मृणाल पांडे का लेख: बिहार में एनडीए की नूराकुश्ती और वादों के इंद्रजाल समेत मास्क लगाकर जादूगर गायब

बाढ़, महामारी, बेरोजगारी और दोहरे विस्थापन से जूझते बिहार के असली मुद्दों पर अब तक कहीं कोई संवेदनशील विमर्श सामने नहीं आया है। कहने को तो कई हजार करोड़ का सरकारी पैकेज घोषित किया गया है लेकिन उसका हुआ क्या, यह ठीक-ठीक कोई नहीं जानता।

संडे नवजीवन
संडे नवजीवन
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मृणाल पाण्डे

बिहार में चुनावों से पहले गठजोड़ ऐसे बनते-बिगड़ते हैं जैसे मुहल्ले के मल्टीप्लेक्स में हर शुक्रवार को नई फिल्में आती-जाती हैं। फिर भी इस बार एनडीए बनाम विपक्षी गठजोड़+एलजेपी के मुकाबले की कुछ अधुना अचर्चित बातें हैं। पहली बात, एनडीए की शक्ल एक ऐसे संपूर्ण मर्दाना दल की है जो लड़ेंगे नीतीश, पर उसकी ध्वजा पर प्रधानमंत्री हैं। दो: एक बड़ी तादाद में संघ की अक्षौहिणी के नेता विस्मयकारी तरीके से बगावती का बिल्ला लगा कर विपक्षी एलजेपी के टिकट ले रहे हैं। किंतु वे और उनके चेले-चंपू मीडिया पर जय श्रीराम के नारे लगा कर ‘केंद्र में तौ बिस्व के सर्वश्रेषठ परधान मंतरी हमारे नरेंद्र जी मोदी ही विराजित होंगे,’ के द्विअर्थी डायलॉग भी बोल रहे हैं। तीन: चुनावों की तारीखों का ऐलान होने तक एलजेपी के वरिष्ठ संस्थापक और केंद्रीय गठजोड़ के ठोस खंभे रामविलास पासवान जी अचानक गठजोड़ से अलग होकर सांघातिक रूप से बीमार होकर रोग शैया पर आ गए थे। उनके उत्तराधिकारी एलजेपी के शिखर नेता चिराग पासवान ने अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ ठोस मोर्चा खोल दिया है। साथ ही पासवान जूनियर ठेठ फिल्मी अंदाज में नीतीश निंदा के साथ बीजेपी के शिखर नेता मोदी सीनियर की तारीफ में कसीदे पढ़ना भी नहीं भूलते।

इस सारे घटनाक्रम से गुजरते हुए कई बार लगता है, जैसे कि एक जटिल जादूगरी के बीच कोई जादूगर अपने इंद्रजाल को अधकिया छोड़ कर यकायक थियेटर में आस्तीन से झांकते रूमाल, जादू का डंडा, टोप से बाहर निकलते कबूतर, आरी से कटी लड़की सब चित्रवत् फ्रीज कर उनके साथ अलोप हो गया हो। कोई कहता होगा, यह नूरा कुश्ती है, भीतर खाने एलजेपी, बीजेपी, जेडीयू सब मिले हुए हैं। दूसरा बोलेगा, ये बीजेपी के चाणक्य की चाल है कि खाये-खेले भाजपाई वोटकटुओं को एलजेपी में भीतर घुसा कर नीतीश का आधार पोला कर दो। कतिपय गुणीजन फिर भी अड़े रहेंगे कि नीतीश को कम करके न आंका जाए। वह उस्तादों के भी उस्ताद हैं। अंत समय ऐसा खेला करेंगे कि अंतिम बाजी उनके हाथ में होगी। जादूगर गायब रहेगा!

