मृणाल पाण्डे का लेख: होली के बहाने अपने समय पर चर्चा, प्रोपेगैंडा हमारी सबसे बड़ी चुनौती

अर्थव्यवस्था के उदारीकरण, निजीकरण और सामुदायिक खेती-जैसे विषयों में जुमलों को परे कर सोचिए कि क्या इस सब विभेदकारी बहस से हम पहले से बेहतर बनेंगे?

फोटो: सोशल मीडिया
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मृणाल पाण्डे

होली आ रही है। दीवाली और नवरात्रि की ही तरह किसानी के चरमोल्लास से जुड़ा पर्व। इस समय रबी की फसल पकनी शुरू हो जाती है और उसी का किसानी आनंद होली का पर्व बनकर छनता है। वसंत का गुलाबी जाड़े का मौसम इस आनंद के तमाम रंगों और रसों से हर किसी को घर से बाहर खींच कर सराबोर करने को सहज उकसाता है। गौर से देखें, होली के उत्सव की पवित्रता और आनंद लगभग पूरी तरह किसानी और सामूहिकता से ही जुड़े हैं। उत्सव शब्द ‘सवन’ से बना है जिसका अर्थ है छलकना। पूर्णिमा के दिन होली जला कर अगले दिन उत्साह से छलकती सामूहिक धुलैंडी की भूमिका रचना भी चांद की ही तरह जीवन और जीवनदाता फसलों की पूर्णता को दुहराती चलती है। यह अर्थ गांवों से कटते जा रहे हमारे शहर और अर्थशास्त्री ही नहीं, योजनाकार भी भूलते चले गए हैं। और उदारवाद से बाजार माल से पाट दिए गए, फिर भी कीमती ऑर्गेनिक रंगों, तरह-तरह की बंदूक और पिस्तौल के रूपवाली प्लास्टिक की पिचकारियों और दारू की जबरदस्त बिक्री के अलावा वे इस पर्व में कुछ खास नया आनंद नहीं जोड़ पाए। स्टूडियो में लोक संगीत के नाम पर रिकॉर्ड निहायत फूहड़ फिल्मी गीत अलबत्ता अब गांव-जवार से शहर तक पारंपरिक होली गायन की मस्ती एवं खुशी को और भुलवा चुके हैं।

विद्वान डॉ. रामविलास शर्मा के हिसाब से होली शब्द होला (जिसे होरहा यानी हरा चना भी कहते हैं) से निकला है। होला इन दिनों भून भूनकर खाया जाता है। और होली जलते समय इन बालियों को खास तौर से भूनते हुए बड़े-बूढ़े गांव भर की ‘अलाय-बलाय’ आग में जल जाने का नारा भी लगाते हैं। प्रसन्न क्षणों में आग जला कर उसके इर्द-गिर्द जश्न मनाना (कैंप फायर) दुनियाभर के मानव समाजों में आम है। इस तरह के बंधुत्व के साथ ही होली के अलाव (जो शर्माजी के अनुसार, ‘अलाय-बलाय’ को जलाकर राख करने से जुड़ा है) की पूजा और सहभोज में गरीबी, जाड़े और रोग-शोक से एक साथ छुटकारा पाने की इच्छा मौजूद रहती है। पंडित हजारी प्रसाद जी होली का रिश्ता पुराने मदनोत्सव से जोड़ते हैं जो वसंत के बाद महीने भर तक चलता था और होली के पर्वके साथ विसर्जित होता था। यानी अपने पुरखों को संघ की तरह अनुशासित और स्त्री- पुरुष के बीच खुली मस्ती से शून्य हिंदू आर्य बताने वाले भी समझ लें कि इतनी अनार्यता की धार बहाने के मौके पुराने हिंदू भी हाथ से नहीं जाने देते थे। डॉ. मोतीचंद्र की काशी की रसीली होली और उसमें यक्षोंजो आदिदेव शंकर के गण थे, का योगदान गिनाकर बौद्ध, हिंदू, आर्य, अनार्य, गृहस्थ, वेश्या, भड़वे और पंडित सबके साथ-साथ होली गाने और उत्सव मनाने की कई रसीली बानगियां यह प्रमाणित करती हैं कि काशी की मस्ती कितनी पुरानी है।


कुल मिलाकर होली उत्तर भारत के हर राज्य में कबीलों- जातियों की खुली सहभागिता, साथ-साथ आनंद रस में भीगने और भरे बखारों वाले हमारे मिले-जुले समाज की स्मृति से जुड़ी हुई है। इसी स्मृति से श्रुति बनी है जिन्होंने खेतिहर समाज का एक बहुत विशाल, व्यवस्थित और सामुदायिक ढांचा खड़ाकर दिया। यह ढांचा शासन नहीं, पूरी तरह जनसमाज के ही कारण कायम रहता आया है। इस आर्थिक- सामाजिक ढांचे को टोडरमल से बरतानवी सरकार तक किसी ने नहीं छेड़ा। गांधी जी ने भी इसे स्वाधीन भारत की रीढ़ माना। आज जो किसान धरने पर डटे हैं, उसकी मूल वजह यही है कि उनको अपनी रीढ़ के खंडित होने का भय है जिसकी वजह से इस साल होली पर हौल का माहौल छाया हुआ है। होली तो अपनी तिथि पर जलेगी इस बरस भी, पर होली की शुभकामनाएं एक अजीब-सा नकली और राजनीतिक रंग पकड़ रही हैं। जब गले मिलने वाले समाज में प्यासों को कुल-जाति पूछ कर पीने का पानी दिया या नहीं दिया जाने लगा हो और जन्मका प्रमाण पत्र दिखाकर पीढ़ियों से खेतिहर गैर हिंदुओं को भी परदेसी का ठप्पा लगने का डर सताने लगे, तो कैसा फाग, कैसी होली?

