मृणाल पाण्डे का लेख: एक शह्र आशोब दिल्ली पर

नए साल की शुरुआत में गणतंत्र में गण, यानी भारत का जनता जनार्दन जिसके मतदान से सरकारें दिल्ली में सिंहासन पाती और खोती हैं, ओमिक्रॉन के हमले और दोबारा तालाबंदी के खौफ से हैरान-परेशान है। पढ़ें मृणाल पाण्डे का लेख।

फोटो: सोशल मीडिया
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मृणाल पाण्डे

आम तौर पर कवियों की बाबत लोगों में यह धारणा होती है कि वे दुनिया की धकापेल और नून, तेल, लकड़ी की चिंताओं, मेलों-ठेलों के शोरगुल से परे किसी सतरंगे बुलबुले में बैठ कर कविताई करते हैं। दुनिया में रहते भी हैं, तो एकांतवासी बन कर। लेकिन ऐसे कवियों से कहीं बड़ी तादाद उन महान जनकवियों की है जिनकी रचनाओं में हमें उनके समय के जीवन की तमाम हलचलें, रंगारंगी, भीड़भाड़ और दुनियावी रिश्तों की पेचीदगियां आज भी साफ तौर पर दिखाई देती हैं। आगरे के जनकवि नज़ीर अकबराबादी उनमें से ही एक थे। बला के हंसमुख, अपनी कविता में एक अजीब बांकपन लिए हुए शंख और अजान- दोनों से महुब्बत करनेवाले। मच्छर, खटमल, रीछ, मदारी, फकीर, तरबूज, ककड़ी, कृष्ण जी की बांसुरी और अनगिनत व्यवसाय इनसे भरी-भराई सदाबहार दुनिया जिसमें राजनीति की जमीन बड़ी तेजी से टूट रही थी, आफत की घड़ियों में भी उनसे हंसती-बोलती, उनके कंधों पर सर रख कर रोती थी। और नज़ीर भी अपनी कविता में उससे हंसते-बोलते और तकलीफ की घड़ियों में उसके साथ विलाप करते सिसकते थे। ‘‘अच्छे भी आदमी ही कहाते हैं ए नज़ीर, औ सबमें बुरा जो है सो भी है आदमी।’’

माना जाता है कि नज़ीर 1735 में आगरे में जो तब अकबराबाद कहलाता था, पैदा हुए और आगरे में ही उन्होंने ने अच्छे शिक्षकों और आचार्यों से तालीम पाई। फिर वे ननिहाल दिल्ली चले आए जहां दिल्ली दरबार ढह रहा था। 1757 में अहमद शाह अब्दाली के हमले की अफरातफरी के बीच वे दिल्ली से दोबारा आगरे वापिस लौटे। उस समय का सारा उत्तर भारत गहरे आलोडन का वैसे ही शिकार था, जैसा आज है। दिल्ली की किल्ली ढिल्ली होती देख जाट, रुहेलों, मराठों के लुटेरे जत्थों की बन आई थी। नज़ीर के जमाने में उस भावना का कम विकास हुआ था जिसे आज देशभक्ति कह कर जबरन बेचा जा रहा है। फिर भी एक गहरा भीतरी भाईचारा था जिसकी वजह से दिल्ली या आगरे जैसे शहर जब दुर्दशा और लूटपाट के शिकार होते, तो बिना बादशाही हुक्मनामों या मीडिया की सुर्खियों की शक्ल लिए भी वह सारे मुल्क और तमाम हिंदुस्तानियों की बरबादी का सबूत मान कर उस पर साहित्य में गहरा शोक जताया जाता था। बड़े कवियों की ऐसी जनमुखी कविताओं का शीर्षक होता था, ‘शह्र आशोब’, यानी शहर में भीषण अफरातफरी और आम नागरिकों के लुटने, और भीषण बेरोजगारी की मार पर गहरा शोक व्यक्त करना।


