मृणाल पाण्डे का लेख: सावधान! फिर आ रहे हैं ‘अच्छे दिन’

सरकार नई-नई भविष्यवाणियां कर अच्छे दिनों के पुराने सपने जगा रही है। इस सारे शोर-शराबे के बीच पेट्रो पदार्थों की कीमतों में कमरतोड़ बढ़ोतरी, साल भर से जारी किसानों के धरने, खूंटा तुड़ा कर भागती महंगाई पर संसद या सड़क, कहीं भी एक दमदार सार्वजनिक बहस नहीं हो पा रही।

फोटो: नवजीवन
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मृणाल पाण्डे

पिछले महीने से सरकार कभी भारी विदेशी पूंजी की आवक की भविष्यवाणियां कर अच्छे दिनों के पुराने सपने जगा रही है, कभी एक दिन के भीतर सौ करोड़ टीकाकरणों, और वाराणसी से भारी तादाद में नए मेडिकल कॉलेज खोलकर देश को डॉक्टरों से भरने का आश्वासन दे रही है। जनता से अपेक्षा है कि वह कोविड की अनगिनत मौतों को दु:स्वप्न की तरह भुला दे। पेट्रोल की कीमतों में भारी वृद्धि को मुफ्त टीकाकरण की अनिवार्य जरूरत माने। और किसान आंदोलन को देशविरोधी ताकतों की साजिश मान कर उपेक्षा कर दे। फिर नेतृत्व को शत-शत नमन और नेतृत्व की दूरदर्शिता और साफ उजली छवि के अभिनंदन का सिलसिला शुरू हो। इतने के बाद भी खराब खबरें आना बंद नहीं होती, तो पटरी बदल ली जाती है। लिहाजा सोशल मीडिया और जनसभाओं में कांग्रेस सहित समूचे विपक्ष और उनके सोशल मीडिया समर्थकों, बॉलीवुड के अल्पसंख्यक सितारों को हर तरह के दुराचार और भ्रष्टाचार का समर्थक और सरकारी उपलब्धियों, उसकी विशाल सफलताओं को झुठलाने का जिम्मेदार बता कर उनको मां भारती के कुपूत कहा जाता है।

ऐसी गला फाड़ ताना रीं-रीं से निबटने को विपक्ष को भी कुछ ऐसी ही फतवेबाज शैली अपनानी जरूरी बन चली है। दुख यही है कि इस सारे शोर-शराबे के बीच पेट्रो पदार्थों की कीमतों में कमरतोड़ बढ़ोतरी, साल भर से जारी किसानों के धरने, खूंटा तोड़ कर भागती महंगाई और विपक्ष के खिलाफ बार-बार हथियार बनती सरकारी जांच एजेंसियों की कार्यशैली और घोटालों पर संसद या सड़क, कहीं भी एक दमदार सार्वजनिक बहस नहीं हो पा रही।

सड़कों पर लगे बैरिकेडों और प्रिंट तथा टीवी के मालिकान घरानों को बहस विमुख बनाने के बाद बहस हो भी तो कहां? ले देकर एक सोशल मीडिया ही कुछ हद तक ऐसा मंच बचा है जहां आम जन अपने मन की बात खुल कर कह सकते हैं। लेकिन हालिया नियम बदलावों से अभिव्यक्ति की वैसी आजादी पर भी कठोर प्रशासकीय लगाम साधने का उपक्रम हो रहा है। बिना मीडिया या जनता से राय- मशवरा किए लाए गए नए नियमों के खिलाफ मीडिया की याचिकाएं अभी माननीय उच्चतम अदालत में विचाराधीन हैं। इसी बीच यह खबर आई है कि फेसबुक तथा ट्विटर में जो भारत के सबसे लोकप्रिय सोशल मीडिया मंच हैं, खुद उनकी भीतरी जांच ने पाया है कि संभवत: मूल डिजिटल बीजाक्षरों (अल्गोरिद्म्स) का झुकाव सायास या अनायास, दुनियाभर में इन मंचों के संदेशों को दक्षिणपंथी विचारधारा के पक्ष में अधिक झुकात रहा है। फेसबुक की एक कर्मी ने सार्वजनिक किया है कि अमेरिका से भारत तक राजनीतिक दलों के किराए के टट्टुओं ने चुनावों में जमकर फेक खबरें और अफवाहें फैलाईं, चेहरे मॉर्फ करके नकली वीडियो जारी किए। और सच्ची खबरों को दबाया। इससे देशों में नस्लवाद, राजनीतिक गलतफहमियों और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बहुत उकसावा मिला, कई बार दंगे भड़के और तानाशाह नेतृत्व पुष्ट हुआ।