इस लेखिका को इस सबसे कहीं ज्यादा स्तब्धकारी बात यह लगती है कि इस सारे प्रकरण में बाढ़, महामारी, बेरोजगारी, भूख और दोहरे विस्थापन से जूझते बिहार के असली मुद्दों पर किसी गठजोड़ के बीच अब तक कहीं कोई संवेदनशील विमर्श या परामर्श सामने नहीं आया। कहने को जनता को उबारने के लिए कई हजार करोड़ का सरकारी पैकेज केंद्रीय वित्त मंत्राणी जी ने घोषित किया है लेकिन उसका निर्वहन किस तरह किस सरकारी मशीनरी द्वारा होगा, यह ठीक-ठीक कोई नहीं जानता। मार्च के ताबड़तोड़ टोटल लॉकडाउन के तुरंत बाद मरता क्या न करता की दशा में बिहार के 23 लाख प्रवासी मजदूर दिल्ली, कोलकाता, पंजाब, चेन्नै, सूरत और बेंगलुरु जैसे महानगरों से वापिस बिहार लौटने को मजबूर हुए। इनमें से अधिकतर 20-35 की उम्र के मेहनतकश युवा थे जिनकी कमाई से संसाधन शून्य बिहार में उनके परिवार के परिवार पलते रहे रहे थे। जून, 2020 तक 32 लाख प्रवासी वापिस बिहार लौट आए जिनके मतदाताओं के लिए चुनाव आयोग ने साढ़े छ: लाख नए वोटर कार्ड जारी किए हैं। इन नए वोटरों में से लगभग 3 लाख पुनर्विस्थापित युवा हैं जिनके मत का बड़ा महत्व होगा। लेकिन इनमें से अधिकतर को बिहार ही नहीं, सारे देश में कांग्रेसी सरकार की मनरेगा (अब नरेगा) योजना का ही आसरा है। अप्रैल से अगस्त के बीच नरेगा के लिए देश भर में कुल 83 लाख से अधिक नए रोजगार कार्ड जारी हुए जिनमें से 11 लाख से ऊपर सिर्फ बिहार में थे।

2014 में विजय गर्व से छलकती बीजेपी ने मनरेगा की भरपूर निंदा और उपेक्षा की थी। कुछ समय तक मनमोहन सरकार की आर्थिक नीतियों की पुन्याई वे भुनाते चले। 2014 के बाद ग्रामोन्मुख विकास की जगह नया नारा बना कि नया भारत, नया विकास सब महानगरों में नई प्रौद्योगिकी तथा सेवा क्षेत्र से बनेगा। खेती या नरेगा उपेक्षित रहे। पर नोटबंदी, तालाबंदी और हड़बड़ाहट में लागू हुए जीएसटी ने जब भारी छंटनियां कर अर्थव्यवस्था का फालूदा बना दिया और सेवा क्षेत्र को कोविड का ग्रहण खा गया, तब सरकार तथा बेरोजगारों को एक साथ गांव का कृषि उद्योग याद आया जो लगातार देश का सबसे बड़ा रोजगार दाता है और रहेगा। जब ‘अच्छे दिन’ और हर अकाउंट में पंद्रह लाख के वादों का इंद्रजाल सहित जादूगर मास्क लगा कर अलोप हो गया, तब युवा भीड़ दोबारा गांवों की तरफ उमड़ पड़ी कि अपना मारेगा भी तो छांव में ही गेरेगा।

पर गांव आए बेरोजगारों का साबिका एक और कड़वी सच्चाई से हुआ है कि सुशासन बाबू के राज में भी ग्राम या ब्लॉक स्तर की मशीनरी इतनी बड़ी तादाद में नरेगा कामगारों को समय पर वेतन देने में असमर्थ है। मीडिया पर विज्ञापनों की मार्फत जानकारी कि गरीबों के लिए भोजन, काम का प्रबंध करने केंद्र से रुपये बंटने को भेजे गए हैं, जनता को उतनी ही बासी लगती है, जितना वह गाना कि वो सुबह कभी तो आएगी। बिहार में गरीबों-अनाथों के नाम का पैसा कब कहां किसे मिलता है, यह मुजफ्फरपुर जिले के कन्या गृह की 36 लड़कियों के साथ नाना कुकृत्यों ने जता दिया। यह भी जनता के लिए शोध का नहीं सहज बोध का विषय है कि ‘जो भी हो, जिले में उनका बड़ा रसूख है,’ कह कर उस मामले में लिप्त महिला को इस बार भी टिकट दे दिया गया है। इसके बाद विपक्षी दलों के पंद्रह-बीस साल पहले के कुशासन का हवाला देकर अपने शासन को सुशासन ठहराना कैसी राजनीति है?

