मृणाल पाण्डे का लेख: कश्मीरी नेताओं के साथ पीएम मोदी की बैठक, विधानसभा चुनाव और परिसीमन की प्रक्रिया

2019 से बंगाल चुनावों तक कश्मीर मसले पर चुनावी सभाओं जो तल्ख बयानी सत्तारूढ़ सरकार के नेताओं ने की और जिस तरह सरकार के कुछ वरिष्ठ नेता कश्मीरी नेताओं के गुपकर एलायंस को ‘गुपकर गैंग’ कह कर उनका सार्वजनिक उपहास करते रहे थे, वह सिलसिला कुछ तो टूटा है ही।

फोटो: सोशल मीडिया
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मृणाल पाण्डे

यह बात ध्यान देने की है कि जब से अमेरिका ने अपनी सारी सेना अफगानिस्तान से हटाने का ऐलान किया है, वहां कट्टरपंथी तालिबान तथा पाकिस्तान में उसके चंपू तहरीक- ए-तालिबान की सेहत सुधरने लगी है। यूं तो अफगान सरकार और तालिबान को बातचीत के लिए राजी करने में पाकिस्तान ने बिचौलिए की भूमिका भी निभाई है। फिर भी 20 बरस बाद उसके लिए इलाके से अमेरिकी सेना का हटने का मतलब है शरणार्थियों के रेलों का उमड़ पड़ना और कट्टरपंथी तहरीक-ए-तालिबान की ताकत में इजाफा। यह गहरी चिंता का सबब इसलिए है कि उसने लगभग ऐसी ही स्थिति सोवियत सेनाओं की वापसी के समय झेली है। भले ही बाहरखाने पाक-तालिबान रिश्ते ठीक दिखते हों, लेकिन भीतरखाने वह तालिबान के हाथों संपूर्ण सत्ता जाने का विरोधी और वहां कई समूहों के गठजोड़ की सरकार का हिमायती है। हमारे लिए खैबर पार इलाका चिंता का विषय इसलिए है कि तालिबान शासित होने पर भारत से अफगानिस्तान के रिश्ते बिगड़ेंगे और कश्मीर में घुसपैठ को फिर शह मिलने लगेगी। इसलिए पाकिस्तान की संभावित फजीहत पर खुश होना नादानी होगी।

कोविड से उबरती दुनिया में यूरेशिया से अमेरिका तक विश्व राजनय की बिसात पर महामारी के दौरान, या उसकी वजह से चीन की बेपनाह आर्थिक-सामरिक ताकत छुप नहीं सकती। इससे सारे पश्चिमी धड़े में ही नहीं बल्कि अमेरिका, भारतीय उपमहाद्वीप, ऑस्ट्रेलिया और कोरिया में भी गठजोड़ की शक्ल तथा राजनय के समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। कोविड पूर्व का, ‘नाच नाच प्रभु रसिक रिझाऊं’, झूलो नंदलाल टाइप भक्तिकाल नए राजनय से विदा हो गया। हर देश को अब समय रहते शत्रु और मित्र की पहचान दोबारा बनाकर अपने राजनय को स्वहित में जरूरी मोड़ देना होगा। पाकिस्तान के चीन से रिश्ते इधर गहराए हैं, यह बात जगजाहिर है। और हमारे खिलाफ वही चालाक पड़ोसी गलवान घाटी में अपना संयमित विनम्र मुखौटा पहले ही एक झटके से उतार चुका है। इसलिए भारत की अमेरिका से निकटता हमारी जरूरत है। पर आम चुनाव में अमेरिका में सत्ता हस्तांतरण के बाद मित्र ट्रंप की जगह जो बाइडन राष्ट्रपति बने हैं। उनकी प्राथमिकता इलाके में खुद के लिए पायेदार जमीन बनाना और अपनी सेना बिना भारी क्षति के हटाना है। भारत और पाक को साफ राजनयिक संकेत मिलते भी रहे हैं कि अमेरिकियों की सुरक्षित घर वापसी की एवज में अमेरिका को अफगानिस्तान में तालिबान नामक रावण के घर पानी भरना भी स्वीकार है। और चूंकि कश्मीर मसले पर तालिबान भारत से नाखुश है और पाक ने तालिबान-अमेरिकी वार्ता में मध्यस्थता की है, तय है कि अमेरिका हमेशा की तरह लाख पाकिस्तान से नाराज हो, वह भारत से चाहेगा कि हर कीमत पर भारत सीमा रेखा को कश्मीर की वजह से एक बार सुलगने से बचाया जाए। गुपकर गठजोड़ से दिल्ली की बातचीत का यह एक कारक तथ्य तो था ही।


