मृणाल पाण्डे का लेख: वैवाहिक उम्र में समता का मिथक

जो विधेयक कल्पना में अग्रगामी होते हुए भी महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक यथार्थ से मेल न खाए, उसका कानून बन जाना सचमुच का महिला सशक्तीकरण नहीं कर सकता। महिलाओं या किसी भी दबे वर्ग को शक्ति ऊपर से एक उपहार की तरह दी नहीं जा सकती। पढ़ें मृणाल पाण्डे का लेख।

प्रतीकात्मक तस्वीर
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मृणाल पाण्डे

पिछले साल बजट सत्र के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन ने पहले पहल खुलासा किया कि महिला सशक्तीकरण की दृष्टि से उनकी सरकार लड़कियों के लिए (1978 में निर्धारित और 2006 में कानननू जायज बनी) आयु की सीमा 18 से बढ़ा कर पुरुषों के समतुल्य, यानी 21 बरस करने पर विचार कर रही है। उनका तर्क था कि अगर देरी से शादी होगी तो लड़कियों का शारीरिक विकास माता बनने के लिए तो बेहतर हो ही चुका होगा, उनकी शिक्षा तथा पोषाहार का दायरा भी बड़ा बन जाएगा। इससे मातृ मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर कम होगी और बेहतर शिक्षा से लैस महिलाएं शादी के बाद बेहतर वेतनमान वाली नौकरियां करने लायक बनेंगी। हमारे समाज में आम धारणा है कि शादी हर लड़की के लिए अनिवार्य है। सरकार की इसके साथ यह भी राय थी कि अपने मायके में औसत लड़की को बेहतर पोषाहार, अपनी पढ़ाई जारी रखने और आने- जाने की अपेक्षाकृत अधिक आजादी प्राप्त होती है जिसे वह तीन साल और पाती रहे तो काफी ताकतवर बन कर विवाह बंधन में बंधेगी। लिहाजा आनन-फानन एक कमेटी बनी जिसने अपनी रपट में उपरोक्त आधारों पर सरकार का समर्थन किया है। विधेयक भी बन गया है जिसे बतौर महिला सशक्तीकरण की नेकदिल सरकारी मुहिम को खूब प्रचारित किया जा रहा है। संसदीय बहुमत देखते हुए बिल के काननू बन जाने की प्रबल संभावना है।

महिलाओं की दशा-दिशा समझनेवाले लोगों की तरह अगर हमारी सरकार महिला सशक्तीकरण मुद्दे को वोट बैंक पोषण और उसके चुनावी नफे-नुकसान के हिसाब से नहीं बल्कि तर्क और शोध के उजास में परखे, तो इस बिल की अव्यावहारिकता बिल्कुल सतह पर दिखेगी। संसदीय समिति के लिए पूछने की बातें यह थीं कि भारत में (नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार) बाल विवाह निरोधक काननू, 2006 के पंद्रह बरस बाद भी 18 साल से कम उम्र की लड़कियों की शादियों की तादाद कुल की 27 फीसदी (जो विश्व में सबसे अधिक) बनी हुई है? क्यों जब कोई भंवरी देवी जैसी ग्रामीण कार्यकर्ता काननू का हवाला देकर बाल विवाह रुकवाने की कोशिश करती है, तो उसके साथ गंभीर शारीरिक हिंसा की जाती है? और कोविड लॉकडाउन के बीच भी महिला बाल कल्याण विभाग को गैरकानूनी बाल विवाहों की 5,200 शिकायतें क्यों मिलीं? और लॉकडाउन खत्म होने के बाद से 11 फीसदी महिलाओं के बेरोजगार हो जाने और विपन्न परिवारों की लाखों बच्चियों की पढ़ाई ऑनलाइन सुविधाओं से दूर होकर अधबीच छूट जाने की खबरें क्यों आ रही हैं?


सच्चाई यह है कि जब तक भारतीय समाज में लड़की को पराया धन मानने की मानसिकता नहीं जाती और गरीब परिवारों में मां-बाप के दिल में उनकी कम उम्र अनब्याही लड़कियों के साथ निरंतर संभव यौन अपराधों पर काबू होने का यकीन नहीं बनता, तब तक विवाह की उम्र कानूनन 21 नहीं 31 कर दीजिए, स्थिति बहुत नहीं बदलेगी। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 की ताजा रपट भी इस बात की पुष्टि करती है कि बाल विवाह सबसे ज्यादा गांवों के उन अजा- जजा और पिछड़े वर्गों में होते पाए गए जो आर्थिक दृष्टि से विपन्न हैं। लॉकडाउन के दौरान इन्हीं वर्गों की रोजी- रोटी पर सबसे अधिक दुष्प्रभाव पड़ा है और इन परिवारों के बच्चों में स्कूली शिक्षा अधबीच छोड़नेवाली लड़कियों की तादाद में भारी बढ़ोतरी देखी गई। अंतरराष्ट्रीय महिला शोध संस्थान ने पाया है कि अगर लड़कियां घर बैठी हों, तो उनका बाल विवाह होने की संभावना स्कूल जानेवाली बच्चियों की तुलना में 3 से 4 गुना बढ़ जाती है। इसके पीछे जो पारंपरिक सामाजिक सोच है, उसे काननू लाने भर से नहीं बदला जा सकेगा। खासकर तब, जबकि महिलाओं-बच्चियों के खिलाफ यौन अपराध बढ़ रहे हों और घर की आमदनी सिकुड़ने से माता-पिता पराये धन को जितनी जल्द हो सके दूसरे घर भेज कर निवृत्त होने के इच्छुक हों।

