एमएसएमई: लफ़्फ़ाज़ी, नियम और हक़ीक़त
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग वास्तव में अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन सकते हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें औपचारिकताओं का एक व्यावहारिक और वास्तविक रास्ता दिया जाना जरूरी है। वर्ना इस क्षेत्र की संभावनाएं जाया चली जाएंगी और ये इकाइयां परेशान रहेंगी सो अलग।

बीते 27 जून को ‘राष्ट्रीय एमएसएमई दिवस’ के मौके पर कसीदे गढ़ने और तारीफों का एक ऐसा दौर चला जिसने छोटे व्यवसायों को रोजगार, औद्योगिक उत्पादन और निर्यात की ‘रीढ़’ मानकर उनका महिमामंडन किया। इसके ठीक बाद, 1 जुलाई को देश ने माल और सेवा कर (जीएसटी) की नौवीं वर्षगांठ पर ‘जीएसटी दिवस’ मनाया। मगर इन आयोजनों के बीच की कड़वी हकीकत यह है कि भारत के छोटे उद्यमियों को आज भी औपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनने का कोई व्यावहारिक रास्ता नहीं सूझ रहा। वे नीति-जनित चक्रव्यूह के ऐसे शिकंजे में फंसे हैं, जहां बड़े कॉर्पोरेट ग्राहक ‘समय’ को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं और दूसरी तरफ, देश का जटिल व उपार्जन-आधारित कर-ढांचा ‘अनुपालन’ को एक हथियार बनाकर छोटे उद्योगों पर प्रहार करता है।
इस ढांचागत अंतर्विरोध ने एमएसएमई क्षेत्र के सामने एक विनाशकारी दोहरा संकट खड़ा कर दिया है। एक तरफ, इन छोटी इकाइयों को बड़े कॉर्पोरेट खरीदारों और सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों के लिए ‘ब्याज-मुक्त क्रेडिट लाइन’ बनने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जो महीनों तक उनके भुगतानों को रोके रखते हैं। दूसरी तरफ, जीएसटी व्यवस्था उस पैसे पर तुरंत और बिना किसी समझौते के टैक्स भुगतान की मांग करती है, जो एमएसएमई को अभी तक प्राप्त ही नहीं हुआ है। यह विसंगति छोटे व्यवसायों का दम घोटने के लिए काफी है।
एमएसएमईडी अधिनियम, 2006 की धारा 15 के तहत, खरीदारों के लिए यह कानूनी बाध्यता है कि यदि कोई लिखित अनुबंध है तो वे 45 दिनों के भीतर, और अनुबंध न होने की स्थिति में 15 दिनों के भीतर विक्रेताओं के बिलों का निपटान करें। यह कानून तय समय सीमा का उल्लंघन करने पर भारी आर्थिक दंड और चक्रवर्ती ब्याज देने की जवाबदेही भी तय करता है।
मगर जमीनी धरातल पर ये समय सीमाएं सरासर बेमानी हैं। बड़े निजी संस्थान और सरकारी निकाय अमूमन भुगतान चक्र को 90, 120 या 180 दिनों तक खींच देते हैं। इस खाई को पाटने के लिए किए गए संस्थागत प्रयास भी कॉर्पोरेट घरानों के असहयोग की भेंट चढ़ चुके हैं। ‘ट्रेड रिसीवेबल्स डिस्काउंटिंग सिस्टम’ को ही लें। रिजर्व बैंक द्वारा विनियमित इस इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म का उद्देश्य यह था कि एमएसएमई तत्काल नकदी के लिए अपने बिलों की बैंकों के जरिये नीलामी कर सकें, जिसे तकनीकी भाषा में इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म पर ‘बिल डिस्काउंटिंग’ कहते हैं। लेकिन बड़े कॉर्पोरेट और लोक उपक्रम इस प्लेटफॉर्म पर आने या इन बिलों को मंजूरी देने से मना कर देते हैं क्योंकि टीआरडीएस प्लेटफॉर्म खरीदारों को परिपक्वता की तारीख पर एक कड़े ऑटो-डेबिट सिस्टम से बांध देता है, और किसी भी भुगतान चूक की स्थिति में इसकी रिपोर्ट स्वतः क्रेडिट ब्यूरो को चली जाती है। अपने क्रेडिट स्कोर को बचाने के लिए नकदी प्रबंधन को सुधारने के बजाय, ये कॉर्पोरेट दिग्गज इस प्लेटफॉर्म को ही ब्लॉक कर देते हैं, जिससे छोटे विक्रेता मझधार में रह जाते हैं।
