नेहा के 'यूपी में का बा' से खूब मिर्ची लग रही सत्तापक्ष को, पूर्वी यूपी में तो धूम मची है इस भोजपुरी गीत की

नेहा राठौर के गीत बीजेपी को चुभ रहे हैं। और इसकी वजह भी है। उन्होंने कभी किसी पार्टी के पक्ष में प्रचार नहीं किया है और सिर्फ व्यवस्था पर सवाल उठाती हैं। उनका मानना ही है कि जनता से जुड़ा कोई भी रचनाकार सत्ता से ही सवाल करेगा।

फोटो: सोशल मीडिया
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दिवाकर

नेहा सिंह राठौर ‘यूपी में का बा’ रैप सॉन्ग के जरिये पोल क्या खोल रहीं, उनकी ट्रॉलिंग इस माफिक हो रही है, मानो बीजेपी के मुकाबले वही चुनाव मैदान में हैं। यह हाल तब है जबकि जब तक टेलीप्रॉम्पटर ने कलई नहीं खोली थी, माना जाता रहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तुरत-फुरत तैयार व्यंग्योक्तियों में माहिर हैं।

बीजेपी चुनावों के वक्त ऐसा कर कहीं अपने ही पैर पर तो कुल्हाड़ी नहीं मार रही? जवाब में तमाम तरह के ‘योगी-मोदी समर्थक गीत’ रचकर ट्रॉल आर्मी नेहा के गीतों और उसकी बातों के प्रति उत्सुकता ही बढ़ा रहे हैं। नेहा प्रकरण ने कई बातें एक साथ सामने ला दी हैं। पहले भी शक नहीं था कि वैसे लोग क्या खाकर रचना करेंगे जो भुगतान के आधार पर ही शब्द उगलते हैं। चुनावों में किसी गीत के इर्द-गिर्द ही बात आगे बढ़े, ऐसा इससे पहले तो नहीं दिखा जबकि चुनावों में प्रचार-प्रसार का सशक्त जरिया गीत पहले भी रहे ही हैं।

नेहा के गीत चुभने की वजह भी है। उन्होंने कभी किसी पार्टी के पक्ष में प्रचार नहीं किया है और सिर्फ व्यवस्था पर सवाल उठाती हैं। उनका मानना ही है कि जनता से जुड़ा कोई भी रचनाकार सत्ता से ही सवाल करेगा। नेहा के इस लगभग पहले गीत ने ही काफी ध्यान खींचा था कि ‘रोजगार देबऽ कि करबा ड्रामा/ कुर्सिया तोहरा बाप का ना हो... (रोजगार दोगे या सिर्फ इसे देने के बारे में बोलते ही रहोगे? यह कुर्सी किसी की बपौती नहीं है।) अभी बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान गाए गीत ‘बिहार में का बा’ से वह एक तरह से लाइमलाइट में आईं। वैसे, ‘बिहार में का बा’ गीत से पहले मनोज वाजपेयी का रैप सॉन्ग ‘मुंबई में का बा’ अच्छा-खासा लोकप्रिय हुआ था।

एक निजी कंपनी में आर्किटेक्ट रमेश सिंह की बेटी नेहा बिहार में कैमूर जिले के एक गांव की हैं। वह गांव में ही रहती हैं। उन्होंने कानपुर विश्वविद्यालय से दो साल पहले ही बीएससी की है जिसका उन्हें अफसोस भी है कि ‘संगीत वगैरह से किया होता, तो बेहतर होता’। वैसे, यह राजनीतिज्ञों के लिए परेशान करने वाली बात हो सकती है कि हाल के वर्षों में उनके बयानों से अधिक रचनाएं, खास तौर से कविताएं लोगों के दिलों में सीधे अपील कर रही हैं। चाहे वीर दास की कविता ‘टू इंडियाज’ हो या भजन लिखते-गाते अचानक जब गुजराती कवयित्री पारुल खक्कर ने पिछले साल यह लिखा, तो सबने हाथों हाथ लिया कि ‘एक साथ सब मुर्दे बोले ‘सब कुछ चंगा-चंगा/साहेब, तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा/ ख़त्म हुए श्मशान तुम्हारे, ख़त्म काष्ठकी बोरी/ थके हमारे कंधे सारे, आंखें रह गई कोरी।’


लखनऊ में इप्टा के राकेश कहते भी हैं कि ‘आजादी के आंदोलन से लेकर हाल के आंदोलनों तक यह बात देखने में रही है कि गीत-नाटक किस तरह लोगों को प्रेरित करते हैं।’ इसका ताजा उदाहरण तो सीएए-एनआरसी आंदोलन के दौरान बार-बार नए रूप में खूब गाया जाने वाला यही गीत हैः ‘हमें चाहिए आजादी’। वृहद राजनीतिक प्रभाव छोड़ने वाली रचनाएं 1970 के दशक में भी काफी लिखी गई थीं। बाबा नागार्जुन, फणीश्वरनाथ रेणु आदि के नेतृत्व में 1974 आंदोलन के दौरान नुक्कड़ कविताओं का दौर ही चल पड़ा था।

उस दौरान चर्चित रहे कवि सत्य नारायण आज की स्थितियों और कविताओं पर तो नहीं बोलते लेकिन उन्हें लगता है कि ‘रचनाएं तो लिखी गईं लेकिन शायद उसके बाद रचनाकारों ने उस किस्म का टीम वर्क नहीं किया जिसका समाज पर वृहत्तर असर होता।’ इसके पूर्व और बाद के आंदोलनों में भी गीत बातें कहने का सशक्त माध्यम रहे हैं।

अकेले नेहा के गीत ने उसी तरह चेतना, खास तौर से राजनीतिक वातावरण को हिलोर दिया है। सांसद रवि किशन के गीत ‘जे कब्बोना रहे, यूपी में सब बा’ या सांसद मनोज तिवारी के गीत ‘मंदिर अब बनने लगा है, भगवा रंग चढ़ने लगा है’ पर तो यह भारी पड़ ही रहा है। और नेहा को इन गीतों के पैसे के लिए किसी का मुंह जोहने की जरूरत नहीं है। यूट्यूब पर उनका अपना चैनल है। और कमाई? उनके गीतों पर 10 से लेकर 15 लाख तक व्यूज मिल रहे हैं, मतलब यूट्यूब से उन्हें हर गीत पर लाखों रुपये की आमदनी भी हो रही है।

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