मृणाल पाण्डे का लेख: मोमबत्ती जलाने, ताली और थाली बजाने के बाद डर, बीमारी और बढ़ती मौतों के बीच उत्सव?

कोविड की पहली मार पड़ने पर सर झुका कर लॉकडाउन स्वीकार करने वाली और फिर नेतृत्व के आह्वान पर बाल्कनी से कोरोना भगाने के लिए मोमबत्ती जलाने, ताली और थाली बजाने वाली जनता ने अब तक इसका भी कोई मुखर प्रतिवाद नहीं किया है।

फोटोः IANS
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मृणाल पाण्डे

इन पंक्तियों के लिखे जाने तक भारत ब्राजील को परे ढकेल कर दुनिया में सबसे ज्यादा कोरोना संक्रमित लोगों का देश बन चुका है। इस बीच ज्योतिबा फुले की जयंती (10 अप्रैल) से बाबा साहेब आंबेडकर की जयंती (14 अप्रैल) तक राष्ट्रव्यापी स्तर पर एक भारी ‘टीकाकरण उत्सव’ का भरपूर मीडिया प्रचार के साथ आगाज हुआ। डर, बीमारी और लगातार बढ़ती मौतों के बीच उत्सव? लेकिन कोविड की पहली मार पड़ने पर सर झुका कर लॉकडाउन स्वीकार करने वाली और फिर नेतृत्व के आह्वान पर बाल्कनी से कोरोना भगाने के लिए मोमबत्ती जलाने, ताली और थाली बजाने वाली जनता ने अब तक इसका भी कोई मुखर प्रतिवाद नहीं किया है। मान लिया गया कि मौनं सम्मति लक्षणं।

बारंबार लॉकडाउनों से बिखर गए भारतीय समाज और तरह-तरह के कानूनी दांवपेचों से घिरे मीडिया में खबरों की तादाद भले वही हो, उनपर भरोसा कम हुआ है। मनुष्य की मनुष्य से सामाजिक दूरी बनाए रखना जान बचाने की नई कसौटी बनकर उभरने से जिंदा लोगों का जिंदा लोगों से संवाद टूट चुका है। हर सुबह देश सांस साध कर इंतजार करता है कि आज की विश्वस्त खबर क्या है? वह जाने कब मिले, मिले भी या नहीं? केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि उत्सव के पहले दिन (रविवार होते हुए भी) 27 लाख टीके लगाए गए। लेकिन उसी रविवार को कोरोना इस कदर बेकाबू हुआ कि 24 घंटों में 1.67 लाख नए मामले प्रकाश में आए। 883 मौतों की भी खबर है। अफवाहों, पेड न्यूज, फेक न्यूज, मीडिया प्रचार प्रकोष्ठों का इतना बाजार गरम है कि किसी मित्र से फोन पर बातचीत हो तो सनातन सवाल होता है, भाई क्या खबर है? गृह युद्ध से बिखरते जा रहे महाभारत के वन पर्व में सत्ता से जबरन बेदखल जंगल में छिपे हुए पांडवों के बड़े भाई युधिष्ठिर से यक्ष भी यही अजर-अमर सवाल पूछता है। युधिष्ठिर का जवाब भी उतना ही अजर-अमर है : भूतानि काल: पचतीति वार्ता। इस महामोह भरी कढ़ाई में दिन-रात धूप-ठंड में पक रहे लोगों को मौत खा रही है। कुल मिला कर भरोसेमंद होने की कसौटी पर यही समाचार तब भी सच था, आज भी है। पर सच भी बदलता रहता है क्योंकि राजा ही समय को बनाता है, राजा कालस्य कारणं। लिहाजा टीका उत्सव के दूसरे ही दिन अपने ब्लॉग में प्रधानमंत्रीजी ने इस अभियान को कोरोना के खिलाफ दूसरे महायुद्ध की शुरुआत बताया। ज्ञान के धरातल पर टॉल्सटॉय, रवींद्रनाथ, रायकृष्ण दास और वासुदेव शरण अग्रवाल सरीखे चिंतकों से प्रभावित यह लेखिका कुछ भ्रमित हुई। मनीषियों ने बार-बार कहा है कि दीवाली, होली हों या ईद, बकरीद अथवा क्रिसमस और ईस्टर, भारत में मनाया जाने वाला हर उत्सव आम तौर से सामाजिक खुशी की सामूहिक अभिव्यक्ति से जुड़ता है। जबकि युद्ध एक उन्मादी अवस्था है जिसका अंत हमेशा विनाशकारी होता है, चाहे कोई भी पक्ष जीते। इसलिए शांति और प्रेम के नाश के बाद घृणा से निकली ऊर्जा के विनाशोन्मुख विस्फोट की मनस्थिति से समझदार नेतृत्व देश को यथा संभव बचाते हैं। नफरत और भेदभाव से हिंसा उपजती है, यह हर कोई जानता है। ऐसी कई मौतें चुनावोन्मुख बंगाल में भी हुई हैं। महामारी से भी और पुलिस की गोलियों से भी। कूच बिहार के पोलिंग बूथ में सशस्त्रबलों की गोली से चार लोग मारे गए। केंद्रीय गृहमंत्री का आरोप है कि गलती हथियारबंद सिपाहियों की नहीं बल्कि उन निहत्थे लोगों की थी जिन्होंने सरकारी बलों पर हमला कर दिया। उनका कहना था कि इन मौतों की जिम्मेदार मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हैं। न वह लोगों को हिंसा के लिए भड़कातीं, न सशस्त्र बल गोली चलाते। पर विनाश काल में विपरीत बुद्धि!

