मृणाल पाण्डे का लेख: हर भारतीय की पुकार हम जीना चाहते हैं, लेकिन बाबूशाही तर्क-वितर्क में तल्लीन

कोविड के दौरान पंचायत से लेकर असेंबली चुनावों तक के दौरान बिना टीकाकरण के ड्यूटी पर अनिवार्य तैनात किए गए सैकड़ों शिक्षकों के संक्रमित होकर मरने की खबरें काफी समय से सुर्खियों में हैं। उनके परिवारों को कब कितना मुआवजा दिया जाए?

फोटो: IANS
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मृणाल पाण्डे

कोविड के दौरान पंचायत से लेकर असेंबली चुनावों तक के दौरान बिना टीकाकरण के ड्यूटी पर अनिवार्य तैनात किए गए सैकड़ों शिक्षकों के संक्रमित होकर मरने की खबरें काफी समय से सुर्खियों में हैं। उनके परिवारों को कब कितना मुआवजा दिया जाए? क्या घर पर हुई मौत को भी ड्यूटी पर हुई मौत माना जाए, जैसे तर्क-वितर्क में बाबूशाही तल्लीन है। इसी बीच विशेष रेलगाड़ियों को चलाने और स्टेशनों से उनको चलवाने वाले रेलवे के भी 150 कर्मचारियों के कोविड से मारे जाने की खबर है। इस महीने के अंत तक महामारी के फैलाव के मद्देनजर भारतीय रेलवे के 30 हजार कर्मचारी भी (एसएमएस के जरिये) सभी कर्मियों के तुरंत टीकाकरण की मांग सीधे रेलवे बोर्ड के चेयरमैन, जोनल प्रभारियों और 68 डिवीजन प्रमुखों से उठाने जा रहे हैं। उनका कहना है कि हमको या तो तुरंत टीका लगाया जाए या फिर ड्यूटी पर तैनात न किया जाए क्योंकि हम 1 जुलाई के बाद भी जीना चाहते हैं।

झारखंड के मुख्यमंत्री देश के सफल और कुशल नेताओं में हैं। एक बड़े अंग्रेजी दैनिक को दिए साक्षात्कार में उनका कहना था कि उनका राज्य बालू में अटके जहाज सरीखा बना हुआ है। इस समय जबकि कोविड-2 की रफ्तार तनिक थमती दिख रही है, देश के हर नागरिक को तुरंत टीका लगा कर महामारी की तीसरी लहर को काफी हद तक थामा जा सकता है। लेकिन राज्यों के मुख्यमंत्रियों से जो तमाम टेलीविजनियां मीटिंगें की गईं, उनमें केंद्र सरकार ही बोलती रही। राज्यों के उन जैसे प्रतिनिधियों को राय रखने का मौका ही नहीं मिला। फिलवक्त जमीनी स्थिति यह है कि केंद्रशासित दिल्ली सहित लगभग सारे राज्य टीकों के अभाव में अधिकतर टीकाकरण केंद्र बंद करने को मजबूर हैं। बाहर से टीके आयात करने का हक दिल्ली की केंद्र सरकार ने न तो औपचारिक तौर से त्यागा है, न ही अपने पास रखा है। कहा तो गया कि ग्लोबल टेंडर जारी करके राज्य सरकारें अब खुद ही हर आयुवर्ग के लिए जीवनरक्षक टीके उपलब्ध करवा लें। पर जब पंजाब, महाराष्ट्र, केरल आदि राज्यों ने टेंडर जारी किए तो या तो जवाब नहीं मिला या मॉडर्ना या फाइजर जैसी कंपनियों ने मुख्यमंत्रियों से कहा कि वे सीधे उनको टीके नहीं बेच सकतीं, यह काम सिर्फ केंद्र सरकार की ही मार्फत होगा। लो कल्लो बात!

कुछ माह पहले जब भारत सरकार दुनिया भर में ढिंढोरा पीट रही थी कि हम विश्वके सबसे बड़े टीका बनाने वाले देश हैं, तो जनता को भरोसा हो गया था कि टीकाकरण का काम एक बार शुरू हो गया तो चलता रहेगा। लेकिन पिछले तीन महीनों में सरकार ने कोविशील्ड के पहले और दूसरे टीके का अंतराल 28 दिनसे बढ़ाकर 6-8 हफ्ते का कर दिया है। क्या यह मेडिकल कारणों से किया गया या कि वैक्सीन की किल्लत के चलते, इस बाबत कोई भरोसेमंद जवाब सार्वजनिक नहीं हुआ है। इसी बीच 18 से 44 तक की आयुवालों का टीकाकरण बंद हो चुका है। स्कूल खुलने जा रहे हैं। खबर है कि12वीं की परीक्षाएं भी होंगी। ऐसे में बिना रोग प्रतिरोधी टीका लगाए लाखों किशोरों को जोखिम उठा कर परीक्षा देने जाना होगा। क्या उनके जीवित रहने के अधिकार पर राजनीतिक दोषारोपण में तल्लीन नीति-निर्माताओं का ध्यान नहीं जाना चाहिए? जब मीडिया को इस बाबत जनहित में अभिभावकों तथा सरकार- दोनों का ध्यान खींचना चाहिए, वह वैक्सीन को लेकर जनता के एक हिस्से की हिचक मिटाने पर या वैक्सीन कंपनियों के भारी मुनाफे और शेयर बाजार के उछाल जैसे विषयों पर जिरह कर रहा है।