नकदी प्रवाह का गंभीर संकट
भुगतान में होने वाली इस देरी को जीएसटी का मौजूदा ढांचा और बदतर बना देता है, जो वास्तविक नकदी प्रवाह के बजाय उपार्जन के सिद्धांत पर काम करता है। यानी यदि कोई बिल जेनरेट हो गया है, तो टैक्स का भुगतान अगले महीने की 20 तारीख तक करना ही होगा, भले उस बिल का पैसा जब भी मिले। इस तरह, एक एमएसएमई इकाई को बिल बनाने के फौरन बाद 18 फीसद टैक्स अपनी जेब से चुकाना पड़ता है, जबकि कॉर्पोरेट खरीदार बिना एक भी रुपया दिए 45 दिनों की कानूनी सीमा को दरकिनार कर देता है।
यह स्थिति नकदी प्रवाह का एक भयानक और उल्टा असंतुलन पैदा करती है। छोटे वेंडर अपने कर्मचारियों का वेतन रोकने पर मजबूर हो जाते हैं या फिर बाजार से ऊंचे ब्याज पर कर्ज लेने को विवश होते हैं। इस वित्तीय संकट को और गंभीर बनाने का काम कम डिजिटल साक्षरता, तकनीक तक पहुंच का अभाव और कर-पोर्टल की जटिल संरचनाएं करती हैं। अर्ध-शहरी औद्योगिक समूहों में तो इंटरनेट कनेक्टिविटी की समस्याएं संकट और बढ़ा देती हैं।
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के असंगठित क्षेत्र के उद्यमों के वार्षिक सर्वेक्षण आंकड़े बताते हैं कि भारत में अनुमानित 7.7 करोड़ गैर-कृषि और गैर-निर्माण असंगठित प्रतिष्ठान हैं। आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि ये उद्यम राज्य के औपचारिक तंत्रों से दूरी बना रहे हैं, क्योंकि मौजूदा प्रणालियां उनके प्रति दमनकारी हैं। यही कारण है कि इनमें से केवल लगभग 10 लाख सूक्ष्म उद्यम ही जीएसटी के तहत पंजीकृत हैं। इसके अलावा, जहां जीएसटी नेटवर्क के रिकॉर्ड बताते हैं कि मोटे तौर पर 70 लाख करदाताओं का वार्षिक टर्नओवर 1 करोड़ रुपये से कम है, वहीं जमीनी स्तर का सर्वेक्षण पाता है कि ऐसे जीएसटी-पंजीकृत प्रतिष्ठान वास्तव में 12 लाख से भी कम हैं। यह भारी अंतर किसी व्यापक कर चोरी का संकेत नहीं है, बल्कि यह छोटे उद्योगों की अस्तित्व बचाने की एक हताश रणनीति है। छोटे व्यवसायों को यह समझ आ गया है कि जीएसटी प्रणाली के भीतर कदम रखने का सीधा मतलब कानूनी और वित्तीय जटिलताओं के जाल में दम तोड़ना है।
यह दोहरा संकट एक गहरे अस्तित्वगत विरोधाभास को जन्म देता है। बिना भुगतान वाले बिलों पर अजेब से टैक्स चुकाने के डर से अधिकतर छोटे व्यवसाय जीएसटी दायरे से बाहर रहना चुनते हैं। लेकिन जीएसटी में पंजीकरण न कराना उनके लिए एक ‘व्यावसायिक देश निकाला’ साबित होता है। बड़े कॉर्पोरेट घरानों की पूरी सप्लाई चेन इनपुट टैक्स क्रेडिट को अधिकतम करने के सिद्धांत पर टिकी होती है। यदि कोई एमएसएमई जीएसटी के तहत पंजीकृत नहीं है, तो बड़े कॉर्पोरेट उनके साथ व्यापार करने से कतराते हैं।
