मृणाल पाण्डे का लेख: कश्मीर से हिमाचल तक त्राहि-त्राहि, ग्लोबल वार्मिंग का असर

जड़ों से कटकर जिस विकास का खाका बनाया गया, उसके नतीजे अब ग्लोबल वार्मिंग के रूप में कश्मीर से हिमाचल तक त्राहि-त्राहि मचाए हुए हैं। दक्षिण बाढ़ में डूब रहा है, उत्तर के पहाड़ दरक रहे हैं और फसलें खुले में सड़ रही हैं। ज्यादा बता रही हैं मृणाल पाण्डे।

फोटो: नवजीवन
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मृणाल पाण्डे

बीते सप्ताह कई महीनों से लगातार ऊंचाइयां छूता रहा भारतीय शेयर बाजार यकायक औंधे मुंह जा गिरा। रातोंरात अमीर निवेशकों को करोड़ों का घाटा हुआ। गुलाबी अखबार वजह बता रहे हैं कि यह सरकार द्वारा कृषि कानून वापस लेने का नतीजा है। कृषि कानून लागू होते तो बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों को फटाफट लघु किसानों की जमीनें और अनाज मंडियों पर प्रभुसत्ता मिल जानी थीं। अब वे धीमे-धीमे यह भांप रही हैं कि जब तक भारत एक चुनावी लोकतंत्र है, तब तक उनके प्रति बेहद सदय सरकार भी वोट बैंक को खोने का जोखिम नहीं उठाएगी। लिहाजा, वे मार्केट निवेश से हिचकिचा रहे हैं। जब पार्टी के सर्वेक्षकों ने सरकारी कानों में पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में किसानी वोट खोने की आशंका जताई, तो सरकार सोच में पड़ गई। और आखिरकार कभी आंदोलनजीवियों को सुई की नोक बराबर भी जमीन न देने की धमक भरी गर्जना करती रही सरकार ने अचानक टीवी पर दर्शन देकर हाथ जोड़कर किसान भाइयों से माफी मांगी और बिना उनको भरोसे में लिए बनाए गए तीनों कानूनों को वापस ले लिया।

ईमानदारी से पूछें कि किसानी की ऐसी दुर्गति क्यों हुई कि एक साल से भी अधिक समय से उत्तर भारत के किसान तमाम सरकारी धमकियों के बाद भी खुले में धरना दिए बैठे हैं? सारे देश में कृषि धंधे के लगातार चौपट होते जाने की असली जड़ें कहां पर हैं? जड़ों की तरफ पूरी ईमानदारी से देखते हुए हमको अपनी जड़ता का बोध होता है। हरित क्रांति और श्वेत क्रांति के बाद एक लंबे समय तक हमारे कृषि- पशुपालन प्रधान देश को बोध हुआ कि वे डैने पसारे गगन मंडल में तैर रहे हैं। उदारीकरण ने तरह-तरह की तकनीकी लाकर खेती को नई रंगत दी और शहरों में गांवों से जा बसा वर्ग भी मध्य वर्ग की तरफ उठता हुआ दिखने लगा। बड़ा ही सुहाना समां था वह। पर जैसा कि संत कवियों ने कहा है, गगन मंडल में गौ ब्याई तो क्या? दही तो भूमि पर ही जमाया जाता है। और अंत में उस दही का मक्खन तो संत जन खा जाते हैं, शेष लोगों को मिलती है बस छाछ!


जड़ों से कट कर जिस विकास का खाका बनाया गया, उसके नतीजे अब ग्लोबल वार्मिंग के रूप में कश्मीर से हिमाचल तक त्राहि-त्राहि मचाए हुए हैं। दक्षिण भारत बाढ़ में डूब रहा है, उत्तर के पहाड़ दरक रहे हैं और बोई फसलें, ताजी कटी फसलें खुले में सड़ रही हैं। और गोवध बंदी के कानून को बजरंगियों ने जिस तरह व्याख्यायित किया, उससे पशुपालन का जो कुदरती चक्र था, बुरी तरह गड़बड़ा गया है। नतीजतन शहरगांव हर कहीं भुखमरी बढ़ती जा रही है और मंहगाई भी। हम ही नहीं, अंतरिक्ष में लगातार तस्वीरें खींच कर भेज रहे अमेरिकी टोही कैमरे सारी दुनिया में जंगल कटने से बना कार्बन उत्सर्जन और जहरीले केमिकल्स के नदियों, जलस्रोतों को तबाह करने और समुद्र जल के गरम होने से चक्रवाती तूफानों में बहुत बढ़ोतरी के अकाट्य प्रमाण भेज रहे हैं। हमको तब नजला होता है जब अमेरिका छींकता है। लिहाजा, कॉप्स की बैठक में बड़े हो-हल्ले से पर्यावरण पर विश्वस्तरीय समन्वित कदम उठाने पर बहस हुई। भारत के मीडिया ने यकीन दिलाया कि भारत का एक विश्व, एक पर्यावरण नारा डूबती धरती को वराहावतार की तरह पृथ्वी को बचा लेगा। लेकिन इस पर दुनिया का एकमत होना अभी भी असंभव बना हुआ है।

