खरी-खरी: मुस्लिम समाज को है सामाजिक क्रांति की जरूरत

मुस्लिम समाज को केवल एक सर सैय्यद ही नहीं चहिए, अपितु मुल्ला गिरोह से निपटने के लिए एक सामाजिक क्रांति की भी आवश्यकता है। इसके बगैर केवल संघ की राजनीति से ही क्या, किसी प्रकार के पतन से छुटकारा संभव नहीं है।

फोटो : सोशलमीडिया
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ज़फ़र आग़ा

भारतीय मुसलमान के लिए एक नरेंद्र मोदी और हिंदू राष्ट्र का रोना ही क्या रोना है! ऐतिहासिक तथ्य यही है कि 1857 से 2019 तक का भारतीय मुस्लिम समुदाय का सफर बताता है कि यह समाज राजनीतिक और सामाजिक तौर पर सिकुड़ता चला जा रहा है। खुद स्वतंत्र भारत पर निगाह डालिए, तो बंटवारे से लेकर अब तक दर्जनों ऐसे अवसर मिल जाएंगे जिसको मुस्लिम समाज की त्रासदी कहा जा सकता है।

1947 का बंटवारा ही एक बहुत बड़ी दुखद घटना थी जिसने पूरे उपमहाद्वीप के मुसलमानों को छिन्न-भिन्न कर दिया। पाकिस्तान का मुसलमान अमेरिका और चीन की इमदाद पर जीवित है। बांग्लादेश का जो हाल है वह किसी से छिपा नहीं। और मोदी राज में अब भारतीय मुसलमान लगभग दूसरे दर्जे की नागरिकता की स्थिति पर पहुंच चुका है। यह है ‘महान नेता’ मोहम्मद अली जिन्ना की दूरदर्शिता का कमाल।

फिर पिछले 25 वर्षों में भारत में कभी बाबरी मस्जिद का ध्वंस, तो कभी मुंबई और गुजरात में मुस्लिम नरसंहार जैसी त्रासदी पूर्ण घटनाओं का सामना। अर्थात् 1857 में मुगल शासन के पतन के समय से 2014 में मोदी के उदय तक भारतीय मुस्लिम इतिहास केवल पतन का इतिहास है। दुखद बात यह है कि इस समाज में अभी भी परिवर्तन की कोई ललक नहीं नजर आती। यह किसी भी समाज की सबसे बड़ी त्रासदी है कि वह अपने पतन की चिंता छोड़, हाथ पर हाथ धरे बैठ जाए।

यह भी कहना गलत होगा कि भारतीय मुसलमान सदा ही पिछड़े रहे हैं। स्वयं भारत का इतिहास साक्षी है कि लगभग 800 वर्ष तक भारत पर मुस्लिम वर्ग का वर्चस्व रहा। भारत में सदियों शान से शासक वर्ग की स्थिति में रहने के पश्चात यह समाज ऐसे पतन का शिकार हुआ कि अब तक नहीं उबर सका। सत्य तो यह है कि पिछले 250 वर्षों में सारी दुनिया में जिस मुस्लिम सभ्यता का डंका बजता था, वही सभ्यता अब ऐसे पतन की शिकार है कि जिसकी मिसाल ढूंढ पाना कठिन है। आखिर इस मुस्लिम सभ्यता और उस पर आधारित मुस्लिम समाज के उतार-चढ़ाव के क्या ऐतिहासिक कारण हो सकते हैं। उन्नति की चरम सीमा छूकर पतन के पाताल का यह सफर क्यों और कैसे!

जहां तक मुस्लिम सभ्यता एवं मुस्लिम समाज की उन्नति का सवाल है, तो उसका सेहरा केवल इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मोहम्मद साहब के सिर जाता है। क्योंकि उन्होंने इस्लाम की स्थापना जिन सिद्धांतों पर की वे अपने समय की सबसे प्रगतिशील विचारधारा पर आधारित थे। मूलरूप से इस्लाम के तीन मुख्य सिद्धांत ऐसे थे जिन्होंने मुस्लिम सभ्यता और समाज को वह शक्ली वरदान की जिससे लगभग पूरे मध्यकालीन इतिहास में इस्लाम और मुसलमान का डंका सारी दुनिया में बजता रहा।

वे तीन मूल्य सिद्धांत थे : मानव समानता अर्थात मुस्लिम समाज का हर व्यक्ति बिना किसी ऊंच-नीच, रंग, नस्ल अथवा जाति के भेदभाव के एक दूसरे के बराबर था। अर्थात् रंग, भाषा एवं देश जैसा कोई भी भेदभाव का मूल्य मुस्लिम समाज में नहीं था। यह अपने समय का एक क्रांतिकारी विचार था जिसको हजरत मोहम्मद ने मदीना में जो राज्य स्थापित किया वहां लागू किया। फिर (चौंकिएगा मत) इस्लाम धर्म ने महिला अधिकारों में जो क्रांति पैदा की उसकी मिसाल उससे पहले संगठित रूप से इस संसार में कहीं नहीं मिलती है।