जब कोविड की नई मार से कई सूबों, जनपदों में दोबारा तालाबंदी की बात उठ रही है, उसी समय उधर उत्तराखंड में लाखों की भीड़ के साथ कुंभ मेला शुरू हो गया। दूसरे स्नान मौनी अमावस को लाखों लोगों ने प्रधानमंत्री की कोरोना के खिलाफ महायुद्ध से जुड़ी घोषणा के दो जरूरी नियमों : मास्क लगाने और सोशल डिस्टेन्सिंग के पालन, की धज्जियां उड़ा दीं। यह तब, जबकि स्नान की पूर्व संध्या पर कई धर्मशालाएं तथा अखाड़े कोविड से बुरी तरह संक्रमित पाए जा चुके थे। उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश से भी बुरी खबरें आ रही हैं। इनसे छाती ठोक कर पहली तालाबंदी के बीच रामजन्म भूमि का शिलान्यास कर कोरोना से सुरक्षित रहने का उत्तर प्रदेश सरकार का दावा खोखला दिख रहा है। खबर है कि वहां टीके कम पड़ चुके हैं, सघन चिकित्सा कक्षों में तिल धरने की जगह नहीं रही। सबसे दारुण खबर यह, कि भारत का महती टीका निर्माता होने का दावा करने के बावजूद देश के कई राज्यों में, जिनमें दिल्ली भी शामिल है, आज वैक्सीन की घोर किल्लत है। अधिक मार झेल रहे राज्यों में रोगग्रस्त लोगों के लिए प्राणरक्षक ऑक्सीजन, वेंटिलेटर, या रामदेसिविर जैसी दवाएं गायब होती जा रही हैं।

