 3.3 लाख डॉलर की लॉबिंग कराई’ और मामला वहीं समाप्त हो गया। उपलब्ध दस्तावेजों की रिपोर्टिंग से इतना जरूर पता चलता है कि आरएसएस के नाम से जुड़ी एक लॉबिंग व्यवस्था सामने आई, भुगतान हुआ, फिर आरएसएस ने प्रत्यक्ष संलिप्तता से इनकार किया और संबंधित अमेरिकी फर्म ने बाद में अपने डिस्कोलजर में क्लाइंट संबंधी विवरण बदल दिया।।
लेकिन सवाल यही है कि किसने, किसके निर्देश पर और किस उद्देश्य से भुगतान किया? किन अधिकारियों से संपर्क किया गया? क्या यह केवल संगठन का परिचय कराने का प्रयास था या भारत-अमेरिका संबंधों के व्यापक मुद्दों पर प्रभाव बनाने का? इन प्रश्नों के उत्तर सार्वजनिक रिकॉर्ड में पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। लेकिन इतना स्पष्ट है कि संघ को अमेरिकी नीति-निर्माण के गलियारों में अपना परिचय कराने की आवश्यकता महसूस हुई थी—चाहे वह सीधे संगठन के नाम से हुआ हो या किसी मध्यस्थ के माध्यम से।
और यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें भागवत का अमेरिका दौरा अधिक अर्थपूर्ण हो जाता है।
लॉबिंग से सार्वजनिक छवि तक
वॉशिंगटन में लॉबिंग और न्यूयॉर्क में मैडिसन स्क्वायर गार्डन—दोनों को एक ही गतिविधि कहना गलत होगा। लेकिन दोनों को पूरी तरह असंबद्ध मानना भी संभवतः बहुत सरल निष्कर्ष होगा।
एक ओर सत्ता के गलियारों में प्रवेश की कोशिश दिखाई देती है; दूसरी ओर समाज में वैधता हासिल करने की कोशिश।
इसे किसी गुप्त षड्यंत्र के रूप में देखने की आवश्यकता नहीं है। आधुनिक राजनीतिक संचार में यह एक सामान्य रणनीति है—policy access और public legitimacy को समानांतर विकसित करना। भागवत के मामले में यह प्रक्रिया इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि संघ भारत में जितना प्रभावशाली है, अमेरिका में उसकी वैचारिक पहचान उतनी निर्विवाद नहीं है।
AHEAD Forum : नया नाम, पुराना नेटवर्क?
भागवत के न्यूयॉर्क कार्यक्रम का आयोजन American Hindus for Engagement and Dialogue यानी AHEAD Forum ने किया। उसका सार्वजनिक परिचय सांस्कृतिक संवाद, समुदायों के बीच सेतु और ‘धार्मिक मूल्यों’ के माध्यम से शांति तथा सद्भाव को बढ़ावा देने वाले संगठन के रूप में है। उसके अपने मंच पर ‘Global Unity’, ‘Cultural Exchange’ और ‘Dharmic Values’ जैसे शब्द प्रमुख हैं।
लेकिन AHEAD की भूमिका को लेकर अमेरिकी मीडिया और आलोचक कई प्रश्न उठा रहे हैं। अल जज़ीरा ने उसकी संस्थागत पृष्ठभूमि और संघ से जुड़े प्रवासी नेटवर्क के साथ उसके संबंधों की पड़ताल की है। कुछ आलोचनात्मक रिपोर्टों ने AHEAD को आरएसएस/एचएसएस से जुड़े पुराने नेटवर्क की नई सार्वजनिक संरचना के रूप में देखने का तर्क दिया है। इन दावों को AHEAD या आरएसएस की ओर से स्वीकार किया गया तथ्य मानना उचित नहीं होगा; इसलिए इन्हें आरोप या investigative findings के रूप में ही देखना चाहिए। फिर भी एक तथ्य महत्वपूर्ण है—AHEAD अकेला नहीं है। आयोजकों ने 250 से अधिक हिंदू-अमेरिकी संगठनों के समर्थन का दावा किया।
यानी चाहे इसे आरएसएस का प्रत्यक्ष संगठनात्मक नेटवर्क कहा जाए या व्यापक हिंदू-अमेरिकी नेटवर्क, भागवत के कार्यक्रम ने एक बड़े सामाजिक आधार को एक मंच पर लाने का प्रयास किया।
हिंदू-अमेरिकी राजनीति का बदलता चरित्र
