नेहरू बनाम मोदी: विरासत और विनाश की कहानी
आसान शब्दों में कहें, तो नेहरू को छोटा दिखाने की अंधी कोशिश में बीजेपी-आरएसएस अपने ही वैचारिक पूर्वजों को इतिहास से बाहर फेंक रही है। यह इतिहास का पुनर्लेखन नहीं, बल्कि इतिहास का खुला उपहास है।

आजकल बीजेपी-आरएसएस से जुड़े लोग बड़े उत्साह के साथ यह दावा कर रहे हैं कि नरेंद्र मोदी का निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल पंडित जवाहरलाल नेहरू से लंबा हो गया है। इस दावे को इस तरह पेश किया जा रहा है, जैसे देश ने कोई बड़ी उपलब्धि हासिल की हो। लेकिन इस तथाकथित उपलब्धि को दिखाने के लिए जो रास्ता अपनाया गया है, वह न सिर्फ बौद्धिक बेईमानी है, बल्कि उन्हीं नेताओं का भी अपमान है, जिनके नाम पर आज भाजपा अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंक रही है। यह रास्ता है - 15 अगस्त 1947 से 1952 तक की स्वतंत्र भारत की पहली सरकार को इतिहास के पन्नों से ही मिटा देना।
जब आप इतिहास के पन्नों से स्वतंत्र भारत की पहली सरकार को मिटाते हैं, तो उसके साथ-साथ आप सरदार वल्लभभाई पटेल को भी मिटाते हैं, जो उसी सरकार में देश के पहले गृह मंत्री थे। आप बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर को भी मिटाते हैं, जो उसी सरकार में 1947 से देश के पहले कानून मंत्री थे। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आप डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भी मिटाते हैं, जो जनसंघ के संस्थापक, बीजेपी के वैचारिक पितामह और उसी सरकार में 1947 से 1950 तक उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री थे।
आसान शब्दों में कहें, तो नेहरू को छोटा दिखाने की अंधी कोशिश में बीजेपी-आरएसएस अपने ही वैचारिक पूर्वजों को इतिहास से बाहर फेंक रही है। यह इतिहास का पुनर्लेखन नहीं, बल्कि इतिहास का खुला उपहास है। बीजेपी एक तरफ गुजरात में सरदार पटेल की 182 मीटर ऊँची प्रतिमा बनाती है, उनके नाम का इस्तेमाल करके राजनीति करती है, और दूसरी तरफ उस सरकार को ही अमान्य बता रही है, जिसमें सरदार पटेल ने अपनी अंतिम साँस तक देश की सेवा की। यह सरदार पटेल के योगदान और बलिदानों का अपमान है।
शून्य से आधुनिक भारत की नींव
असल सवाल यह नहीं है कि किसका कार्यकाल कितने दिन का रहा। असल सवाल यह है कि किसे कैसा भारत मिला और उसने उस भारत के साथ क्या किया। 15 अगस्त 1947 को जब पंडित नेहरू ने प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली, तो उनके सामने जो भारत था, वह 200 साल की अंग्रेजों की लूट, शोषण और आर्थिक विनाश का भयावह परिणाम था। देश का खजाना खाली था, अनाज के भंडार रिक्त थे, पीने के पानी के नाम पर सिर्फ नदियाँ और तालाब थे, और हर साल लाखों लोग भूख तथा बीमारी से दम तोड़ते थे।
उस दौर के आँकड़े देखें, तो रूह काँप जाती है। देश की साक्षरता दर महज 12 प्रतिशत थी, यानी 100 में से 88 लोग पढ़-लिख भी नहीं सकते थे। औसत आयु लगभग 32 वर्ष थी, जबकि आज 32 साल की उम्र में लोग अपने करियर की शुरुआत मानते हैं। शिशु मृत्यु दर प्रति 1000 जीवित जन्म पर 218 थी। प्रति व्यक्ति आय महज 274 रुपये सालाना थी। खाद्यान्न उत्पादन केवल 5 करोड़ टन था, जबकि 35 करोड़ की आबादी भूख से जूझ रही थी। बिजली उत्पादन क्षमता पूरे देश के लिए मात्र 1,362 मेगावाट थी। कृषि योग्य भूमि के मुश्किल से 17 प्रतिशत हिस्से में ही सिंचाई की सुविधा थी। देश में कोई बड़ा उद्योग नहीं था, कोई विकसित औद्योगिक ढाँचा नहीं था और न ही उल्लेखनीय निर्यात क्षमता थी।
