हत्यारोपियों के अभिनंदन की नई रवायत, मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि

साल 2014 के बाद से मुसलमानों के खिलाफ घृणा का माहौल बनाकर हिंदुत्व के हथियार को सिलसिलेवार ढंग से पैना किया गया। गोरक्षा के नाम पर मुस्लिम-विरोधी हिंसा के अभियुक्तों के सार्वजनिक अभिनंदन की यह रवायत भारतीय राष्ट्र और संविधान के मूल्यों के लिए बड़ा खतरा है।

फोटोः सोशल मीडिया
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नवीन जोशी

साल 2014 में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से शासन-प्रशासन और समाज-व्यवहार में कई नई परंपराएं शुरू हो गई हैं। नरेंद्र मोदी जिस ‘न्यू इंडिया’ में देशवासियों को ले जाने का दावा करते नहीं थकते, उसमें एक नई रवायत भीड़-हत्या, हत्या के प्रयास और दंगों के अभियुक्तों का सार्वजनिक अभिनंदन करना भी शामिल है।

इस नई रवायत का बिल्कुल ताजा उदाहरण उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर का है जहां भारी हिंसा, हत्या और आगजनी के कुछ अभियुक्तों की जमानत होने पर उनका जोरदार स्वागत किया गया। पाठकों को पिछले साल बुलंदशहर में हिंसा की वह भयानक घटना याद ही होगी जिसमें गोहत्या का आरोप लगाकर उपद्रव कर रही भीड़ ने एक सब-इंसपेक्टर की पहले पीट कर और फिर गोली मारकर हत्या कर डाली थी। उनकी जीप में आग लगा दी गई थी। हिंसा में एक युवक की भी मौत हुई थी।

किस्सा मुख्तसर में यह था कि कुछ लोगों ने पुलिस चौकी में शिकायत की कि महाव गांव के एक खेत में गोवंश की हड्डियां पड़ी हैं जिससे लगता है कि गोहत्या हुई है। पुलिस ने जांच करके कार्रवाई का आश्वासन दिया। लेकिन करीब 400 लोगों की भीड़ एक ट्रैक्टर-ट्रॉली में जानवरों की हड्डियां लेकर पुलिस चौकी पहुंच गई और गोहत्या का आरोप लगाकर प्रदर्शन करने लगी। सब-इंसपेक्टर सुबोध कुमार सिंह खबर पाकर वहां पहुंचे। उन्होंने उग्र भीड़ को शांत कराना चाहा, लेकिन वह हिंसा पर उतर आई। सब-इंसपेक्टर पर हमला कर दिया गया। किसी ने उन्हें गोली मार दी और उनकी जीप में आग लगा दी। इस मामले में कई लोग गिरफ्तार किए गए थे, जिनमें बीजेपी और उसके अनुषांगिक संगठनों से जुड़े लोग भी थे।

बीते 24 अगस्त को गिरफ्तार अभियुक्तों में से सात लोग हाईकोर्ट से जमानत पाकर छूटे। जेल से उनके छूटते ही स्थानीय भाजपाइयों और हिंदू संगठनों के लोगों ने उनका ‘जय श्रीराम’ और ‘भारत माता की जय’ के नारों के बीच नायकों की तरह फूलमालाओं से स्वागत किया। गोया कि वे देश के दुश्मनों से कोई बड़ी जंग जीत कर लौटे हों। लोगों ने उनके साथ सेल्फी खिंचाकर सोशल साइटों पर डालीं और शाम को उनके लिए दावत का इंतजाम किया। कोर्ट ने इन लोगों को उनके वकीलों के आश्वासन पर सशर्त जमानत दी है। इनमें स्थानीय बीजेपी युवा मोर्चा का स्थानीय प्रभारी भी शामिल है।