अमेरिका में हिंदू पहचान को लेकर राजनीति अब केवल धार्मिक अधिकारों का प्रश्न नहीं रह गई है। भारतीय राजनीति की वैचारिक बहसें भी वहां पहुंच चुकी हैं।
एक ओर ऐसे संगठन हैं जो भारत की हिंदू पहचान और बीजेपी-संघ के प्रति सकारात्मक दृष्टि रखते हैं। दूसरी ओर Hindus for Human Rights, Indian American Muslim Council, Dalit Solidarity Forum और अन्य नागरिक अधिकार संगठन हैं जो हिंदुत्व की राजनीति की आलोचना करते हैं। भागवत के कार्यक्रम का विरोध इसी विभाजन का सार्वजनिक प्रदर्शन था। 65 से अधिक अमेरिकी संगठनों ने यात्रा का विरोध किया, जबकि कार्यक्रम के समर्थकों ने सैकड़ों हिंदू संगठनों के समर्थन की बात कही।
यहां एक गंभीर राजनीतिक प्रश्न पैदा होता है। क्या ‘हिंदू अमेरिकन’ अपने आप में एक राजनीतिक पहचान बन रही है?
इसका उत्तर सरल नहीं है। अमेरिका में हिंदू समुदाय वैचारिक रूप से एकरूप नहीं है। लेकिन भारतीय मूल के लोगों के बीच धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान और भारत की राजनीति के बीच संबंध निश्चित रूप से मजबूत हुआ है। यही वह क्षेत्र है जहां आरएसएस जैसी संस्था भविष्य में अपनी भूमिका बढ़ाना चाहेगी।
भागवत के दौरे का विरोध केवल कुछ प्रवासी संगठनों तक सीमित नहीं रहा। न्यूयॉर्क के मेयर ज़ोहरान ममदानी ने सार्वजनिक रूप से कहा कि वह संघ की विचारधारा अथवा कार्यक्रम का समर्थन नहीं करते। उन्होंने इसे भारत की बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष दृष्टि से असंगत बताया।
इसके बाद अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग USCIRF ने आरएसएस और भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर गंभीर आरोप लगाए और आरएसएस से जुड़े लोगों पर लक्षित प्रतिबंध तथा भागवत का वीजा रद्द करने जैसी सिफारिशें कीं। भारत सरकार इन आरोपों को पक्षपातपूर्ण बताती है और आरएसएस स्वयं को हिंदू सांस्कृतिक संगठन के रूप में प्रस्तुत करता है।
‘मुसलमान नहीं चाहिए’ वाला बयान क्यों महत्वपूर्ण है?
भागवत का यह कहना कि भारत में मुसलमानों के न होने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति हिंदू नहीं है, राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह कथन भारत में चल रही हिंदुत्व की बहस के बीच संघ की ओर से एक स्पष्ट संदेश के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन इसके दो अर्थ हैं। पहला, संघ अपनी विचारधारा की ऐसी व्याख्या प्रस्तुत कर रहा है जिसमें मुस्लिम नागरिक भारत की सांस्कृतिक अवधारणा के बाहर नहीं हैं। दूसरा, यह संदेश अमेरिका जैसे समाज में संघ की छवि को लेकर मौजूद आशंकाओं का प्रत्यक्ष उत्तर भी है।
लेकिन असली परीक्षा भाषण की नहीं, व्यवहार की होगी। यदि यह कथन आर एस एस की दीर्घकालिक सामाजिक नीति की दिशा बताता है तो इसके प्रभाव भारत में भी दिखाई देने चाहिए। यदि यह केवल अंतरराष्ट्रीय मंच के लिए चुनी गई भाषा है तो भारत और विदेश के संदेशों के बीच अंतर बना रहेगा। इसलिए भागवत के अमेरिकी वक्तव्य को न तो तुरंत ‘हृदय परिवर्तन’ कहना उचित है, न ही केवल ‘नाटक’ कहकर खारिज कर देना। राजनीतिक संगठन भाषिक बदलाव क्यों करते हैं, यह समझना अधिक महत्वपूर्ण है।