कोविड की दूसरी लहर ने अगर कुछ संदेश दिया है तो वह यह कि फिलवक्त सरकार को अर्थजगत से अधिक महामारी की रोकथाम पर, और महारोग के बदलते रूप का तोड़ निकालने वाले विशेषज्ञों पर ही ध्यान और संसाधन केंद्रित करने चाहिए। प्रधानमंत्री ने खुद कहा है कि यह वायरस लगातार रूप बदलता बहुरुपिया और धूर्त शत्रु है। ऐसी चुनौती से जूझने के लिए दुनियाभर में विज्ञान ही इकलौता कारगर हथियार साबित हुआ है। हमारे यहां पारंपरिक भारतीय जड़ी-बूटियों से सब रोग ठीक करने का दावा करने वाले कई बाबा और नीम-हकीम इधर सरकारी खाद-पानी से पलने लगे थे। वैज्ञानिकों के पक्ष में ऐसों के सुझाए टोटकों और अवैज्ञानिक रसायनों, अवलेहों और चूरनों पर रोक लगानी जरूरी है। वरना अभी तो खिन्न होकर एलोपैथ चिकित्सा की शीर्ष संस्थाने एक बाबा जी को वैज्ञानिक चिकित्सा को भला-बुरा कहने पर माफी मंगने पर मजबूर किया है। अगर फिर भी इस तरह के अंधविश्वास को बढ़ावा और सरकारी सहारा मिलता गया तो वह दिन दूर नहीं जब देश भर में वायरस के बदलते रूपों की समग्र वैज्ञानिक पड़ताल कर रही समिति के एक शीर्ष वैज्ञानिक की ही तरह अन्य वैज्ञानिक चिकित्सक भी सरकारी कमिटियों से त्यागपत्र दे दें।

यह भी आज उतना ही जरूरी है कि खुद सरकार की जन स्वास्थ्य से जुड़ी शीर्ष संस्थाओं में बैठे विशेषज्ञ त्वरित प्रमोशन और फॉरेन यात्राओं के छिनने का मोह त्याग दें। जो हिपोक्रेटिक शपथ उन्होंने ली हुई है उसके तहत उनका दाय है कि वे सरकारी हस्पतालों में उपकरणों के रख-रखाव की स्थिति, सुशिक्षित स्टाफ की मौजूदगी और जीवन रक्षक दवाओं की नियमित उपलब्धि की बाबत बेबाक जानकारियां, त्वरित सुधार के व्यावहारिक सुझाव और उपचार के जरूरी प्रोटोकॉल कड़ाई से लागू किए जाने की बाबत सरकार पर दबाव बनाएं। ऑक्सीजन थेरेपी ले रहे मरीजों के लिए परिचारक नल के पानी का उपयोग कतई न करें, तमाम श्वास संबंधी उपकरणों तथा आईसीयू के बिछौनों को सही तरह स्टेरेलाइज करके ही दोबारा उपयोग में लाया जाए, इसकी सलाह समय पर देकर घातक फंगस संक्रमण से कई मरीजों को बचाया जा सकता था।

2019 के चुनावों ने वैकल्पिक सपनों, समाजवाद और सर्वधर्म समभावी राजनीति से मुक्तयुग की शुरुआत की थी, 2021 में कोविड ने उसकी सच्चाई को निर्ममता से उघाड़ दिया है। यह भी संयोग नहीं कि उस पुरानी वैचारिकता की गोद में पले कई शेर-चीते आज भाजपा के अभयारण्य में विचरते देखे जा सकते हैं। अपने विगत को भुला कर एक भाजपाई सर्वसम्मति में नीतीश या सिंधिया या बिस्वा भले विलीन हो चुके हों लेकिन इसमें दो राय नहीं हो सकतीं किअपने नवीन मातृ दल के साथ वे भी जनता के बीच अपना नैतिक जनाधार बड़ी हद तक खो चुके हैं। और कुनबे के ज्यादा पुराने, ज्यादा समर्पित और ज्यादा महत्वाकांक्षी कार्यकर्ताओं को हमेशा संतुष्ट रखना कठिन होता जा रहा है। बंगाल में, हम फिर दीदी से जुड़ने के इच्छुक हैं, कह रहे लोगों पर नजर फिराइए तो बात समझ आ जाएगी। ऐसा विशाल भानुमती का कुनबा जो निजी हित स्वार्थों और धनबल से जोड़ा गया हो, अपने कमजोर क्षणों में वैचारिकता आधारित बड़े राष्ट्रीय दलों को हरा सकता है लेकिन वह राज-काज नहीं चला सकता। कोविड की दो लहरों के बाद देश की जो दशा हो चुकी है, उसके मद्देनजर उदाहरण देना जरूरी नहीं। वही कुनबे की भीतरी टूट, वही एक दूसरे की पीठ में छुरा भोंकना, मीडिया में लीक खबरें और फेक या असली वीडियो। हम शिवमंगल सिंह सुमन को याद ही कर सकते हैं... “कुछ आज न पहली बार ये दुनिया छली गई...।"

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