हत्या, हत्या के प्रयास, बलवा, आगजनी, तोड़फोड़ के अभियुक्तों का यह स्वागत-सत्कार नया नहीं है। भीड़-हत्या जैसे संगीन आरोपों से घिरे अपने बहादुर-कार्यकर्ताओं के अभिनंदन की शुरुआत बड़े नेताओं ने की। अब उनका संदेश नीचे तक पहुंच गया है। सितंबर, 2015 में यूपी में दादरी के बिसाहड़ा गांव में मुहम्मद अखलाक की हत्या का मामला कौन भूल सकता है? घर में गोमांस रखने का आरोप लगाकर पहले एक मंदिर से उसे सबक सिखाने का ऐलान किया गया। उसके बाद उत्तेजित भीड़ ने घर में घुसकर अखलाक की हत्या कर दी। उसके बेटे को मार-मार कर अधमरा कर दिया गया। इस मामले के एक अभियुक्त रवींद्र सिसौदिया की जब कुछ महीनों बाद पुलिस हिरासत में मृत्यु हो गई, तो अंतिम यात्रा में उसके शव को राष्ट्रीय ध्वज में लपेट कर ले जाया गया, जैसे वह कोई ‘शहीद’ हो। तत्कालीन केंद्रीय पर्यटन मंत्री महेश शर्मा भी वहां मौजूद थे। वह रवींद्र के घर भी गए। उन्होंने इसका ऐलान बकायदा अपने ट्विटर हैंडल पर किया था।

महेश शर्मा की उस समय काफी लानत-मलामत हुई थी, लेकिन शर्मा ने इस पर कोई अफसोस नहीं जताया कि वह एक हत्याभियुक्त के पक्ष में खड़े दिखाई दिए। बल्कि, वह यह कहते रहे कि वह मेरा चुनाव क्षेत्र था और मैंने अपने लोगों के कहने पर ऐसा किया। किसी बड़े बीजेपी नेता की आपत्ति का सवाल ही कहां उठता था, जबकि बाद में अखलाक की हत्या के 15 आरोपियों को केंद्र सरकार की नौकरियां दिए जाने की खबर मिली थी।

जून, 2017 में ही झारखंड के रामगढ़ में भीड़ ने 40 वर्षीय अलीमुद्दीन अंसारी की कार से बाहर खींच कर पीट-पीट कर हत्या कर दी थी। उस पर अपनी गाड़ी में गोमांस ले जाने का आरोप लगाया गया था। गाड़ी में गोमांस था या नहीं, इसकी जांच कहां से होती, क्योंकि उपद्रवियों ने उस गाड़ी को भी वहीं पर फूंक डाला था। इस मामले में एक दर्जन से ज्यादा लोग गिरफ्तार किए गए थे। एक दर्जन अभियुक्तों को दोषी पाते हुए फास्ट ट्रैक कोर्ट ने उन्हें मौत की सजा सुनाई थी। साल भर बाद इनमें से आठ लोगों को हाईकोर्ट ने जमानत दे दी। इस तरह छूटने पर भी बीजेपी ने उनके स्वागत में एक आयोजन किया। इसमें इन आठ लोगों का तत्कालीन केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने फूलमाला पहनाकर अभिनंदन किया। उसी कार्यक्रम में जमानत दिलाने वाले वकील को ‘भगवान का रूप’ बताकर उसका भी स्वागत-सत्कार हुआ था।

एक केंद्रीय मंत्री द्वारा हत्या के अभियुक्तों (निचली अदालत से मौत की सजा प्राप्त) के स्वागत-सत्कार की यह खबर सुर्खियों में रही। ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ समेत विदेशी मीडिया में भी यह खबर छपी और चर्चित हुई थी। तब भी बीजेपी के किसी बड़े नेता ने अनुचित-अनैतिक मानकर इसकी निंदा नहीं की थी। भीड़-हत्या के अभियुक्तों को जयंत सिन्हा के इस सार्वजनिक प्रोत्साहन के बाद ही एक और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह की चौंकाने वाली हरकत सामने आई। हालांकि, तब तक इसमें चौंकने जैसी कोई बात नहीं रह गई थी। यह जान- बूझ कर किया जा रहा था और साफ संदेश देने की कोशिश की जा रही थी।


बिहार के नवादा में 2017 की रामनवमी के दौरान दंगे भड़काने के मामले में पुलिस ने बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के कुछ स्थानीय नेताओं-कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया था। अदालत ने उन्हें जेल भेज दिया। तत्कालीन केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह गिरफ्तार अभियुक्तों से जेल में मिलने गए। उन्होंने इन अभियुक्तों की गिरफ्तारी को साजिश बताया और उनसे सहानुभूति जताई। कहा कि ये लोग तो क्षेत्र में शांति-स्थापना के प्रयास में लगे थे। वह उनके परिवार वालों को अपना समर्थन देने उनके घर भी गए। वह आज भी केंद्रीय मंत्रिपरिषद की शोभा बढ़ा रहे हैं।