भागवत की यात्रा में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ बार-बार आया। भारत की विदेश नीति में भी पिछले वर्षों में इस अवधारणा का व्यापक उपयोग हुआ है। अब आरएसएस भी इसे अपने वैश्विक सांस्कृतिक संदेश का प्रमुख हिस्सा बना रहा है। इसमें कोई अस्वाभाविक बात नहीं है। भारतीय सभ्यता के अनेक दार्शनिक स्रोतों में सार्वभौमिक मानवता की कल्पना मौजूद है। लेकिन जब कोई संगठन इसे अपनी अंतरराष्ट्रीय पहचान का केंद्रीय सूत्र बनाता है, तो वह सांस्कृतिक दर्शन के साथ-साथ एक राजनीतिक भाषा भी तैयार करता है।
भारत अब केवल एक आधुनिक राष्ट्र-राज्य नहीं, बल्कि एक प्राचीन सभ्यता के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। संघ इस सभ्यतागत पहचान को हिंदू सांस्कृतिक दृष्टि के साथ जोड़ता है। यही वह बिंदु है जहां ‘Indian Civilisation’ और ‘Hindu Civilisation’ के अर्थों को लेकर बहस शुरू होती है।
समर्थकों के लिए दोनों लगभग एक ही सांस्कृतिक प्रवाह के दो नाम हो सकते हैं। आलोचकों के लिए यह भारत की बहुधार्मिक पहचान को एक बहुसंख्यक धार्मिक पहचान में सीमित करने का प्रयास हो सकता है। अमेरिका में यह बहस और अधिक जटिल हो जाती है क्योंकि वहां धार्मिक आजाजी, बहुलवाद, अल्पसंख्यकों के अधिकार और जातीय पहचान अलग-अलग राजनीतिक अर्थ रखते हैं।
सवला यह भी है कि भागवत का दौरा क्या अमेरिकी राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश है? इस प्रश्न का उत्तर ‘हां’ या ‘नहीं’ में देना कठिन है।
भागवत की यात्रा कोई चुनावी अभियान नहीं थी। उन्होंने किसी अमेरिकी उम्मीदवार के लिए प्रचार नहीं किया। इसलिए इसे प्रत्यक्ष अमेरिकी चुनावी राजनीति कहना गलत होगा। लेकिन भारतीय-अमेरिकी समुदाय की राजनीतिक सक्रियता, वॉशिंगटन में लॉबिंग का पिछला विवाद, उद्योगपतियों और तकनीकी क्षेत्र के नेताओं से मुलाकात, और अमेरिकी सार्वजनिक मंच पर आर एस एस की छवि बनाने की कोशिश—इन सबको मिलाकर देखें तो यह स्पष्ट है कि संघ अमेरिका को केवल सांस्कृतिक दर्शक के रूप में नहीं देखता। वह वहां एक सामाजिक प्रभाव क्षेत्र देखता है।
यही कारण है कि आर एस एस की घोषित तीसरी प्राथमिकता—‘हिंदुओं और भारतीय मूल के लोगों के हितों और अधिकारों’ पर मुख्यधारा के समाज से संवाद—महत्वपूर्ण है।
‘हित’ और ‘अधिकार’ की भाषा स्वभावतः सार्वजनिक नीति से जुड़ती है। इसलिए यह संभव है कि भविष्य में संघ-प्रेरित या उससे जुड़े प्रवासी संगठन अमेरिकी सार्वजनिक विमर्श में भारत, हिंदू पहचान और भारतीय मूल के लोगों से जुड़े प्रश्नों पर अधिक सक्रिय भूमिका निभाएं।
लेकिन अभी उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर यह कहना कि कोई एक केंद्रीकृत आर एस एस-अमेरिका राजनीतिक मशीनरी बन चुकी है, अतिशयोक्ति होगी।
असली लक्ष्य : अमेरिकी समाज में वैधता
इस पूरे दौरे को समझने के लिए शायद ‘लॉबिंग’ शब्द से अधिक उपयोगी शब्द है—legitimacy यानी वैधता।
आर एस एस भारत में अत्यंत शक्तिशाली सामाजिक संगठन है। लेकिन पश्चिमी सार्वजनिक विमर्श में उसके सामने तीन समस्याएं हैं—उसकी हिंदुत्व की विचारधारा, बीजेपी के साथ उसका संबंध और भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर उठते प्रश्न। ऐसी स्थिति में केवल समर्थकों को संबोधित करना पर्याप्त नहीं है। संगठन को विश्वविद्यालयों, पेशेवरों, उद्योगपतियों, धार्मिक नेताओं, नागरिक संगठनों और व्यापक अमेरिकी समाज तक पहुंच बनानी होगी।