जनसंख्या बहुल बिहार में गरीबों के बीच श्रम प्रवास की लंबी परंपरा रही है। 1857 के विद्रोह के बाद बिहार असम, कोलकाता, मुंबई, पंजाब तक के उपक्रमियों, बड़े किसानों के लिए सस्ते लेबर का पर्याय ही बना रहा है; हरित क्रांति, नए स्थानीय रोजगार और उद्योग का नहीं। प्रवास के इतिहास ने बिहार की जिजीविषा को जीवन संघर्ष से न डरने और निरंतर नया हुनर आत्मसात करने की अपार क्षमता दी, पर साथ ही उसके तेवर तथा आचार-व्यवहारों को स्थायी शंकालु तेवर और गोपनीयता बख्श दी। उसका मन गांधी या जेपी के अलावा कोई नहीं थाह पाया। शायद चाहता भी नहीं।

इस बार दो बातें मनन लायक हैं: एक, इन चुनावों में मोदी+नीतीशनीत सत्तापक्ष के पास सत्ता है, कड़क पुरुषसत्ताक छवि है, बेपनाह पैसा है। पर एनडीए का अश्वमेध अश्व थामने को सामने खड़े विपक्ष के तीनों बडे नेता राहुल, तेजस्वी और चिराग अनब्याहे और पिता से वंचित युवाओं के पास मां है! ये तीनों माताएं नेपथ्य में होती हुई भी उनके राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण कारक तत्व हैं और रहेंगी। इससे दूसरी बात जोड़िए, पलायन और वापसी के लंबे चक्र ने बिहार की जनता को राजनीति पर दबंग बहस करना सिखाया है, पर उसका फैसला तात्कालिक राजनीति से निरपेक्ष, और सूबे के पिछले 200 बरस पुराने सामाजिक विधि-नियमों और जाति विभाजनों से ही निकलता है जो पुरुषों के लंबे प्रवास के कारण महिलाएं ही थामे और संवारे रही हैं। इसलिए यहां का महिला वोट भी दब्बू नहीं। नवरात्रि पर आज भी धूमधाम से दुर्गा पूजक बिहार मां दुर्गा की तरह चुनाव का युद्ध हिंसक और उच्छृंखल गुरिल्ला मोड़ में लड़ता है। यहां के जातिवादी करेले पर भी मंडल की राजनीति ने नीम का काम किया है और समाज के जातिगत विभाजनों तथा कबीलाई स्वामिभक्तियों को और भी पुष्ट और नई उपशाखाओं वाला बनाया है। सो, भर झोली पैसा उलीच कर भी बिहार का मन थाहना आसान नहीं।

ऊपर से दबंग, भीतर से मातृसत्ताक बिहार की रीति- नीति का उपहास मत कीजिए। आज का बिहार किसी एक समाज या प्रदेश का नाम नहीं। वह उस हवा, उस देसी परंपरा का आत्यंतिक रूप है जो ब्रिटेन से लाकर रोपी गई लोकतांत्रिक व्यवस्था और संविधान के नीचे कोविड के जरासीम की तरह दबी हुई थी। और अब सतह पर आ गई है। परंपरा तथा प्रयोग के बीच भारत दैट इज इंडिया का जो रूप पिछले तिहत्तर सालों में बना है, उसी का ट्रेलर बिहार चुनाव हम को दिखा रहा है।

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