संशय नहीं कि अगर 5 अगस्त, 2019 को अनुच्छेद 370 खारिज कर और तमाम दलों के बड़े नेताओं की गिरफ्तारी से भिड़ का छत्ता न छेड़ा गया होता तो अंकल सैम बराक ओबामा काल की तरह चालू नसीहतें (पाक को कश्मीरी अलगाववादियों को शह न देने और भारत को घाटी में इस या उस किसी भी कश्मीरी गुट को पुचकार कर या नए तोहफों से संतुष्ट रखकर राज्य सरकार चलाने और पाक के साथ नियंत्रण रेखा पर यथा संभव शांति बनाए रखने की) देकर दही बताशा चाट कर वापिस चले गए होते। लेकिन आज अमेरिकी राजनय में महामारी के असर, कट्टरपंथी गुटों के 9/11 जैसे हमलों और चीन का खौफ है। पुतिन ने भी चीन से सकारात्मक तालमेल की तरफ कदम बढ़ाने के संकेत दिए हैं। ऐसे समय में अमेरिका को यह इलाका कश्मीर के प्रज्जवलनशील मुद्दे के चारों तरफ घी का लोटा लिए बैठे चीन, रूस, तालिबान तथा तालिबान से दब रही पाक सरकार के बीच छोड़कर जाना अपने नए राजनय की बिसात पर भारी खतरा प्रतीत हो रहा है।

वैसे इसी बहा ने सही, अगर भारत और पाक तल्खी छोड़कर एक बार फिर से सभ्य पड़ोसी बनें और दिल्ली कश्मीरी नेतृत्व से बातचीत का सिलसिला शुरू कर राज्य में लोकतांत्रिक चुनाव करा दे। फिर अनिर्वाचित उपराज्यपाल की बजाय चुनी गई एक राज्य सरकार को कमान मिल जाए यह किसी के लिए बुरा न होगा, इसलिए 24 जून को प्रधानमंत्री द्वारा कश्मीर की प्रमुख पार्टियों के गुपकर एलायंस को अपने कुछ वरिष्ठ सहयोगियों के साथ बातचीत को न्योतना स्वागत योग्य है। 5 अगस्त, 2019 के बाद (जब से अनुच्छेद 370 हटाया गया और कश्मीर की स्वायत्तता खत्म हुई) जो भीषण गुस्से की असहज स्थिति त्रिखंडित कश्मीर के गिरफ्तारी झेल रहे बड़े नेताओं तथा दिल्ली के बीच बन गई थी, 2019 से बंगाल चुनावों तक कश्मीर मसले पर चुनावी सभाओं जो तल्ख बयानी सत्तारूढ़ सरकार के नेताओं ने की और जिस तरह सरकार के कुछ वरिष्ठ नेता कश्मीरी नेताओं के गुपकर एलायंस को ‘गुपकर गैंग’ कह कर उनका सार्वजनिक उपहास करते रहे थे, वह सिलसिला कुछ तो टूटा है ही। दिल्ली के जिद्दी एक पक्षीय फैसले लेने वाले तेवर नरम पड़ने का संकेत भी यह बैठक है ही। दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि बैठक में यह एक तरह से मान लिया गया कि 5 अगस्त, 2019 से पहले की स्थिति की यथावत बहाली नहीं हो सकती। यह भी मानना व्यावहारिक था कि ‘नया कश्मीर’ जम्मू और घाटी को मिला कर बनेगा पर लद्दाख केंद्र शासित बना रहेगा। पर फिर भी दो सवाल कायम रहे जिनको इस बैठक ने पुरजोर तरीके से उठाया। पहला, विधानसभा चुनाव कश्मीर के दोनों अंगों को विलय करके उसे राज्य का दर्जा दिए जाने से पहले हों या कि टुकड़ों में? दूसरा, कि परिसीमन की प्रक्रिया राज्य में नई सरकार बन जाने के बाद हो या पहले?