इसके ऊपर विभाजन की मार से 1.5 करोड़ से अधिक लोगों के घर उजड़ चुके थे। लाखों निर्दोष लोग सांप्रदायिक हिंसा में मारे जा चुके थे और 560 से अधिक रियासतें अलग-अलग राजाओं के अधीन थीं, जिन्हें एक सूत्र में पिरोना अभी बाकी था। यह वह भारत था, जो नेहरू को मिला था, एक लुटा हुआ, टूटा हुआ और भूखा देश, जिसे लगभग शून्य से खड़ा करना था।
नेहरू ने हर संकट को कैसे हराया
इस टूटे-बिखरे भारत में नेहरू ने जो काम किया वो आज भी इस देश की असली पहचान है। भुखमरी से लडने के लिए उन्होंने बड़े बाँधों और सिंचाई परियोजनाओं को राष्ट्र निर्माण की प्राथमिकता बनाया। भखड़ा-नाँगल बाँध 1963 में पूरा हुआ जिससे 10 लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि को सिंचाई मिली और पंजाब, हरियाण तथा राजस्थान की कृषि अर्थव्यवस्था की काया पलट गई। हीराकुंड बाँध 1957 में तैयार हुआ जिसने ओडिशा में बाढ़ नियंत्रण और सिंचाई दोनों समस्याओं का समाधान किया। दामोदर वैली कॉर्पोरेशन ने बिहार और बंगाल की लाखों एकड़ जमीन को सींचा। इन प्रयासों का परिणाम यह रहा कि सिचाई क्षमता 17 प्रतिशत से बढ़कर 35 प्रतिशत हो गई और खद्यान्न उत्पादन 5 करोड़ टन से बढ़कर 8.9 करोड़ टन पहुँच गया।
शिक्षा के मोर्चे पर नेहरू ने एक दूरदर्शी सोच के साथ काम किया। उन्हें समझ में आ गया था कि देश तभी आत्मनिर्भर बनेगा जब उसके पास अपने इंजीनियर, अपने डॉक्टर और अपने वैज्ञानिक होंगे। 1951 में IIT खड़गपुर की स्थापना से शुरुआत हुई, जो फिर IIT बॉम्बे 1958 में, IIT मद्रास और IIT कानपुर 1959 में तथा IIT दिल्ली 1961 में स्थापित किए गए। AIIMS दिल्ली 1956 में बना जो आज भी एशिया के सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा संस्थानों में गिना जाता है। IIM कोलकाता और IIM अहमदाबाद 1961 में खुले। UGC 1956 में गठित किया गया जिसने पूरे देश में उच्च शिक्षा को एक ठोस और व्यवस्थित ढाँचा दिया।
आज़ादी से पहले जहां देश में सिर्फ 20 विश्वविद्यालय थे, नेहरू के कार्यकाल के आखिर तक यह संख्या 53 से ज्यादा हो गई थी। स्कूलों की संख्या तीन गुना से भी ज्यादा बढ़ी और साक्षरता दर 12 प्रतिशत से बढ़कर 28 प्रतिशत पहुँच गई।
उद्योग और अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर नेहरू ने सार्वजनिक क्षेत्र को देश की मजबूत रीढ़ बनाया। उनकी सोच बिल्कुल साफ थी कि जब देश में निजी पूंजी नहीं है तो सरकार को ही उद्योग खड़े करने होंगे, क्योंकि जनता की बुनियादी जरूरतें बाजार की मनमानी के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकतीं। भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर के तीन विशाल इस्पात संयंत्र नेहरू के कार्यकाल में बने जिन्होंने भारत में आधुनिक इस्पात उत्पादन की ठोस नींव रखी। भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड यानी BHEL 1964 में स्थापित हुई जो आज भी देश की सबसे बड़ी और सम्मानित इंजीनियरिंग कंपनियों में से एक है।
ONGC 1956 में बनाई गई जिसने भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में पहला बड़ा कदम उठाया। बिजली उत्पादन 1,362 मेगावाट से बढ़कर 10,000 मेगावाट से अधिक हो गया यानी सात गुना से भी ज्यादा की ऐतिहासिक वृद्धि हुई।
विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में नेहरू की दूरदृष्टि आज भी हमें उसके फल दे रही है। परमाणु ऊर्जा आयोग 1948 में ही स्थापित कर दिया गया था। होमी जहाँगीर भाभा को पूरा सरकारी समर्थन दिया गया और भारत का पहला परमाणु रिएक्टर अप्सरा 1956 में ही कायाशील हो गया। DRDO 1958 में बना, विक्रम साराभाई के नेतृत्व में भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की बुनियाद उसी दौर में रखी गई जिस पर आगे चलकर ISRO की विशाल इमारत खड़ी हुई। आज जब भारत का चद्रयान चाँद की सतह पर उतरता है और मंगलयान मंगल की कक्ष में पहुँचता है तो उस गौरव की जड़ें नेहरू के उस दौर में हैं जब भारत के पास कुछ भी नहीं था।
सामाजिक न्याय के मोर्चे पर भी नेहरू का बड़ा योगदान है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था लागू हुई। जमींदारी उन्मूलन अधिनियमों के जरिए करोड़ों किसानों को जमीन मिली और सदियों पुरानी सामंती व्यवस्था की जड़ें हला दी गईं। 17 करोड़ मतदाताओं की सूची तैयार करके 1951-52 में स्वतंत्र भारत का पहला आम चुनाव कराया गया और सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को व्यावहारिक रूप दिया गया।
मोदी सरकार: नेहरू की विरासत पर व्यवस्थित हमला
आज सबसे जरूरी और कड़वा सवाल यह है कि नेहरू ने जो मजबूत इमारत खड़ी की, मोदी सरकार ने उसके साथ क्या किया। मोदी सरकार को नेहरू की तुलना में कहीं बेहतर परिस्थितियों में सत्ता मिली थी। एक स्थापित और जीवंत लोकतंत्र था, एक मजबूत संवैधानिक ढाँचा था, विश्वस्तरीय संस्थान थे, बेहतर तकनीक थी और वैश्विक मंच पर भारत की एक सम्मानित पहचान थी। लेकिन 12 वर्षों के शासन के बाद भी देश आज बुनियादी सवालों के जवाब तलाश रहा है।
नेहरू ने जो सार्वजनिक क्षेत्र खड़ा किया था, उसका उद्देश्य यह था कि देश की जनता की जरूरतें बाजार की मनमानी और मुनाफे की अंधी दौड़ से सुरक्षित रहें। मोदी सरकार ने उसी जनता की संपत्ति के व्यापक निजीकरण की नीति अपनाई। एयर इंडिया, जो भारत की अंतरराष्ट्रीय पहचान का प्रतीक थी, उसे टाटा समूह को बेच दिया गया। LIC, जो करोड़ों मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों की जीवनभर की बचत का एक महत्वपूर्ण सहारा रही है, उसे शेयर बाजार में सूचीबद्ध कर दिया गया। देश के प्रमुख बंदरगाह, हवाई अड्डे और राष्ट्रीय राजमार्ग निजी हाथों में सौंपे गए। BPCL जैसी तेल कंपनियों के निजीकरण की प्रक्रिया भी शुरू की गई। जो संसाधन और संपत्तियाँ जनता के खून-पसीने की कमाई से बनी थीं और जनता की सेवा के लिए थीं, वे धीरे-धीरे मुनाफा कमाने की व्यवस्था का हिस्सा बनती चली गईं। यह सीधे-सीधे नेहरू की उस बुनियादी सोच पर हमला है, जिसने इस देश को अपने पैरों पर खड़ा किया था।
शिक्षा के मोर्चे पर नेहरू ने IIT, AIIMS और IIM जैसे विश्वस्तरीय संस्थान स्थापित किए, जो आज भी दुनिया भर में भारत की बौद्धिक पहचान हैं। मोदी सरकार के दौर में NEET परीक्षा विवाद, CBSE में अनियमितताओं और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाओं ने शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े किए। देश के लाखों छात्रों ने वर्षों तक मेहनत करके अपने और अपने परिवारों के सपने सँजोए, लेकिन जब परीक्षा की निष्पक्षता पर ही सवाल उठने लगें, तो यह केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं रह जाती, बल्कि लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़ा मुद्दा बन जाती है।
