गहराता जा रहा है कंकालों की झील रूपकुंड का रहस्य, सच सामने आने तक संरक्षण जरूरी

इस झील की खोज सबसे पहले 19वीं सदी में हुई। उस समय माना गया कि ये कंकाल यहां से आ रहे जापानी सैनिकों की टोली के हैं। फिर 1942 में नंदा देवी रिजर्व के रेंजर ने दोबारा इस झील को खोजा। यह झील अपने में कई रहस्य समेटे हुए है, इसलिए इसे संरक्षित रखना जरूरी है।

फोटोः सोशल मीडिया
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महेन्द्र पांडे

उत्तराखंड के चमोली जिले में हिमालय के त्रिशूल (7120 मीटर) और नंदा देवी (6310 मीटर) शिखरों के बीच स्थित रूपकुंड को कंकालों की झील भी कहा जाता है, क्योंकि इसके किनारे और यहां तक की पानी के नीचे भी लगभग 300 नरकंकाल बिखरे पड़े हैं। जब गर्मी तेज होती है और आसपास की बर्फ पिघलती है, तभी ये कंकाल नजर आते हैं। रूपकुंड की गहराई 2 मीटर है समुद्रतल से इसकी ऊंचाई 5020 मीटर है। वैज्ञानिकों के एक अंतर्राष्ट्रीय दल ने अभी हाल में ही इन कंकालों का विस्तृत अध्ययन कर उनके रहस्य को उजागर करने का प्रयास किया है।

अब तक यही माना जाता रहा है कि ये सभी कंकाल एक साथ इकट्ठा लोगों के हैं, जो किसी धार्मिक उत्सव में एक साथ रूपकुंड तक गए और फिर युद्ध या महामारी या तेज तूफान या भीषण बर्फबारी की चपेट में आने से सबकी मृत्यु एक साथ हो गयी। कुछ लोग तो इसे सामूहिक-आत्महत्या भी मानते हैं। पर नए अध्ययन से स्पष्ट है की ये कंकाल अलग-अलग समय के हैं और लोग भी अलग-अलग नस्ल के थे। इस नए अध्ययन को “नेचर कम्युनिकेशंस” नामक जर्नल में प्रकाशित किया गया है।

इस अध्ययन के लिए 38 कंकालों के डीएनए का विस्तृत अध्ययन किया गया है। इसमें 15 कंकाल महिलाओं के थे। इसके अनुसार इनमें तीन विशिष्ट नस्ल के लोग थे और इनकी मृत्यु 800 ई. से 1800 ई. के बीच अलग-अलग समय पर हुई है। कुल 23 कंकाल दक्षिण एशिया के लोगों के हैं, जिन्हें स्थानीय या भारतीय कहा जा सकता है, जबकि चार कंकाल पूर्वी मेडिटरेनीयन (ग्रीस के आसपास) के निवासियों के हैं। एक कंकाल पूर्वी या दक्षिण पूर्वी एशिया के निवासी का है।

संभव है यह भारत के किसी हिस्से का हो सकता है या फिर भारत के किसी पड़ोसी देश का। सबसे अंत में यानी साल 1800 के आसपास मृत्यु पूर्वी मेडिटरेनीयन निवासियों की ही हुई थी। इस अध्ययन के सदस्य रहे बीरबल साहनी इंस्टिट्यूट ऑफ पैलीओसाइंसेज के वैज्ञानिक नीरज राय के अनुसार इस अध्ययन से इतना स्पष्ट है की ये सभी लोग अलग-अलग जगह से भिन्न समय पर आए थे और इनमें आपस में कोई संबंध नहीं था।

इस बर्फीली झील की खोज सबसे पहले अंग्रेजों ने 19वीं शताब्दी में किया था और उस समय माना गया था की यह इस रास्ते से आ रहे जापानी सैनिकों की टोली के कंकाल हैं। फिर 1942 में नंदा देवी गेम रिजर्व के रेंजर हरिकृष्ण मेधवाल ने इस झील को दोबारा खोजा। कुछ साल पहले सेंटर फॉर सेलुलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी के वैज्ञानिकों ने अध्ययन कर बताया था कि इन कंकालों में 30 प्रतिशत भारतीयों के और 70 प्रतिशत कंकाल वर्तमान ईरान के आसपास के लोगों के हैं और इनकी मृत्यु 9वीं शताब्दी में हुई होगी। कुछ स्थानीय कथाओं के अनुसार बहुत पहले कन्नौज के राजा जसधवल अपनी गर्भवती पत्नी, सैनिकों और दरबारी नर्तकियों के साथ इस झील के किनारे प्रवास कर रहे थे, तभी भारी बर्फबारी के कारण इन लोगों की मृत्यु हो गयी।

लेकिन ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की रेडियोकार्बन इकाई ने अपने परीक्षण में पाया था कि इन कंकालों की उम्र लगभग 850 ई. है। वहीं, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एडओइन हारनी के अनुसार “नेचर कम्युनिकेशंस” में प्रकाशित नया अध्ययन अब तक का सबसे बड़ा और पूरी तरीके से वैज्ञानिक अध्ययन है। फिर भी इससे यह जवाब नहीं मिलता कि अलग-अलग समय पर रूपकुंड के पास लोग क्यों गए और फिर इनकी मृत्यु का कारण क्या है। कुछ भी हो इतना तो तय है कि रूपकुंड अपने में बहुत सारे रहस्य समेटे हुए है और जबतक इन रहस्यों से पर्दा नहीं हटता तब तक इसे पूरी तरीके से संरक्षित रखने की आवश्यकता है।

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