इस बैठक के दौरान सर्वसम्मति से इस बाबत कोई दो टूक फैसले तो नहीं हुए। अगर कोई बड़ी उपलब्धि थी तो यह कि अपना मान त्याग कर दिल्ली कश्मीरी नेताओं के साथ आमने-सामने बैठी और साढ़े तीन घंटे तक उनके बीच बतकही चली। इसे जो लोग दिल्ली द्वारा अमेरिकी दबाव से अपना अभिमान निगल कर यू टर्न लेना बता रहे हैं, उनके कथन की सचाई तो समय ही बताएगा। जहां तक परिसीमन की बात है तो वह काम सरकार या संसद नहीं, स्वायत्त आयोग ही करेगा। यह भी हो सकता है सुप्रीम कोर्टअनुच्छेद 370 के विचाराधीन मुद्दे पर कोई ऐसा फैसला दे दे, जो दिल्ली के लिए इस स्थिति से उबरने की सम्मानजनक राह बनाए। पर दोनों बातें अभी भविष्य के गर्भ में हैं। इस थोड़ी सी बची समय सीमा के बीच तनिक ठंडे दिमाग से सोचने की सबसे बड़ी बात यह है, कि जिस समन्वयवादी सह अस्तित्व की बुनियाद पर 70 सालों से हमारा संविधान और उसकी छतरी तले यह निरंतर बनता लोकतंत्र खड़ा रहा है, क्या आज भारी बदलावों से गुजर रही दुनिया में उसे सेंट्रल विस्टा की तरह ढहाकर उसकी जगह क्या एक नया लोकतांत्रिक कश्मीर खड़ा करना संभव होगा?

दोनों पक्षों के लिए अब मानाभिमान त्याग कर यह स्वीकार करने का समय आ गया है कि पहले चुनाव फिर परिसीमन वाली जिद छोड़ी जाए। परिसीमन के मुद्दे को चुनाव के बाद तक के लिए बर्नर पर रख कर बातचीत को ईमानदारी से आगे जारी रखा जाए, तो कोई आफत नहीं टूट पड़ेगी। अगर घर के किसी सदस्य को इमर्जेंसी में हस्पताल ले जाना हो तो उसे किस रंग की शर्ट पहना कर एंबुलेंस में लिटाया जाए यह क्या बहस का मसला है? आप पहले उसे समय पर अस्पताल पहुंचा कर उसकी जान बचाइए। जब वह ठीक हो जाए तब वह खुद तय कर लेगा कि उसे कब किस रंग के कपड़े पहनकर किधर जाना है।

परिसीमन जनगणना डेटा पर गहन विचार से धीमे-धीमे पकने वाली प्रक्रिया है, जबकि चुनाव एक साफ तौर से समयबद्ध कवायद है। एक ईमानदार संघीय लोकतंत्र में हर राज्य आखिरकार समयबद्ध चुनावों में जनभागीदारी और अपने नागरिकों की मर्जी से ही अखंड रखा जा सकता है। कर्फ्यू, डंडे और पुलिसिया बलों की मदद से नहीं। संपूर्ण विलय से कश्मीर में बगावत होती हो और आंशिक रियायतों से उसे अभी भी दिल्ली और दिलों के बीच दूरी कम होने का प्रमाण दिया जा सकता हो तभी भरोसा बहाली की शुरुआत हो पाएगी, यह कौन समझदार प्रधानमंत्री नहीं जानता? अटल जी ने इंसानियत के दायरे में बातचीत का जो प्रस्ताव रखा था, वह उनकी निजी इच्छा जो भी रही हो, इसी समझदारी का नमूना था।

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