राजधानी दिल्ली की दशा देख कर आज नज़ीर बहुत याद आते हैं। वैसे तो देश की तमाम महानगरियां कोविड, नोटबंदी और तालाबंदी से लस्त पड़ी हैं। पर यह मंजर दिल्ली में जो कभी एक सफल धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र का एशिया में भव्य प्रतीक मानी जाती थी, दिखना दहशत पैदा करता है। गत फरवरी में टीवी पर नए राजपथ पर सनातनी रूढ़िपरक तामझाम सहित काबीना मंत्री हरदीप पुरी ने भूमि पूजन किया जिसकी छवियों का सारे देश में प्रचार इस धारणा को पुष्ट करता था कि धर्मनिरपेक्ष भारत अब धर्म विशेष सापेक्ष बनता जा रहा है। बताया गया था कि सरकार बहुत तेजी से राष्ट्रपति भवन से विजय चौक तथा उसके अगल-बगल फैले हरे-भरे मैदानों वाली लुटियन निर्मित दिल्ली की किल्ली उखाड़ कर उसे सिरे से नई तरह बनाएगी। और भारत 2022 में अपनी आजादी का अमृतमहोत्सव पारंपरिक गणतंत्र दिवस की परेड के बीच मोदी युग की नई दिल्ली के नए राजपथ पर मनाएगा। इन पंक्तियों के लिखे जाते समय गणतंत्र दिवस समारोह की भव्य परेड और जश्न को कुल दो-तीन ही सप्ताह बचे हैं लेकिन लगता नहीं कि यह घोषणा साकार हो सकेगी। गण का राजपथ जहां परेड होती आई है, यहां से वहां तक खुदा और भीमाकार जेसीबी मशीनों से भरा हुआ है। लिहाजा गणतंत्र दिवस की सलामी वे नए भव्य राजपथ पर लेंगे, इसकी शायद शिखर नेतृत्व को भी उम्मीद नहीं, हालांकि बतर्जसिल्वानिया लक्ष्मण के विज्ञापन वंशवाद और उपनिवेशवादी मानसिकता से बनाई गई दिल्ली के पुराने सरकारी राजपथ और संसद भवन समेत लुटियन के बनाए विशिष्ट इलाके की धजा सिरे से बदल डालने का ऐलान बहुत किया गया।

नए साल की शुरुआत में गणतंत्र में गण, यानी भारत का जनता जनार्दन जिसके मतदान से सरकारें दिल्ली में सिंहासन पाती और खोती हैं, ओमिक्रॉन के हमले और दोबारा तालाबंदी के खौफ से हैरान-परेशान है। महारोग की नई प्रकार के संक्रमण दर चक्रवृद्धि ब्याज की रफ्तार से बढ़ रही है और इन पंक्तियों के लिखे जाने तक तंत्र भी उससे घबराया नजर आ रहा है। फिर भी जमीन की बात करें तो सारे बड़े नेता आसन्न चुनावों की रैलियों और चुनावी जोड़तोड़ में उत्तराखंड से पूर्वोत्तर तक सबसे अधिक यूपी के लगातार दौरों और शिलान्यासों में बेहद व्यस्त हैं। यह उस समय जबकि देश ओमिक्रॉन को लेकर बेहद चितिंत है। बचे-खुचे नेताओं तथा बड़े बाबुओं के बीच राजधानी में लगा रात का कर्फ्यू और भी सख्त सघन बनाए जाने पर विचार हो रहा है ताकि कोविड-2 हादसों की पुनरावृत्ति न हो। फिर भी अनुभवी डॉक्टर बता रहे हैं कि बड़े सरकारी हस्पताल निबटने को तैयार तो हैं, पर हर कहीं प्रशिक्षित स्टाफ की कमी है। सरकारी (सीएमआई) रपट के अनुसार, अप्रैल, 2020 में बेरोजगारी का प्रतिशत जो 27.3 पर था, आज 45.6 हो चुका है। डर और गरीबी के बीच अपराध भी बढ़ रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध निरीक्षण प्रकोष्ठ के अनुसार, फरवरी, 2020 के दंगों के बाद से दिल्ली में देश की 19 महानगरियों में हत्या, किडनैपिंग तथा रेप के अपराध के सर्वाधिक मामले दर्ज किए गए। नज़ीर के आगरे के शह्र आशोब की पंक्तियां: ‘दीवारो दर के बीच समाई है मुफलिसी, हर घर में इस तरह फिर से आई है मफुलिसी, पानी का टूट जावे है जूं एक बार बंद।’ आज की दिल्ली पर भी काफी फिट बैठ रही हैं। भगवान भला करे।