गिरिराज सिंह की इस हरकत पर एनडीए के सहयोगी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विरोध जताया था। कड़े शब्दों में उन्होंने कहा कि वह राज्य में ‘क्राइम, करप्शन और कम्युनलिज्म’ बर्दाश्त नहीं करेंगे। नीतीश की इस कड़ी टिप्पणी का बीजेपी नेताओं ने संज्ञान ही नहीं लिया। जाहिर है, गिरिराज सिंह का कदम पार्टी की उसी नई परंपरा का हिस्सा था जिसका पालन पहले महेश शर्मा और जयंत सिन्हा कर चुके थे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भीड़-हत्या के इस सिलसिले पर खामोश ही रहते आए थे, तो उनसे यह आशा कैसे की जा सकती थी कि वह अपने नेताओं की इन हरकतों पर लगाम लगाएंगे। उनसे अपेक्षा तो यह थी कि वह बीजेपी और उसके अनुषांगिक संगठनों के कार्यकर्ताओं की इन गैर-कानूनी और मुस्लिम-विरोधी हिंसा पर कड़ा रुख अपनाएंगे। वैसे, बहुत दिनों बाद एक बार उन्होंने यह जरूर कहा कि गोहत्या के नाम पर हिंसा करने वाले गोरक्षक नहीं हो सकते।

गोहत्या का आरोप लगाकर हत्या और मारपीट करने की वारदात देश के विभिन्न भागों में होती रही हैं। अब भी सिलसिला थमा नहीं है। कभी किसी मुसलमान को रास्ते में रोककर उसकी तलाशी ली जाती है कि कहीं वह गोमांस तो नहीं ले जा रहा, कभी किसी गोपालक के वाहन पर हमला करके जानवर छुड़ा लिए गए और कभी बाजार से लौटते किसी व्यक्ति के झोले में गोमांस होने की अफवाहें फैला कर उस पर हमला किया गया।


यह सब मूलतः मुसलमानों में भय फैलाने की सोची-समझी रणनीति है। यहां यह याद करना भी प्रासंगिक होगा कि कठुआ में एक बच्ची से बलात्कार के अभियुक्त के समर्थन में बीजेपी के एक नेता ने जम्मू में बड़ी रैली कराई थी। जब राजस्थान के राजसमंद में शम्भू रैगर नाम के युवक ने एक मजदूर अफराजुल को कुल्हाड़ी से काटकर मारते हुए अपना वीडियो बनवा कर सोशल मीडिया में डाला था, तो शम्भू को नायक बताते हुए उसकी मदद की अपीलें की गई थीं। शम्भू के खाते में चंद रोज ही में कुछ लाख रुपये जमा हो गए थे। बेचारा निर्दोष अफराजुल पश्चिम बंगाल के मालदा से मजदूरी करने राजस्थान गया हुआ था।

ईद की खरीदारी करके दिल्ली से घर लौटते एक परिवार के किशोर जुनैद को ट्रेन में चाकू से गोद कर मार डालने और दूसरों को घायल कर देने की घटना क्या बिला वजह हुई थी? इन मामलों के अभियुक्तों के खिलाफ पुलिस पर्याप्त सबूत जुटाकर अदालत में पेश नहीं करती। राजस्थान में पहलू खान की हत्या के सभी अभियुक्त हाल ही में अदालत से बरी हो गए, क्योंकि पुलिस की जांच-पड़ताल कच्ची और लचर थी।

देश में यह सिलसिला 2014 के बाद से तेज हुआ है, लेकिन इसकी जमीन काफी पहले से तैयार की जाने लगी थी। अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुसलमानों के खिलाफ घृणा का वातावरण बनाकर हिंदुत्व के हथियार को सिलसिलेवार ढंग से पैना किया गया। गोरक्षा के नाम पर मुस्लिम-विरोधी हिंसा के अभियुक्तों के सार्वजनिक अभिनंदन की यह परिपाटी भारतीय राष्ट्र-राज्य और संविधान के मूल्यों के लिए और भी बड़ा खतरा है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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