मृणाल पांडे का लेख: कोरोना काल में नई शिक्षा सामाजिक विभाजन को दे रही बढ़ावा, कितना प्रासंगिक है डिजिटिल ‘ज्ञान’?

सरकारी स्कूल अभी भी पूरी तरह बंद हैं। कई प्रवासी परिवारों के छात्र अपने बेरोजगार अभिभावकों सहित गांव वापिस चले गए हैं। उनमें से कुछ सत्र के बीच आसपास के कस्बों की शालाओं में पढ़ने लगे थे कि वहां भी कोविड संक्रमण जा पहुंचा और अनियमित ताला बंदियां हो गईं।

फोटो: सोशल मीडिया
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मृणाल पाण्डे

अंग्रेजी के एक लेखक (जी.के.चेस्टरटन) के अनुसार, शिक्षा ही वह माध्यम है जिसकी मार्फत जाती हुई पीढ़ी, नई पीढ़ी में अपनी आत्माका प्रवेश करा जाती है। लेकिन विश्व महामारी से उबरते हुए भारत की शिक्षा संस्थाओं के जो हालात हैं, उनके बीच पुरानी पीढ़ी की आत्माका नई पीढ़ी में सहजता से उतर पाना असंभव लगता है। शैक्षणिक नहीं, राजनीतिक वजहों से बार-बार तब्दील की गई नीतियों की कृपा से इस समय हमारे मुल्क में शिक्षा की दो ट्रेनें समांतर लेकिन अलग पटरियों पर चल रही हैं- निजी और सरकारी। धुआं फेंकती सरकारी रेल में डब्बों की छतों और भीतर संडासों तक में भीड़ है, टिकट खरीदने से कंपार्टमेंट में घुसने और सीट हथियाने तक में ढेरों अनियमितताएं हैं। और यात्रियों के हाथों में सामान के नाम पर चंद गठरी-मुठरियां ही हैं। इसके समांतर चल रही अंग्रेजी माध्यम की निजी ट्रेनमें हर डब्बे के हर सीट होल्डर के लिए अंग्रेजी में अंकित सूचना पट्ट हैं, बैठने को समुचित सीटें और (अपेक्षया) साफ-सुथरे बाथरूम। कुछ ऐसी दामी टिकट वाली वातानुकूलित बोगियां भी इस अंग्रेजी ट्रेन में हैं जहां सिर्फ डिजिटल दुनिया से बचपन से जुड़े रहे छात्र अपने-अपने लैपटॉप, वीडियो गेम और स्मार्ट फोन सहित बैठते हैं।

अंग्रेजी माध्यम की ट्रेन का किराया अधिक होते हुए भी उसे बढ़िया रोजगार के दरवाजे खोलने वाला माना जाता है। इसीलिए फीस का येन-केन प्रबंध करके खुद सरकारी स्कूलों से पढ़े महत्वाकांक्षी शहरी मध्यवर्गीय लोग भी अपनी संतति को अब निजी ट्रेनमें ही बिठाते हैं। कॉलेज पहुंच कर उनकी संतति भी अपने को कुछ अधिक द्विज मानते और शेष समाज से सीमित सरोकार ही रखती है। मैकॉले की शिक्षा पद्धति जो सामाजिक विभाजन नहीं करा पाई थी, उसे कोविड की तालाबंदी के बाद से कंप्यूटरों, लैपटॉप, स्मार्ट एप्स और मैकबुक की मार्फत नेट से टीचर और छात्रों को जोड़ने वाली डिजिटल शिक्षा अब और तेजी से कर रही है। इसने एक वर्ग विशेष, और वर्ण विशेष के हितों- रुचियों पर केंद्रित भारतीय पब्लिक स्कूली शिक्षाकों, की मती डिजिटल उपकरणों से खींची जाने वाली एक नई वर्ण व्यवस्था में बदलना शुरू कर दिया है।