विश्वविद्यालय केवल शिक्षा प्राप्त करने के केंद्र नहीं होते, बल्कि वे संवाद, विचार-विमर्श, आलोचनात्मक सोच और लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के भी मंच होते हैं। यहीं से वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तार्किकता और नए विचारों का विकास होता है। आलोचकों का आरोप है कि विश्वविद्यालयों में वैचारिक हस्तक्षेप बढ़ा है और शैक्षणिक स्वायत्तता कमजोर हुई है। उनका मानना है कि इससे स्वतंत्र चिंतन और असहमति की संस्कृति प्रभावित हुई है, जो किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए आवश्यक है।
आरक्षण के मोर्चे पर नेहरू और आंबेडकर द्वारा स्थापित व्यवस्था को भी आलोचकों के अनुसार अप्रत्यक्ष रूप से कमजोर किया गया। निजीकरण के कारण सरकारी क्षेत्र लगातार सिकुड़ता गया और चूँकि निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू नहीं होता, इसलिए अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए उपलब्ध अवसरों में भी कमी आई। इसके अतिरिक्त, “Not Found Suitable” जैसे कारणों का हवाला देकर आरक्षित पदों को लंबे समय तक खाली रखे जाने के आरोप भी लगते रहे हैं।
देश में बुलडोजर कार्रवाई को लेकर भी व्यापक बहस देखने को मिली। आलोचकों का कहना है कि कई मामलों में उचित कानूनी प्रक्रिया पूरी किए बिना घरों और दुकानों पर बुलडोजर चलाए गए। उनका तर्क है कि यह संविधान और विधि के शासन की भावना के विपरीत है। इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट ने भी कई अवसरों पर सरकारों को कानूनी प्रक्रिया का पालन करने की याद दिलाई है। सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों का आरोप है कि इस तरह की कार्रवाइयों ने समाज के कुछ वर्गों में असुरक्षा की भावना को बढ़ाया है।
विदेश नीति के क्षेत्र में नेहरू ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और भारत को एक स्वतंत्र तथा आत्मसम्मानी वैश्विक आवाज प्रदान की। मोदी सरकार के कार्यकाल में भारत ने कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराई है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि पड़ोसी देशों के साथ संबंधों में कुछ चुनौतियाँ भी उभरी हैं। गलवान घाटी की घटना में भारतीय सैनिकों की शहादत ने चीन के साथ संबंधों को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े किए। नेपाल, मालदीव और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों के साथ समय-समय पर उत्पन्न तनाव को भी इसी संदर्भ में देखा जाता है।
आर्थिक मोर्चे पर सरकारी कर्ज बढ़ता रहा। बेरोजगारी, महंगाई और किसानों की समस्याएँ लगातार सार्वजनिक चर्चा का विषय बनी रहीं। कृषि और व्यापार से जुड़ी कई नीतियों को लेकर किसान संगठनों ने अपनी चिंताएँ व्यक्त कीं और कई बार बड़े आंदोलन भी हुए। 8 नवंबर 2016 की रात घोषित नोटबंदी का फैसला स्वतंत्र भारत के सबसे चर्चित आर्थिक निर्णयों में से एक रहा। सरकार ने इसके पीछे काले धन, नकली नोटों और आतंकवाद पर अंकुश लगाने जैसे उद्देश्य बताए थे। हालांकि आलोचकों का कहना है कि इस फैसले का सबसे बड़ा बोझ गरीबों, मजदूरों, किसानों और छोटे व्यापारियों ने उठाया। बैंकों के बाहर लंबी कतारें लगीं और आर्थिक गतिविधियों पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ा। बाद में भारतीय रिजर्व बैंक की रिपोर्ट में यह सामने आया कि अधिकांश प्रतिबंधित मुद्रा बैंकिंग प्रणाली में वापस लौट आई थी।
जब कोविड-19 महामारी आई, तब देश ने कई दर्दनाक दृश्य देखे। अचानक लगाए गए लॉकडाउन के कारण लाखों प्रवासी मजदूर अपने घरों की ओर पैदल लौटने को मजबूर हुए। रेल की पटरियों पर बिखरी रोटियाँ और सड़कों पर चलते परिवार उस दौर की पीड़ा का प्रतीक बन गईं। दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन की कमी, अस्पतालों पर बढ़ता दबाव और बड़ी संख्या में हुई मौतों ने सरकार की तैयारियों और स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए। यह आधुनिक भारत के इतिहास के सबसे कठिन मानवीय संकटों में से एक था।