भागवत का अमेरिकी दौरा इसी दिशा में एक बड़ा कदम दिखाई देता है। मैडिसन स्क्वायर गार्डन इसका सार्वजनिक चेहरा था। प्रवासी नेटवर्क उसका सामाजिक आधार है। वॉशिंगटन की लॉबिंग का 2025 का विवाद उसकी पृष्ठभूमि में मौजूद प्रश्न है। और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ उसकी वैचारिक पैकेजिंग है।
लेकिन एक खतरा भी है। यदि संघ अपनी वैश्विक छवि को केवल प्रचार के सहारे बदलना चाहता है, तो यह रणनीति लंबे समय तक सफल नहीं होगी।
अमेरिकी समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आलोचनात्मक नागरिक संस्थाएं मजबूत हैं। एक तरफ पांच हजार लोगों का कार्यक्रम हो सकता है, दूसरी तरफ उसके बाहर प्रदर्शन भी हो सकता है। एक तरफ 250 से अधिक संगठन समर्थन कर सकते हैं, दूसरी तरफ 65 संगठन संयुक्त विरोध कर सकते हैं। यानी यहां समर्थन भी सार्वजनिक है और विरोध भी।
भारत में किसी बड़े संगठन की शक्ति का अर्थ कई बार उसकी संगठनात्मक क्षमता से निकाला जाता है। अमेरिका में उसकी वैधता सार्वजनिक बहस में परीक्षा से गुजरती है। भागवत का दौरा इस परीक्षा की शुरुआत है।
भागवत की यात्रा का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि संघ पहली बार अपने को एक वैश्विक सांस्कृतिक संगठन के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है, लेकिन दुनिया उसे भारत की राजनीतिक बहसों से अलग करके देखने को तैयार नहीं है।
वह ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ कहता है—दुनिया पूछती है, भारत में अल्पसंख्यकों के साथ आपका व्यवहार क्या है? वह ‘विविधता में एकता’ कहता है—आलोचक पूछते हैं, क्या इस विविधता में सभी धार्मिक और सामाजिक पहचान समान रूप से स्वीकार्य हैं? वह स्वयं को सांस्कृतिक संगठन कहता है—अमेरिकी विश्लेषक बीजेपी और भारतीय सत्ता-राजनीति के साथ उसके संबंध की ओर संकेत करते हैं। वह प्रवासी भारतीयों के हितों की बात करता है—आलोचक पूछते हैं कि क्या यह सांस्कृतिक हितों की भाषा के भीतर राजनीतिक प्रभाव का विस्तार है?
इन प्रश्नों का उत्तर केवल भाषण से नहीं दिया जा सकता।
आर एस एस अपनी दूसरी शताब्दी में प्रवेश करने से पहले यह सुनिश्चित करना चाहता है कि भारत के बाहर उसे केवल भारत की विवादास्पद राजनीति के एक संगठन के रूप में न देखा जाए, बल्कि एक ऐसी सभ्यतागत शक्ति के रूप में देखा जाए जो विश्व को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश देती है। लेकिन इस परियोजना की सफलता अंततः इस बात पर निर्भर करेगी कि उसकी अंतरराष्ट्रीय भाषा और भारत में उसके सामाजिक-राजनीतिक व्यवहार के बीच कितनी दूरी रहती है।
यदि दोनों के बीच सामंजस्य बनता है, तो भागवत का यह दौरा आर एस एस के इतिहास में एक नए वैश्विक अध्याय की शुरुआत माना जाएगा। यदि अंतर बना रहता है, तो मैडिसन स्क्वायर गार्डन का ‘Universal Oneness’ उसके लिए उत्सव से अधिक एक प्रश्नचिह्न बन जाएगा। क्योंकि वैश्विक राजनीति में आज केवल यह पर्याप्त नहीं कि कोई संगठन स्वयं को क्या कहता है। दुनिया यह भी देखती है कि वह किसके साथ खड़ा होता है, किसके लिए बोलता है और उसके शब्दों और उसके व्यवहार के बीच कितना अंतर है
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