उदारहरणतयः इस्लाम धर्म वह पहली व्यवस्था थी जिसने मुस्लिम महिला को सातवीं सदी में तलाक का अधिकार दिया था। अर्थात् उस काल में जबकि किसी भी समाज की महिला अपनी मर्जी की शादी के बारे में सोच भी नहीं सकती थी, ऐसे समय में मुस्लिम महिला को अपनी मर्जी की शादी के साथ-साथ तलाक का भी अधिकार था। यह महिला अधिकारों की ऐसी सामाजिक क्रांति थी जिसकी मिसाल पहले कभी नहीं दिखाई पड़ती है।

केवल इतना ही नहीं, मुस्लिम महिला को संपत्ति में अधिकार भी इस्लाम ने उस समय दिया जब कहीं इसकी कल्पना भी नहीं थी। हजरत मोहम्मद की अपने समय की तीसरी बड़ी क्रांतिकारी उपलब्धि यह थी कि मदीना में उन्होंने जो राज्य स्थापित किया वह ‘वेलफेयर स्टेट’ के सिद्धांतों पर आधारित था। अर्थात् इस्लामिक राज्य में हर मुस्लिम नागरिक का राज्य की आमदनी पर एक हिस्सा था और उसकी देख-रेख की जिम्मेदारी इस्लामिक शासक की थी।

ये तीनों विचार सातवीं सदी के ऐसे क्रांतिकारी विचार थे जिसने इस्लाम धर्म को देखते-देखते वह पंख दे दिए कि वह दुनिया में फैल गया। इस विचारधारा पर आधारित जिस मुस्लिम सभ्यता की स्थापना हुई सारे संसार में उसका डंका बज उठा। यूरोप, अफ्रीका और एशिया तीनों जगह मुस्लिम राज्य शासित हो गए। मोहम्मद साहब ने जिस इस्लाम धर्म की स्थापना की थी वह प्रगतिशील विचारधारा पर आधारित एक आंदोलन था। परंतु धीरे-धीरे जिन इस्लामी राज्यों की स्थापना हुई, वे अपने में एक सामाजिक व्यवस्था बन गए जिनमें मौलिक इस्लामिक अधिकार कम होते चले गए।

शाम (ग्रेटर सीरिया), बगदाद, मिस्र, तुर्की एवं स्वयं भारतीय महाद्वीप में स्थापित होने वाले मुस्लिम राज्य पूर्णतः एक साम्राज्य बन गए थे। धीरे-धीरे पूरा मुस्लिम समाज इन साम्राज्यों की छाया में एक सामंती समाज में परिवर्तित होता चला गया। अंततः यह नई सामंती मुस्लिम व्यवस्था इस चरम सीमा पर पहुंची कि इस व्यवस्था में बादशाह ‘जिल्लेइलाही’ अर्थात स्वयं भगवान के दर्जे पर पहुंच गया और बाकी उसकी सारी रियाया (चाहे वह स्वयं मुस्लिम ही क्यों न हो) दूसरे दर्जे के नागरिक हो गए।

अर्थात, मोहम्मद साहब ने जिस मानव समानता और इंसानी बराबरी का जो क्रांतिकारी विचार इस्लाम के माध्यम से दिया था वह मुस्लिम सामंती समाज में समाप्त होता चला गया। वह इस्लामी बराबरी अंततः केवल मस्जिदों तक सीमित होकर रह गई। जहां अमीर-गरीब सब बराबर खड़े होकर नमाज तो पढ़ सकते थे, परंतु नमाज के पश्चात फिर सामाजिक ऊंच- नीच के बंधन में बंध जाते थे। इसी प्रकार मुस्लिम समाज में औरतों को जो अधिकार मिले थे उनकी जो गत बनी उस पर जितने आंसू बहाए जाएं उतने कम हैं।

वह मुस्लिम औरत जिसको इस्लाम ने स्वयं तलाक का अधिकार दिया था वही मुस्लिम औरत सामंती समाज में मर्द के तीन तलाक के आगे अपने तमाम अधिकारों से वंचित हो गई। हजरत मोहम्मद ने महिला वर्ग को जो एक क्रांतिकारी स्वरूप दिया था वह मुस्लिम समाज में अंततः पूरी तरह समाप्त हो गया। रही बात एक ‘वेलफेयर स्टेट’ की, तो आज पाकिस्तान से सऊदी अरब तक लगभग तमाम इस्लामी देशों में जब किसी प्रकार के मानव अधिकार ही नहीं हैं, तो फिर आज के मुस्लिम समाज में ‘वेलफेयर स्टेट’ की क्या गुंजाइश हो सकती है।