नया काननू बन भी गया तो होगा यही कि चोरी-छुपे बाल विवाह होते रहेंगे। और इस तरह ब्याही गई लड़कियां घरेलू तथा यौन हिंसा और उत्पीड़न झेल कर भी किससे फरियाद कर सकेंगी? हां, काननू में प्रावधान जरूर है कि बाल विवाह की शिकार लड़की काननू की शरण में जाकर अपनी वह शादी खारिज करा सकती है। पर उसे बोझ मान कर जल्द मुक्त होने की इच्छावाले उसके माता-पिता क्या उसे वापस ले लेंगे। फिर उन निजी कानुनों का क्या होगा जो भिन्न वर्गों को मान्य हैं? उदाहरणस्वरूप, शरिया काननू के तहत लड़का-लड़की जब किशोर हो जाएं, तो उनका विवाह जायज बन जाता है। कम उम्र में ब्याही गई अत्याचारों की शिकार हमारी कितनी बालिका वुधएं अपनी शादी को अदालती चुनौती देने के काबिल हैं? सामाजिक सोच तो आज भी मां- बाप, सास-ससुर सबको कानून के कटघरे में खींच कर खड़ा करनेवाली लड़कियों को बहुत नीची निगाह से देखता है। एक तरफ मां-बाप की नाराजगी, दूसरी तरफ सामाजिक प्रताड़ना का डर कितनी लड़कियों को इस कानूनी प्रावधान का फायदा दे सकेगा?


सौ बात की एक बात, अगर सरकार आज की तारीख में 18 साल की हर लड़की को मानसिक रूप से परिपक्व मानकर उसे स्वतंत्र मतदाता होने के काबिल समझती है, तो शादी के लिए क्यों नहीं? क्या इसके पीछे कहीं यह दबी हुई सोच है कि देर से शादी मतलब कम बच्चे, लेकिन ताजा शोध तो साफ दिखा रहा है कि भारत के दो राज्यों (बिहार तथा उत्तर प्रदेश) को छोड़कर शेष राज्यों में प्रजनन दर आदर्श मानक बना चुकी है। और इसकी बड़ी वजह यह है कि लड़कियों की शिक्षा दर बढ़ी है, शहरी मध्यवर्ग का दायरा बढ़ा है और उसकी लड़कियों की बेहतर वेतनमान पाने की क्षमता में इजाफा होने से वे अब माता-पिता पर वैसा बोझ नहीं मानी जातीं जैसे एक पीढ़ी पहले मानी जाती थीं। इसलिए अगर सरकार ईमानदारी से महिला सशक्तीकरण को बल देना चाहती है और उसकी दृष्टि में शादी अगर हर लड़की की अनिवार्य नियति है, तब बेअसर कानूनों तक ही बात सीमित न रखे। बेहतर होगा कि वह दो मोर्चों पर लड़कियों-महिलाओं को सहारा दे: पहला पढ़ाई- लिखाई की सुविधाओं तथा सब्सिडियों का चुस्त प्रबंधन, और दूसरा महिलाओं के लिए हर कार्यक्षेत्र में उनको बेहतर वेतनवाले रोजगार, सुविधाएं (जैसे, स्वास्थ्य कल्याण तथा क्रेश) और शारीरिक सुरक्षा देना। कोविड की तालाबंदी से पहले स्कूलों में मिड डे मील तथा सस्ते सैनीटरी नैपकिन के वितरण से लड़कियों को माता-पिता की स्वीकृति पाने और अपनी शिक्षा जारी रखने में बहुत मदद मिलती थी। अचानक स्कूल बंद हो जाने से वह क्रम टूट गया है जिसकी वजह से गरीब घर की लड़कियों की ड्रॉप आउट दर बढ़ी हुई पाई जा रही है। सरकार को इस बाबत अधिक गंभीरता से सोचना चाहिए कि क्यों लड़कियों की पढ़ाई जितनी देर जारी रहती है, उनके बाल विवाह में दे दिए जाने की संभावना उतनी ही कम होती जाती है। सेकेंडरी पढ़ाई पूरी कर चुकी लड़कियों में तो यह दर सिर्फ दो या तीन प्रतिशत रह गई है।

साल 2021 खत्म हो गया। कोविड और नई सूचना संचार तकनीक से सफलतापूर्वक जूझ चुके भारतीय राज-समाज को अब लड़कियों की शिक्षा और उनकी शादी के सवालों पर परंपरा और रीति-रिवाजों से बनाई गई दृष्टि से हटकर सोचना होगा। शिक्षा की अवधारणा को हम इतना सिकोड़ दें कि उसके तहत लड़कियों का रोल सिर्फ पति और उसके परिजनों को संतुष्ट रखने, एक सुघड़ गृहिणी और समझदार माता बनने तक ही सीमित हो, तो वह शिक्षा की जगह एक थकी-बसी परंपरा का पोषण ही होगा। ऐसी शिक्षा लड़कियों को एक सशक्त सजग व्यक्तित्व के बतौर नहीं गढ़ सकती। इसी तरह जो विधेयक कल्पना में अग्रगामी होते हुए भी महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक यथार्थ से मेल न खाए, उसका कानून बन जाना सचमुच का महिला सशक्तीकरण नहीं कर सकता। महिलाओं या किसी भी दबे वर्ग को शक्ति ऊपर से एक उपहार की तरह दी नहीं जा सकती। महिलाओं को शक्तिमंत बनने के लिए जरूरत दान की नहीं, राज-समाज द्वारा उनके दबाए-कुचले जीवनपथ को समतल और निरापद बनाने की है। और यह काम स्त्रियों की वास्तविक परिस्थिति और उनकी पराधीनता की असली वजहों को टटोलने और मिटाने से किया जा सकता है। उस राह पर निडरता से अपने पैरों चल पाना महिलाओं का क्रमश: सशक्तीकरण करता रहेगा।

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