मोदी सरकार को नेहरू की तुलना में कहीं बेहतर परिस्थितियों में देश की बागडोर मिली। एक स्थापित लोकतंत्र, मजबूत संस्थान, आधुनिक तकनीक और वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित पहचान पहले से मौजूद थी। इसके बावजूद, आलोचकों का तर्क है कि 12 वर्षों के शासन के बाद भी युवा रोजगार की तलाश में भटक रहा है, किसान बेहतर आय के लिए संघर्ष कर रहा है, महिलाएँ सुरक्षा की माँग कर रही हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं, सार्वजनिक संस्थानों के निजीकरण को लेकर बहस जारी है और संविधान की मूल भावना को चुनौती दिए जाने के आरोप लगते रहे हैं। जब इतने लंबे शासनकाल के बाद भी जनता अपने बुनियादी सवालों के जवाब तलाश रही हो, तो यह केवल उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी समय है।
नेहरू से वैचारिक असहमति हो सकती है। उनकी नीतियों की आलोचना की जा सकती है और लोकतंत्र में यह न केवल उचित है, बल्कि आवश्यक भी है। लेकिन स्वतंत्र भारत की पहली सरकार को इतिहास से ही मिटाने की कोशिश करना, जिसमें सरदार पटेल, डॉ. आंबेडकर, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और स्वतंत्रता के बाद देश की नींव रखने वाले अनेक नेता शामिल थे, इतिहास के साथ न्याय नहीं है। यह आलोचना नहीं, बल्कि राजनीतिक सुविधा के अनुसार इतिहास को देखने का प्रयास प्रतीत होता है।
इतिहास का न्याय चुनावी नारों, सोशल मीडिया अभियानों या सत्ता के प्रचार तंत्र से नहीं होता। इतिहास आखिर में इस सवाल का जवाब खोजता है कि किस नेता ने अपने समय की चुनौतियों का सामना कैसे किया, उसने राष्ट्र की संस्थाओं को कितना मजबूत किया, समाज को कितना व्यापक और समावेशी बनाया और आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसी संरचनात्मक विरासत छोड़ी।
राजनीतिक लोकप्रियता क्षणिक हो सकती है, लेकिन संस्थाएं, नीतियां और उनके दूरगामी परिणाम ही किसी नेतृत्व की वास्तविक ऐतिहासिक पहचान निर्मित करते हैं। यही कारण है कि इतिहास में कुछ व्यक्तित्व केवल अपने पद या कार्यकाल के कारण नहीं, बल्कि अपने द्वारा निर्मित राष्ट्रीय ढांचे के कारण स्मरण किए जाते हैं।
नेहरू का मूल्यांकन भी इसी कसौटी पर होना चाहिए। उनसे असहमति संभव है, उनकी नीतियों की आलोचना भी लोकतांत्रिक अधिकार है, किंतु यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि उन्होंने एक विभाजित, निर्धन और अविकसित राष्ट्र को आधुनिक लोकतांत्रिक गणराज्य में रूपांतरित करने की प्रक्रिया की आधारशिला रखी। आज भारत जिन विश्वविद्यालयों, वैज्ञानिक संस्थानों, सार्वजनिक उपक्रमों, संवैधानिक मूल्यों और लोकतांत्रिक परंपराओं पर गर्व करता है, उनमें नेहरू युग की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। इसलिए किसी भी समकालीन नेतृत्व की तुलना केवल कार्यकाल की अवधि से नहीं, बल्कि इस प्रश्न से की जानी चाहिए कि उसने राष्ट्र की संस्थागत क्षमता को कितना विस्तार दिया, लोकतंत्र को कितना सुदृढ़ किया और इतिहास को अपने बारे में क्या लिखने के लिए छोड़ा। अंततः राष्ट्र-निर्माण की विरासत ही इतिहास की सबसे कठोर और सबसे निष्पक्ष कसौटी होती है।
( लेखक NSUI सोशल मीडिया के नेशनल चेयरपर्सन रहे हैं)
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