परंतु, यह कायापलट हुआ कैसे? एक क्रांतिकारी आंदोलन से इस्लाम एक सामंती व्यवस्था कैसे बन गया। मोहम्मद साहब की एक क्रांतिकारी व्यवस्था को किन ताकतों ने एक सामंती व्यवस्था में बदल दिया। आखिर वह कौन सा नया सिद्धांत था जिसने मुस्लिम समाज की काया पलट दी। मोहम्मद साहब के देहांत के लगभग सौ वर्षों के भीतर इस्लाम एक साम्राज्य का रूप ले चुका था। शाम, बगदाद, तुर्की से लेकर दिल्ली तक बड़ी-बड़ी खिलाफतें एवं सल्तनतें साम्राज्य का रूप ले चुकी थीं। अब इन साम्राज्यों को चलाने के अपने दबाव एवं तकाजे थे जो मौलिक इस्लामी सिद्धांतों के विपरित थे। अब मुस्लिम शासक वर्ग को एक ऐसा उपाय चाहिए था जो उसकी कार्य प्रणाली को इस्लामिक प्रणाली बताकर मुस्लिम समाज में उसको मान्य करवा सके और उसको धार्मिक मान्यता भी प्रदान कर सके।

मुस्लिम शासकों की इस समस्या को शरीयत की आड़ में मुस्लिम समाज में मुल्ला गिरोह ने आसान बना दिया। जब किसी बादशाह अथवा सामंत को कोई समस्या आई, फतवे के माध्यम से मौलवियों ने वह समस्या हल कर दी। इस प्रकार हजरत मोहम्मद की क्रांतिकारी विचारधारा धीरे-धीरे एक सामंतवादी व्यवस्था बन गई। जिसमें मानव सशक्तिकरण के रास्ते तंग होते चले गए।

इधर जब इस्लामी समाज के क्रांतिकारी मूल्यसामंती रूप ले चुके थे, तो उधर दूसरी ओर यूरोप में एक नई सामाजिक क्रांति अंगड़ाई ले रही थी। धीरे-धीरे 18वीं शताब्दी में जब यूरोप ने साइंस एवं टेक्नोलॉजी के आधार पर अपनी सामंती व्यवस्था को तोड़कर एक नई प्रगतिशील व्यवस्था पैदा की, तो अब मानवता के सशक्तिकरण के नए रास्ते खुल गए। तभी तो 19वीं शताब्दी के मध्य से यूरोप सारी दुनिया पर हावी हो रहा था।

उधर 1857 में मुगलों के पतन से लेकर 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में तुर्की की खिलाफत के पतन तक सारे मुस्लिम साम्राज्यों का पतन भी हो रहा था। परंतु पश्चिम के हाथों हारी मुस्लिम सभ्यता ने पश्चिम की नई प्रगतिशील साइंस एवं टेक्नोलॉजी पर आधारित व्यवस्था को स्वीकार करने से इंकार कर दिया।

इसका नतीजा यह हुआ कि सारी दुनिया में पश्चिम से हारा मुस्लिम समाज पश्चिम के विरूद्ध एक जेहादी मानसिकता में फंसकर पतन में डूबता चला गया। अंततः यह समाज आधुनिकता से कटकर पतन के पाताल को पहुंच गया। ऐसे प्रतिक्रियावादी समाज पर धीरे-धीरे कमजोर सामंतों की भी पकड़ कम होती चली गई। अब उसकी जगह शरीयत एवं फतवों के नाम पर मौलवी वर्ग हावी होता चला गया। यही कारण है कि अब मुस्लिम समाज में मुल्ला वर्ग का डंका बजता है।

यही स्थिति अब भारतीय मुस्लिम समाज की भी है, जहां धर्म के नाम पर पूरे समाज पर मुल्ला हावी हैं। मुल्ला वर्ग के हाथों फंसा यह समाजआधुनिकता से कटता चला जा रहा है और 1857 से मोदी तक केवल पतन ही झेल रहा है। इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए मुस्लिम समाज को एक नई सामाजिक क्रांति की आवश्यकता है जो उसको सामंती प्रथाओं एवं प्रतिक्रियावादी मुल्ला वर्गसे मुक्त करवा सके। इस सामाजिक क्रांति के बिना मुस्लिम समाज आधुनिकता से नहीं जुड़ सकता है। जब तक यह समाज मानसिक रूप से आधुनिकता से नहीं जुड़ता है तब तक मुस्लिम समाज में आधुनिक शिक्षा के भी रास्ते ठीक से नहीं खुलेंगे जिसके बिना यह समाज एक अनंत अंधकार में डूबा रहेगा।

इसलिए मुस्लिम समाज को केवल एक सर सैय्यद ही नहीं चहिए, अपितु मुल्ला गिरोह से निपटने के लिए एक सामाजिक क्रांति की भी आवश्यकता है। इसके बगैर केवल संघ की राजनीति से ही क्या, किसी प्रकार के पतन से छुटकारा संभव नहीं है।

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