राष्ट्रीय पुरस्कार: क्या अनुभव सिन्हा को सत्ता से असहमति की कीमत चुकानी पड़ी!

फिल्म इंडस्ट्री में बहुत सारे लोग ऐसा सोचते हैं कि अनुभव सिन्हा को सरकारी नीतियों का आलोचक होने की कीमत चुकानी पड़ी है। सन 2019 में उनकी बहुत ही शानदार राजनीतिक फिल्म ‘आर्टिकल 15’ प्रदर्शित हुई थी।

फोटो: फिल्म पोस्टर
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सुभाष के झा

फिल्म इंडस्ट्री में बहुत सारे लोग ऐसा सोचते हैं कि अनुभव सिन्हा को सरकारी नीतियों का आलोचक होने की कीमत चुकानी पड़ी है। सन 2019 में उनकी बहुत ही शानदार राजनीतिक फिल्म ‘आर्टिकल 15’ प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म को उस वर्ष की सबसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म माना गया था। लेकिन जब राष्ट्रीय पुरस्कार देने की बारी आई तो नितेश तिवारी के निर्देशन में विद्यार्थियों के जीवन पर बनी एक साधारण-सी फिल्म ‘छिछोरे’ को ‘आर्टिकल 15’ की जगह चुन लिया गया।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि ‘छिछोरे’ को चुनने के लिए सुशांत सिंह राजपूत की दुखद मृत्यु के कारण प्राप्त सिम्पथी वोट (सहानुभूति मत) ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई होगी। लेकिन दोनों फिल्मों के बीच में गुणात्मक फर्क इतना ज्यादा है कि उनमें आपस में कोई प्रतिस्पर्द्धा हो ही नहीं सकती। बिल्कुल भी नहीं।

जूरी के प्रमुख एन. चंद्रा ने बीते 12 वर्षों में एक भी फिल्म नहीं बनाई है। मैंने उनसे संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने प्रतिक्रिया देना उचित नहीं समझा। अनुभव सिन्हा इस बात को हंसी में उड़ा देते हैं। लेकिन उनके एक करीबी मित्र ने कहा, “जाहिर है कि क्राइटेरिया मैरिट नहीं बल्कि कुछ और है। आप पुरस्कार जीतने वालों की पूरी सूची को ध्यान से देखें, तो आपको समझ में आ जाएगा कि मैं क्या कहना चाहता हूं। इसमें कोई संदेह ही नहीं है 2019 में आई ‘आर्टिकल 15’ न केवल हिंदी में बल्कि भारतीय भाषाओं कीअन्य फिल्मों में भी उस वर्ष की सबसे बेहतरीन फिल्म थी। इसका सम्मान नहीं करना ऐसे ही है जैसे ‘पाकीजा’ के दौर में सर्वश्रेष्ठ संगीत का पुरस्कार ‘बेइमान’ नामक फिल्म को दे दिया जाए। यह 1972 में फिल्मफेयर अवार्ड के साथ सच में हुआ था।”

एक शब्द में कहा जाए तो ‘आर्टिकल 15’ फिल्म आपको मंत्रमुग्ध कर देती है। इस फिल्म में वह सब कुछ है जिसके लिए हमेशा से सिनेमा जाना जाता है। यह आपके अंदर गुस्सा पैदा करती है, प्रश्न पूछती है, आपको परेशान करती है और अंततः आपके भीतर के सारे भाव बाहर निकालकर आपका भाव-शुद्धिकरण कर देती है क्योंकि जो पुलिसवाला नायक है, वह पीड़ित को न्याय दिलाने में सफल हो जाता है। इसकी भूमिका आयुष्मान खुराना ने बहुत हीगहराई और प्रतिभा के साथ निभाई है।

मैं ऐसा जरूर कहूंगा कि ‘मुल्क’ फिल्म के बाद अनुभव सिन्हा के सिनेमा ने जिस स्तर की राजनीतिक विश्वसनीयता और सामाजिक अंतर्विवेकशीलता हासिल की है, वह बेमिसाल है। ‘आर्टिकल 15’ तो उस सत्य की खोज में ‘मुल्क’ से भी आगे निकल जाती है जो निष्पक्षता और सब के लिए न्याय के दिखावे के नीचे दबा होता है।

अनुभव सिन्हा की इस अद्भुत और विलक्षण फिल्म के पास हिंदी पट्टी में सामाजिक भेदभाव के बारे में कहने के लिए इतना कुछ है कि जिसको हम वास्तव में सुनना भी नहीं चाहेंगे। ‘आर्टिकल 15’ हमें उत्तर प्रदेश के एकधूल-धूसरित छोटे से कस्बे में ले जाती है जहां एक प्रबुद्ध और उदार पुलिसवाला (आयुष्मान खुराना) ड्यूटी जॉइन करता है और एकदम से उसका सामना एक दिल दहला देने वाले जातीय अपराध से होता है, जहां दो लड़कियों का सामूहिक बलात्कार करके उन्हें पेड़ से लटका दिया जाता है और तीसरी लड़की गायब होती है।

सिन्हा उस तीसरी लड़की की खोज में ‘थ्रिलर’ डालते हैं लेकिन फिर भी फिल्म के निरंतर गहन उदास मूड को किसी भी प्रकार से अतिरंजित नहीं करते। निर्देशक फिल्म की पृष्ठभूमि में भी कहीं कोई गीत नहीं चलाते क्योंकि फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है जिस पर गीत गाया जाए। फिल्म में पिच और टोन का प्रयोग असाधारण कौशल के साथ किया गया है। हालांकि फिल्म की पृष्ठभूमि में हिसाब-किताब थोड़ा चमकदार है लेकिन अनुभव सिन्हा कभी भी ड्रामा में बहुत अवरोध पैदा नहीं करते। वह सबके सामने अपने द्वारा रचित उस दुनिया को लाने से नहीं डरते हैं जिसमें अमानवीय व्यवहार की भी झलक हो।

‘आर्टिकल 15’ ऐसी फिल्म है जिसे हर भारतीय को देखना चाहिए। इसलिए नहीं कि यह कुछ नया बताती है बल्कि इसलिए कि जो यह बताती है, वह अब तक हमारे समाज के लिए अप्रासंगिक हो जाना चाहिए। लेकिन दमन, इस पर बनी फिल्मों की तरह, तब लौट आता है जब हम सोचते हैं कि यह समाप्त हो चुका है।

एक समय पर नायक यह स्वीकार करता है कि उसको सारी गड़बड़ी को “ठीक” करने की जरूरत है, वह गड़बड़ी जो सामाजिक भेदभाव के कारण पैदा हुई है। यह दुनिया गरीब/बहुत ही कम आय वाले स्त्री और पुरुषों के लिए बहुत ही घातक और बुरी है। अनुभव सिन्हा अमीरों और गरीबों के बीच इस बहस को पूरीतरह से उघाड़ कर सामने रख देते हैं और यह कोई कम बड़ी बात नहीं है। निर्देशक अभिवादन के पात्र हैं क्योंकि आत्मप्रशंसा के बिना उन्होंने सामाजिक जागरूकता से लैस इस सिनेमा को पर्दे पर उतार दिया।

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