जो उद्यम अस्तित्व बचाने के लिए पंजीकरण करा भी लेते हैं, उनके लिए कानूनी उपचार सत्ता और प्रभाव के इस भारी असंतुलन के कारण बेकार साबित होते हैं। नीति-निर्माता अक्सर डिफॉल्टर खरीदारों को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करने के लिए ‘एमएसएमई समाधान’ पोर्टल का हवाला देते हैं, लेकिन ऐसा सोचना सप्लाई चेन की जमीनी हकीकत से अज्ञानता को दिखाता है। ज्यादातर छोटे एमएसएमई वेंडर अपने राजस्व के 80 से 100 फीसद के लिए केवल एक ही बड़े कॉर्पोरेट ग्राहक पर निर्भर होते हैं। एक छोटा वेंडर अपने ही मुख्य ग्राहक को शर्मिंदा नहीं कर सकता, क्योंकि उस ग्राहक को नाराज करने की कीमत वह नहीं चुका सकता। 45 दिनों के नियम की आक्रामक मांग करना, आयकर अधिनियम की धारा 43बी(एच) को कड़ाई से लागू करवाना, या समाधान पोर्टल पर केस दर्ज करने का नतीजा यह होता है कि उन्हें बिना किसी शोर-शराबे के वेंडर लिस्ट से बाहर कर दिया जाता है।
यहां तक कि जीएसटी के तहत 180 दिनों के भीतर इनपुट टैक्स क्रेडिट को पलटने का नियम भी राज्य के आत्म-हित और स्वार्थ को ही उजागर करता है। यदि कोई खरीदार 180 दिनों तक भुगतान नहीं करता, तो कानून उसे निर्देश देता है कि वह दावा किए गए टैक्स क्रेडिट को 18 फीसद ब्याज दंड के साथ सरकार को लौटाए। राज्य उस बड़े कॉर्पोरेट से अपना जुर्माना और टैक्स सफलतापूर्वक वसूल कर लेता है, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में पीड़ित एमएसएमई को न तो कोई टैक्स रिफंड मिलता है और न ही कोई वित्तीय राहत। सरकार अपना राजस्व दो बार सुरक्षित कर लेती है, जबकि छोटा व्यवसाय एक जहरीले और कभी न मिलने वाले कर्ज के बोझ तले दबा रह जाता है।
यदि हम टैक्स कानून को जमीनी परिस्थितियों के अनुकूल बनाना चाहते हैं, तो राज्य को तीन हस्तक्षेपों पर विचार करना होगा:
सूक्ष्म उद्यमों के लिए नकदी-आधारित जीएसटी: एक निश्चित टर्नओवर सीमा तक के छोटे व्यवसायों को जीएसटी केवल तभी जमा करने की अनुमति दी जानी चाहिए, जब बिल की राशि वास्तव में उनके बैंक खाते में पहुंच जाए। टैक्स का संकलन वास्तविक पूंजी प्रवाह आधारित होना चाहिए।
लो-बैंडविड्थ पोर्टल आर्किटेक्चर: कर-पोर्टल का एक अत्यंत आसान संस्करण पेश किया जाए, जो खास तौर पर सूक्ष्म उद्यमों के अनुकूल हो। यह संस्करण उन क्षेत्रों में भी बिना किसी रुकावट के काम करने में सक्षम हो जहां इंटरनेट कनेक्टिविटी बेहद कमजोर है, और यह मासिक रिटर्न दाखिल करने के बोझ को न्यूनतम स्तर पर ले आए।
जीएसटीएन-टीआरईडीएस डिजिटल ब्रिज: बिलों को मंजूरी देने के मामले में बड़े कॉर्पोरेट खरीदारों के पास ‘वीटो पावर’ नहीं होना चाहिए। जैसे ही जीएसटी पोर्टल पर किसी बड़े कॉर्पोरेट (250 करोड़ से अधिक टर्नओवर) से जुड़ा कोई ई-इनवॉइस जेनरेट हो, सिस्टम को स्वचालित रूप से टीआरडीईएस प्लेटफॉर्म पर एक अपरिवर्तनीय और पूर्व-स्वीकृत ट्रेड रिसीवेबल बना देना चाहिए। इससे बैंक बिना किसी देरी के छोटे वेंडर को तुरंत फंड दे सकेंगे और असहयोग करने वाले बड़े खरीदार इस वित्तीय चक्र की बाधा नहीं बन पाएंगे।
एमएसएमई अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन सकते हैं, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि सरकार उन्हें औपचारिकता के दायरे में आने का एक व्यावहारिक, सुरक्षित और वास्तविक रास्ता दे।
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(डॉ. अजीत रानाडे जाने-माने अर्थशास्त्री हैं। सौजन्य: द बिलियन प्रेस)
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