दुनिया में राजनीति की गंगा जितनी मैली हो चुकी है, उसके जानकारों को ये खबरें दुखी भले करें, चकित बिलकुल नहीं करतीं। नई सरकार आने के बाद अमेरिका में सीनेट पर दक्षिणपंथियों के धावे की पड़ताल के बाद सोशल मीडिया के मंचों पर बड़ेनेताओं के भड़काऊ बयान जन प्रदर्शनों या चुनावी रैलियों के दौरान हंगामा मचाने की क्षमता रखते हैं। किराये के गुड्डों द्वारा मीडियाकर्मियों के साथ शारीरिक बदसलूकी भी अब नई बात नहीं। मखु्यधारा मीडिया को ऐसी दशा में अपनी हिफाजत के लिए भी फेक न्यूज और ट्रोल्स की मार्फत जान बूझकर फैलाई गलतफहमियों को जस-का-तस अपनाने की बजाय कुछ सबक सीखने होंगे। सबसे प्रमुख है तथ्य जुटा ने में तटस्थ नजरिया, साक्ष्यों की खोज तथा पड़ताल पर मेहनत करने पर बल और लोकतंत्र में सर्वसम्मति का सम्मान करना। दूसरा सबक है कि वह आंखों देखे अन्याय को झुठलाते हुए अपराध की दुनिया में शामिल रसूखदार लोगों का भोंपू बन कर पैसा बटोरने के चक्कर में पुरानी पीढ़ी द्वारा दशकों में अर्जित अपनी साख न खोए। मानवीय और आर्थिक पैमाने पर फिसड्डी साबित होने पर भी शिखर नेता को धन्यवाद के विज्ञापन भले छापे, पर उनको विज्ञापन बना कर ही। अपने संपादकीय पृष्ठों को तो राजनीति के हाथों गिरवी न होने दे।

मई, 2014 में मौजूदा सरकार इसी तरह के चुनाव प्रचार के बाद तत्कालीन सरकार के चाल, चरित्र और चेहरे को हर तरह से दागी बताते हुए एनडीए गठजोड़ ने बड़ी मुखर और चतुराई से संयोजित मुहिम चलाई थी। तब संसद की दहलीज पर मत्था टेकने और हिंदी या संस्कृत में शपथग्रहण-जैसे नाटकीय अंदाज को एक जनोन्मुखी नैतिकता और उजलेपन की निशानी माना गया। उम्मीद बनने लगी कि अब जमीनी नेता दिल्ली की रीति-नीति को बदल कर समाज की सबसे निचली सीढ़ी पर खड़े आम आदमी को सरकार की पहली प्राथमिकता बनाएंगे। लेकिन केंद्र में बड़े नेताओं के करीबियों का उपकृत होना, क्षेत्रीय क्षत्रपों का वंशवाद और सूटबूट वाला टशन कायम है। यह भी गौरतलब है कि पहले अपारदर्शी चुनावी बॉन्ड लाकर राजनीतिक दलों के चंदाकोष को जन पड़ताल से दूर बना दिया गया। फिर कई तरह के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष नए कर करदाताओं पर लादे गए। अब जनता को बताया जा रहा है कि उनसे मिली अतिरिक्त राशि को तो तुमको मुफ्त टीका देने में खर्चा जा रहा है। शिखर पुरुष को धन्यवाद देने वाले विज्ञापनों से भरपूर कमाई कर रहा मीडिया बताए कि टीके सचमुच कितनों को मफु्त मिले? इस पर कोई भरोसेमंद साक्ष्य सामने लाया गया हो, यह हमको नहीं पता। यही कारण है कि सामान्य जन को राजनेताओं ही नहीं, बड़े मीडिया घरानों के ईमानदारी के चोले के भीतर भी एक बेईमान अस्तर और चोर जेब दिखाई देने लगे हैं। फिर भी जनता की नजरों में विपक्ष की एक भारी कमजोरी है, उसका एकजुट न हो पाना और दूसरी कमी है, सत्ता के दिनों में ऊपरी आमदनी और शान-शौकत के अभ्यस्त उसके अपने कुछेक जयचंदों का अचानक भितरघाती बन कर पहले दल भीतर फूट डलवाना, फिर प्रतिपक्षी की गोद में जा बैठना। और यह होते ही उनके खिलाफ लटकाई गई सभी कानूनी तलवारें विस्मयकारी तरीके से म्यान में चली जाती हैं। ऐसा नहीं कि शेष विश्व दूध का धुला था। इस बीच पहले राफेल खरीदारी और फिर पेगासस रपटें आईं जिनसे अंतरराष्ट्रीय राजनीति के कालेधन सप्लायर्स के हैरतअंगेज जमीनी तलघरों के समवेत दर्शन भी दुनिया के कई लोकतंत्रों को हुए। पर हमारे मीडिया ने असलियत का पीछा वैसे नहीं किया जैसा अमेरिका, ब्राजील या यूरोप में हो रहा है। मीडिया का ढुलमुलपना देखते हुए कम-से-कम पढ़ी-लिखी जनता को तो लगने ही लगा है कि ऐसा मीडिया कहीं मीर कासिम को हटा कर किसी मीर जाफर को ही नया मसीहा न बनवा दे?