तंत्र पर और विचार कीजिए तो दिखेगा कि वह इस सब के अलावा ग्लोबल वार्मिंग और कोविड के नित नए संस्करणों के अलावा चीन से सीमा पर घुसपैठ की बढ़ती आहटों से भी भीतरखाने चिंतातर है। बजट भी सर पर है और इस बार सरकार परस्त अर्थशास्त्री भी 2022 में जमा खर्च को लेकर सरकार को अहतियात बरतने की सलाह दे रहे हैं। उनकी राय में, दुनियाभर में मुद्रास्फीति अभी और बढ़ सकती है, चीन की बहुत बड़ी रियल एस्टेट कंपनी लड़खड़ा रही है जिसका असर सारी दुनिया भोगेगी। और घरेलू स्तर पर दिल्ली दंगों के बाद से भारत की छवि विदेशी मीडिया में एक अशांत अनारक्षित देश की बन चली है जहां अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं। ऐसी अशांति के बीच खुद भी खस्ताहाल विदेशी पूंजी निवेश किसी बड़ी तादाद में आने से रहा। सो साहिबान अपनी- अपनी कमरपेटी में दो-तीन सूराख और कर आनेवाली तंगी की तैयारी का जायजा लीजिए। वैसे, हमारी वीर वित्त मंत्राणी ‘अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां’ की अभय मुद्रा में हैं लेकिन जिस शेयर मार्केट उछाल और विदेशी मुद्रा के अक्षय कोष की बात हो रही है, वह बाजारों की सहज उठान से नहीं बने। लगातार बढ़ाए गए कराधान और कोविडकाल में बाजार-व्यापार बंद होने की वजह से कुछ समय के लिए यह मंजर बना, पर कोविड की नई मार से बाजार फिर घबराए हुए हैं और शेयर बाजार नित गोते खा रहा है। नई पहलों में क्रिप्टो करंसी जैसी नई मुद्रा को लेकर सरकार अभी भी ठिठकी हुई है। आज की दुनिया कोविड के बाद अधिक ई-निर्भर, अधिक ई-मुद्रामुखी और भिन्न किस्म के खनिजों और ऊर्जा स्रोतों की तरफ मुड़ने लगी है। बहरहाल कोयला, लोहा, कॉटन या कपड़ा उद्योग से होती आई पारंपरिक कमाई का कुछ भी हिस्सा तयशुदा तौर से स्थायी या अक्षय नहीं है। अनचुकाए लोन से कमजोर हो गए सार्वजनिक बैंक निजी हाथों में बिकने और यात्री वाहक रेलवई घाटे में होने की भी खबरें हैं। एयर इंडिया का भी हस्तांतरण होने से पहले सुब्रह्मण्यम स्वामी बिक्री मामले को अदालत में ले जा रहे हैं।

स्वास्थ्यतंत्र के शीर्ष संस्थान नीति आयोग की 2019-20 के लिए जारी रपट में देश में पारिवारिक और सामुदायिक स्वास्थ्य के राज्यवार आंकड़े दिखा रहे हैं कि केरल जैसा नन्हा राज्य जिसने कोविड के साथ भीषण बाढ़ का कहर भी झेला, शीर्ष पर है जबकि दमदार विकास का दावा करनेवाला केन्द्र का लाडला और विशाल जनसंकुल राज्य यूपी जहां कांटे के विधानसभा चुनाव होने हैं, स्वास्थ्य कल्याण की तालिका में लगभग सबसे नीचे है। आयोग की तरफ से कई तरह के द्रविड प्राणायाम करते हुए कहा जा रहा है कि राज्यों का आकार देखते हुए अगर अल्पकालिक विकास के पैमाने से नापो तो गिलास आधा भरा दिखता है। लेकिन प्रत्यक्षंकिं प्रमाणं? गंगा में बहती कोविड के शिकारों की लाशें और रेत में गाड़े गए शवों की छवियां जनमानस से उतरी नहीं हैं। नज़ीर के शब्दों में: ‘देखे कोई चमन तो पड़ा है उजाड़ सा, गुंचा, न फल, न फूल, न सब्जा (हरियाली) हरा-भरा।’

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