क्या उत्सव अथवा युद्ध की हुंकार भरी घोषणाएं करने से पहले इनके लिए जरूरी दवाओं, चिकित्सा उपकरणों, हस्पताली कर्मियों का आकलन, प्रबंध और प्रबंधन के सुनिश्चित क्रमिक तरीके (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर्स) जमीन पर नहीं उतारे जाने थे? जुलाहे का गुस्सा दाढ़ी पर काहे? भोपाल में एक डॉक्टर ने रोगी की मौत से बौखलाए रिश्तेदारों के हाथों पिटाई के बाद यह कह कर त्यागपत्र दे डाला कि वह इस तरह की जलालत झेलने को डॉक्टर नहीं बने थे। उत्तर प्रदेश से खबर है कि आईसीयू में दो बीमारों के बीच बेड की खींचातानी से एक की मौत हो गई। इन मौतों को किसके खाते में डाला जाए? राजनेता तो तुरत-फुरत गंवार जनता या विपक्ष पर सारा दारोमदार डाल देता है, लेकिन यह संयम मौत की बढ़ती परछाई के साथ बहुत दिन नहीं चलेगा। सड़कों या बूथों पर गंभीर फसाद की स्थिति हो इससे पहले हमारे डंडामार हुक्मरानों को अपना कर्तव्य खुद भी समझना होगा। महामारी कोई हो ऐसी अफरातफरी का वातावरण ऐसे ही नहीं आता। उसके आगाज से काफी पहले विद्वेष, नफरत और अफवाहों से हवा जहरीली बनने लगती है। जनता के बीच, जनता के साथ प्रशासन द्वारा शांत, ठंडे दिमाग से की जा रही तर्कसंगत बातचीत का अकाल पड़ने लगता है। बंगाल को ही लें। चुनावी तारीखों की घोषणा से पहले ही वहां लगातार बढ़ते केंद्रीय बलों की मौजूदगी से लोग असहज थे। चुनाव आयोग की सफाई थी, कि वह चुनाव के दौरान (जो इस बार एक-दो नहीं, 8 चरणों में हो रहे हैं और जिसने तनाव को रबड़ की तरह तान दिया है) अशांति की आशंका के मद्देनजर ऐसा करने को बाध्य हुआ है। यह होना था कि सत्तासीन बंगाल सरकार के कुछ मंत्रियों ने इसे भाजपा द्वारा येन-केन बूथों को घेरने की आशंका जताते हुए अपने लोकल प्रतिनिधियों का बूथों की सुरक्षापर पैनी नजर रखने का आह्वान करना शुरू कर दिया। इस भूसे के ढेर को भाजपा के एक बड़े नेता का कहना कि इस बार दीदी की पुलिस नहीं, चुनाव दादा की पुलिस की निगरानी में होंगे, माचिस की तीली दिखाने जैसा था। हाथियों की इस लड़ाई में हमेशा की तरह उनके पैर तले की घास जैसे लाखों गरीब पिस रहे हैं। और अभी तो नेताओं का ‘खेला’ आधा ही हुआ है।

लगभग यही सिनारियो उत्तराखंड में दोहराया जा रहा है। मुख्यमंत्री जो खुद हाल में कोरोना के संक्रमण से हस्पताल में रह कर बाहर आए हैं, कतई नहीं मानते कि कुंभ मेले की भीड़ जुटा कर आस्था को पर्यटन बनाते हुए भुनाना खतरनाक है। उनको चिंता है कि राज्य में ‘लव जिहाद’ कैसे कम हो। लड़कियां शालीन कपड़े किस तरह पहनने को बाध्य महसूस करें! राजाओं, शीर्ष जनप्रतिनिधियों का मिजाज जरा अलग ही रहता है। उनको एक सिल्वर बुलेट, एक की मियाई गोली चाहिए जिसमें उनको जीवन का लक्ष्य और जनता का मन जीतने का ब्रह्मास्त्र एक साथ मिल जाए! एक राजा ऐसा ही था। उसका आग्रह था कि उसका समय कीमती है। वह घोड़ा लेकर एक पैर रकाब में रखेगा, दूसरा पैर दूसरी रकाब में डालते-डालते उसको जो ज्ञानी ब्रह्मसत्य थमा देगा उसे वह मालामाल कर देगा, वर्ना कोड़े से पीठलाल! कई आए, पिट कर गए। अंत में एक मैला-कुचैला फकीर गुजरा। भीड़ देख कर वह ठहरा, पूछा कि भाई बात क्याहै? फिर सामने आया। देखता क्या है कि राजा घोड़ा चढ़ने को पहला पैर उठा रहा है। फकीर बोल पड़ा, ‘अबे गधे, तेरे राज्य में भीषण महामारी फैली है, और तुझे ब्रह्मज्ञान की पड़ी है?’

बस राजा फिर घोड़ा नहीं दौड़ा सका, नीचे जमीन पर उतर गया। उसे ब्रह्म दिख गया होगा शायद।

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