सत्तारूढ़ सरकार को अगर इस नाजुक घड़ी में अपनी छवि की चिंता है तो उसे बिना जामे से बाहर हुए इन तमाम किंवदंतियों से मुक्ति पानी होगी। और अगर विपक्ष अपनी साख की देशभर में बहाली चाहता है, तो उसके लिए भी जरूरी है कि वह मीडिया के विश्वसनीय हिस्से की मदद करे। ताकि ठोस प्रमाणों के साथ सरकार के खिलाफ गंभीर आरोपों को सामने रखा जाए, जैसा अमेरिका और यूरोप में हो रहा है।

दरअसल ऐसे वक्त में राजनीति खुला खेल फर्रुखाबादी टाइप बननी चाहिए। नोटबंदी, जीएसटी से लेकर तालाबंदी और कोविड की मौतों के मसले ने तूल ही इसलिए पकड़ा कि सरकार ने हर कदम पर जरूरत से ज्यादा आक्रामकता दिखाते हुए खुली बहस पर ढक्कन लगाने की कोशिश की। संसद अमक नियम के तहत बहस मांगे तो ढक्कन, टीवी पर बहस हो, तो पार्टी विशेष के प्रवक्ता के साथ बहस को अपनी पार्टी का प्रवक्ता न भेजने का ढक्कन, संसदीय कमेटी की जांच पर हीलाहवाला, दिल्ली के राज्यस्तरीय मसलों पर चुनी हुई विधानसभा के हर फैसले पर ढक्कन। उधर, सर्वोच्च न्यायालय लेफ्टिनेंट गवर्नर को राज्य का प्रमुख घोषित करे तो इस पर सार्वजनिक नाचगाना, लेफ्टिनेंट गवर्नर जम्मू को घाटी के बराबर ले आने की घोषणा करे तो लड्डू बंटाई। सोशल मीडिया न होता तो शायद पता भी न होता कि भारत पर्यावरण और महामारी की समस्याओं पर सर्वाधिक भुखमरी ग्रस्त देशों में आकर सर्वाधिक प्रदूषित राजधानी या मीडिया असुरक्षित देश होने का खिताब पा रहा है।

विपक्षी दल इस समय भी ‘हम इससे गठजोड नहीं करेंगे, हम उससे नहीं करेंगे’ में ही लगे हुए हैं जिससे जनता आजिज है। लिहाजा अब जो हो, बिहार जैसी नूराकुश्ती नहीं, बंगाल जैसा पारदर्शी ‘खेला’ हो।

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