उपरोक्त बात का सबूत सरकार के शीर्ष शोध संस्थान नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस (एनएसओ) की शिक्षा पर ताजा रिपोर्ट (हाउस होल्ड कंजम्प्शन: एजुकेशन) है। इस रिपोर्ट ने शिक्षाविदों को नई डिजिटल पद्धतिकी (ऑनलाइन शिक्षा और क्लास में बेहतरीन उपकरणों से ही उपलब्ध) तालीम के मिलने से निजी स्कूलों के शहरी छात्रों के और गांवों के सरकारी स्कूलों में भारतीय भाषाओं में शिक्षा पाने वाले छात्रों के बीच दिनों दिन गहरी होती एक संगीन दरार बेबाकी से दिखाई है। रिपोर्ट के अनुसार, कोविड के कारण मार्च से बंद सभी सरकारी या निजी शिक्षा संस्थाएं और कॉलेज इस बार न तो अंतिम सत्र में कक्षाएं चला पाए और न ही परीक्षाएं उस तरह हो सकीं जैसी होती रही हैं। इस बीच भी साधन-संपन्न निजी स्कूलों और उनके छात्रों के अभिभावकों ने तालाबंदी के बीच साधन-संपन्न बच्चों के लिए कंप्यूटरों के माध्यम से ऑनलाइन पठन-पाठन को एक लगभग संपूर्ण माध्यम बना दिया।

सरकारी स्कूल अभी भी पूरी तरह बंद हैं, और कई प्रवासी परिवारों के छात्र अपने बेरोजगार अभिभावकों सहित गांव वापिस चले गए हैं। उनमें से कुछ सत्र के बीच आसपास के कस्बों की शालाओं में पढ़ने लगे थे कि वहां भी कोविड संक्रमण जा पहुंचा और अनियमित ताला बंदियां हो गईं। अब वे हताश, उदास और तनाव ग्रस्त हैं। शहरों में डिजिटल शिक्षा घर के भीतर पाने की शुरुआती खुशी के बाद मध्यवर्गीय छात्र अलग कसमसा रहे हैं। उनके कामकाजी अभिभावक अब घर पर ही रह कर काम करते हैं और बच्चों की निगरानी भी। यह दोनों को थका और चिड़चिड़ा बना रहा है। बंद घर के भीतर अभिभावक का सर पर खड़े रहकर दिन रात टोका टाकी करना परिसर में दोस्तों के साथ पढ़ाई और मस्ती में दिन गुजारने वाले छात्रों को उग्र व्यवहार या तनाव और अवसाद की तरफ ले जाता है।

कुछ दीर्घकालिक सचाइयां भी चिंताजनक हैं। सबसे बड़ी यह कि डिजिटल शिक्षा के वाहक कंप्यूटर और नेट तक हमारे शहरी छात्रों में भी कुल 23 फीसदी की ही पहुंच है। वह भी सीमित। अपना अलग कंप्यूटर कुल 12 फीसदी ही रखते हैं। अधिकतर ग्रामीण छात्रों में तो नेट से जुड़ने को स्मार्ट फोन ही साधन हैं। उसमें से भी ऑनलाइन पठन-पाठन की सुविधा सिर्फ 4 प्रतिशत के पास है। गांवों में बरसात में कनेक्टिविटी के दस झमेले हैं और फुलटाइम पठन-पाठन के कीमती वाइजू टाइप पैकेज पाना उनके परिवारों के बस की बात नहीं।

दूसरी दिक्कत है कि प्राइमरी स्तर की पढ़ाई तो गांवों में लगभग 95 फीसदी आबादी तक पहुंच चुकी है लेकिन कई जगह प्राइमरी स्कूल के बाद आसपास एक किलोमीटर के दायरे के भीतर मिडिल तथा सीनियर कक्षाओं की कमी है। इससे सिर्फ 38 फीसदी ग्रामीण छात्रों को प्राइमरी स्तर से ऊपर के सरकारी स्कूलों तक पहुंच आसानी से नहीं बनपाती है। शहरों में 70 फीसदी गरीबों को यह दिक्कत तो नहीं, पर उनके पास भी डिजिटल शिक्षा निजी स्कूलों के छात्रों की तरह लैपटॉप आदि से सहजता से लगातार बनाने वाले कीमती उपकरण नहीं जुटते हैं।