दुनिया के दो सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक देश हैं अमेरिका और चीन। इनमें से चीन के राष्ट्र प्रमुख तो आए ही नहीं, और अमेरिकी राष्ट्रपति ने कार्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण की जरूरत पर पूरी सहमति जताते हुए भी कोयला तथा जैविक तेल-जैसे प्रदूषक उर्जा स्रोत दुहने पर रोक लगाने पर सहमति नहीं दी तो नहीं दी, इतना भर कहा कि इसमें क्रमश: कमी लाई जाएगी। कल्लो बात! इसके बाद आए दूसरे बड़े देश जिनमें रूस, भारत और ऑस्ट्रेलिया भी हैं। तीनों ने सर्दी के दौरान घरों को गर्म रखने की जरूरत और आर्थिक विवशता की दुहाई देते हुए कोयला खनन पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। उनके सहचर यूरोप ने भी तीस जैव गैस परियोजनाओं को हरी झंडी दिखा कर ऊर्जा मुद्दे पर अपनी नीति-रीति साफ कर दी है। रहे अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के छोटे देश तो उनकी हालत इतनी खस्ता और विश्व बिरादरी में उनकी आवाज इतनी क्षीण है कि वे कुछ कहें भी तो सुनने वाला शायद ही कोई हो। जाहिर है, कार्बन उत्सर्जन बड़े पैमाने पर जल्द-से-जल्द रोकना जितना माना जाता रहा, उससे कहीं कठिन साबित हो रहा है। और वैज्ञानिकों के अनुसार, अगर कार्बन उत्सर्जन के मौजूदा स्तर में कटौती नहीं लागू हुई तो 2030 के बाद दुनिया का अस्तित्व खतरे में है।


खुद को ग्लोबल गांव बताने वाली दुनिया को इस बिंदु पर सबसे बड़ी जरूरत है एक सर्वसम्मति से गठित विश्वस्तरीय नियामक संस्था की जिसके आदेश मानने को सभी देश विवश हों। पर उपरोक्त उदाहरणों से जाहिर है कि यह न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी वाली बात है। पिछले सात सालों में लगातार धनाढ्य वर्ग को वरीयता देने वाले और राष्ट्रवाद की ओट में जंगल, जल और जमीन पर प्रदूषण फैलाने वाले विकास के मॉडल ने भारत में बहुत चमत्कार दिखाए हैं। करोड़ों हाथों में स्मार्टफोन आ गए हैं, पर किसानों-मजदूरों ही नहीं, आजाद मीडिया से भी (इस कोटि में गोदी मीडिया को सत्तासीन सरकार का ही विस्तार मानें) सरकार का संवाद टूटता गया है। डिजिटल अर्थजगत का नेटवर्क उत्तर भारत से लाखों बेरोजगारों को दक्षिण धकेल रहा है जहां से क्षेत्रीय राजनीति, बाढ़ और कोविड उनको फिर वापस धकेल रहे हैं। इस बीच जमीन पर सदियों से अन्न उपजाने वाले अनगिनत लोगों की पहले से ही बाढ़-सुखाढ़ और खाद-बिजली की बढ़ती कीमतों के संकट झेलती आजीविका को नए कानूनों की बहस से बाहर रख कर दरवाजों पर ताले और सड़कों पर कीलें एवं कांटेदार तार लगा दिए गए। नर बलि की प्रथा मिट गई लेकिन विकास के नाम पर कृषक बिरादरी से अपनी जमीन, आदिवासियों से जंगलों और अल्पसंख्यकों एवं दलितों से बूचड़खानों की कुरबानी देने का आग्रह उसी प्रथा को क्या नए-नए रूप में वापस नहीं ला रहा है?

विडंबना यह कि आज एक आबादी तो अपनी जड़ों से कटकर शहरों की तरफ भागने को विवश है, दूसरी तरफ अमीर बिरादरी भी एकलखोर अमीरी का बोझ ढोते हुए लड़खड़ा रही है। कोई सपरिवार देश छोड़कर परदेस भाग रहे हैं, कोई साधु-संतों के शिविर में जा रहे हैं ताकि योग ध्यान से अपना बिगड़ा मानसिक संतुलन सही कर लें। उधर सामाजिक उत्तदायित्वहीन बना दी गई उनकी अगली पीढ़ी सामने कोई नैतिक लक्ष्य न होने से तरह-तरह के नशे या मानसिक तनाव और दिशाहीन अय्याशी से तबाह हो रही है। ऐसी अफरातफरी के बीच हमारा समाज अपनी जड़ें कब खोज सकेगा और कैसे? फिलहाल यह सवाल हमारे लिए नई टूरिज्म विकास योजनाओं के शिलान्यासों, जय जवान, जय जनजाति हीरो किस्म के जगर-मगर अभिनंदन समारोहों या धार्मिक यात्रा के लिए ट्रेन के वेटरों को भगवा मास्क और दस्ताने पहनाने से अधिक महत्वपूर्ण होना चाहिए। क्योंकि बात सिर्फ जड़ों ही नहीं, शाखाओं, नव पल्लवों और इतराती फुनगियों पर भी ईमानदार सोच व्यक्त करने की है। यह काम एकल निजी स्तर पर नहीं, समन्वित तरीके से होना चाहिए। किसानों के आंदोलन ने भली तरह समझा दिया है। जड़ों की तलाश सिर्फ निजी हित स्वार्थों के तहत करने वाली राजनीति अपनी ही जड़ों, अपनी ही शाखाओं पर कुल्हाड़ी मारती है, यह सत्य दुनियादारी की बहुत कम समझ रखने वालों को भी दिखने लगा है।

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