अर्थव्यवस्था के उदारीकरण, निजीकरण और सामुदायिक खेती-जैसे विषयों में जुमलों को परे कर सोचिए कि क्या इस सब विभेदकारी बहस से हम पहले से बेहतर बनेंगे? जिस तरह सोचने, योजना बनाने और मीडिया में किस तरह क्या छपे यह तय करने का काम लगातार सरकार अपने हाथ में लेने को तत्पर हो, उस प्रोपेगैंडामय समय में हमारी सबसे बड़ी चुनौती है अपनी निजता और स्वविवेक को बचाए रखने की। नाम, पता, फोननंबर, कुल, बिरादरी, जाति, बसासत ही नहीं, हम क्या पढ़, पहन या खा रहे हैं, इस सबके ब्योरे हम सब आधार और नजाने कितने नए उपकरणों के मार्फत पहले ही सरकार और बाजार को थमा चुके हैं। और इनपर हमारी बजाय डिजिटल बीजाक्षर हमारे हिस्से के फैसले लेने लगे हैं। मोबाइल को चालू करते ही वे हमको याद दिलाते हैं, हमने टैक्स जमा कराया कि नहीं? कोविड एप पर अपना स्वास्थ्य चेक किया कि नहीं? होली पर अमुक-अमुक आकर्षक छूटों के साथ परोसा जा रहा हर तरह का होली का सामान मोलाया कि नहीं? हैप्पी होली कार्ड और ऑर्गेनिक रंग ऑर्डर किए कि नहीं? हम इनमें से अधिकतर फैसलों की प्रक्रिया के पारदर्शी ब्योरे या प्रमाण किससे पाएं?


कभी होली भरोसा बहाली का पर्व था। उसमें साल में कम-से-कम एक बार तो किसानी समाज और शासक वर्ग की खुली सड़क पर बराबरी और भाईचारे की पुष्टि होती थी। खुले में रंग खेलते हुए, फाग गाते, संगीत के साथ गालियां सुनते, गले मिलते और छक कर खाते-पीते हुए शासक दल, लोक गायक और पंडित अपनी-अपनी तरह से आम जनता को कालातीत नियम-विधानों की बाबत आश्वस्त करते चलते थे। इसी वजह से होली का गहरा रिश्ता संगीत से बना भी है: धमार भी, लोकगीत भी। इन गीतों, बंदिशों के छंद भले ही हिंदू देवी-देवताओं पर लिखे गए हों, पर उनको मुसलमानों ने भी रचा और गाया। शासक हिंदू हों या मुसलमान या क्रिस्तान, यह संगीतमय विधि-विधान भारत की सांस्कृतिक एकता को बिना किसी बिलबोर्ड, होर्डिंग या पूरे अखबारी पन्ने पर छपवाए गए एकता और सौहार्द्र के विज्ञापनों के सदियों तक कायम किए रहा। समय-समय पर वर्णों को मिटाने या उनको बेमतलब बनाते रहने वाले होली जैसे पर्व का समाज को प्रेममय और जिंदा दिल रखने के लिए बने रहना जरूरी है। देश के बड़े लोग और शासक वर्ग अगर भेदभाव करने लगें, सचिव वैद्य या गुरु निरक्षर रिश्तेदारों, मित्रों के ऊपर राजकाज छोड़ दें, तो क्या होता है, इसकी खुली बानगी होली के गीतों, जोगीड़ों में मिलती है जहां पाखंडियों को साफ शब्दों में खरी-खोटी सुनाई जाती है।

इस खुली सामाजिकता और भेदभाव विहीन मिलन के अलावा हम और क्या-क्या खो रहे हैं, यह जानना जरूरी है। 21वीं सदी ही तो सभ्यता का अंतिम पड़ाव नहीं, 22वीं सदी भी होगी इसके बाद। इसलिए जमीन की आहट सुनते आए किसान जो कहने की कोशिश इतने दिनों से कर रहे हैं, उसे आदर तथा धीरज से सुना जाना चाहिए। वे कह रहे हैं कि बराये मेहरबानी विकास के सारे माध्यमों का ताबड़तोड़ निजीकरण मत कीजिए। खदानें, खेत, जंगल, जल स्रोत वैसे भी कम हो रहे हैं। अब विकास की गतितेज करने के लिए उनको एक वर्ग विशेष खरीद-बेच ले, सारे सार्वजनिक उपक्रम निजी हाथों को सौंप दिए जाएं, हर राज्य अपनी 75 फीसदी नौकरियां सिर्फ अपने धरतीपुत्रों (शायद कभी-कभार पुत्रियों) के लिए आरक्षित बना दे, ऐसी भी क्या हाय-तौबा है?

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