इस तरह डिजिटल शिक्षा नई तरह की वर्णाश्रमी श्रेणियां बना रही है। इसमें सबसे ऊपर वे छात्र हैं जिनके पास अपने कंप्यूटर हैं। फिर वे जिनके घर पर एक ही सही, पर साझे का कंप्यूटर तो है। उनके बाद वे हैं जिनके पास स्मार्ट फोनकी मार्फत डिजिटल शिक्षा पाने और कोचिंग एप डाउनलोड करने की आंशिक क्षमता है। उनसे नीचे वे छात्र खड़े हैं जो एक या दो जी के फोन पर वाट्सएप द्वारा संयुक्त सामूहिक रूप से मिल रही डिजिटल तालीम के कुछ छींटे पा लेते हैं। फिर आती हैं आज भी डिजिटल दुनिया से दूर शिक्षा की विशाल पारंपरिक मालगाड़ियां जो खुद पर सवार छात्रों को किसी क्लर्की, कारकुनी या ऑपरेटर की नौकरी से आगे नहीं ले जा सकतीं। इन सबसे निचली पायदान पर लटकी हैं लड़कियां जिनके ऊपर आर्थिक के अलावा हजारों सामाजिक वर्जनाओं का बोझ है। एक पढ़ी-लिखी लड़की छोटे शहर या गांव में आज भी सबकी नजरों में कुछ संदिग्ध है, सबसे अधिक खुद अपनी। बारहवीं के बाद वह कहां जाए? कितनी दूर हॉस्टल तक जाने की उसे इजाजत है? क्या वह अपने पैसों से भी अपना-अलग सिम वाला फोन रख सकती है? इन बेबुनियाद से सवालों से जो लड़कों के प्रसंग में अकल्पनीय हैं, छोटे शहर, कस्बे की हर शिक्षित लड़की को आज भी जूझना पड़ता है। अचरज नहीं कि कोविड की छंटनी का सबसे ज्यादा शिकार यही युवतियां बनी हैं।

हां, यह सच है कि परदेस में डिजिटल क्रांति के कई बड़े ओहदेदार भारतीय मूल के हैं। हां, हैं। पर वे या तो बाहर ही पढ़े हैं या फिर उन वातानुकूलित निजी ट्रेनों के यात्री हैं, जो पब्लिक स्कूल कहलाती हैं। आज की हमारी वर्ग विभाजित डिजिटल शिक्षा कितनी व्यापक, कितनी समतापरक या लोकतांत्रिक होगी? डिजिटल क्रांति से भारत को विश्वगुरु बनाने का सपना दिखाकर हमारे भाग्य विधाता गरीबों की मसीहाई और बेटियों को बेहतरीन शिक्षा देने के चुनावी वायदे ही करते रहे हैं। लेकिन सरकारें बनाने-बिगाड़ने, राममंदिर के शिलापूजन या भारतीय काढ़े और जड़ी-बूटियों के प्रचार के बीच नई शिक्षा तकनीकी के गैर राजनीतिक जानकारों के साथ बैठकर उन्होंने भारतीय भाषाओं में शिक्षा संस्थानों और शिक्षकों के स्तर में व्याप्त गहरी खाई को पाटने की क्या एक भी कारगर टिकाऊ योजना बनाई है? सही है कि असाधारण चुनौतियों के समय में हम नित नया सोचते हैं और प्रयोग असफल रहा तो उसे बदलने में देर नहीं लगाते। लेकिन अभी जबकि स्कूल खुलने का समय है, राज्यवार अल्पकालिक तालाबंदियां क्यों जारी हैं। स्कूली सत्र कब होगा, कक्षाएं कब से शुरू होंगी इसका कोई भरोसेमंद जवाब क्यों नहीं?

पुराना जातिवाद बेशक गलत था। पर क्या हम मान लें कि डिजिटल शिक्षा की दुनिया में प्रवेश कर रहे हमारी नई पीढ़ी के लिए भी पढ़ाई का लक्ष्य भी वही अच्छी नौकरी, मालदार बीबी और बैंक बैलेंस वाला ही रहेगा? कि वातानुकूलित ट्रेन में सफर करते हुए बगल से गुजरती विपन्न ट्रेन के यात्रियों को देखकर छात्रों को कोई अपराध बोध नहीं होगा? ऐसा डिजिटल ज्ञान तो जालंधर से जामताड़ा तक नए चोर दरवाजों से फर्जी डिग्रियां बांटने वाले कॉलेजों, नकली जाति सर्टिफिकेट बनवाने वाले बाबुओं और पैसा दुहने वाले ट्यूटोरियल संस्थानों की मार्फत देश में भ्रष्टाचार करने की लाखों नई राहें खोलेगा। यह ज्ञानदेश को मिल भी जाए तो क्या है?

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