NFHS-6 रिपोर्ट में क्या छिपा है? हटाए गए संकेतकों ने बढ़ाई पारदर्शिता पर बहस

NFHS-6 रिपोर्ट में एनीमिया, लिंगानुपात, उज्ज्वला और दिव्यांगता जैसे कई अहम संकेतक हटाए गए हैं। विशेषज्ञों ने पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठाए हैं।

AI Generated सांकेतिक तस्वीर
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तीन दशकों से अधिक समय से राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) को भारतीय आबादी की सेहत को समझने का सबसे खरा मानक माना जाता रहा है। 1990 के दशक की शुरुआत से समय-समय पर होने वाले इस सर्वे ने यह समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है कि भारतीय कैसे रहते हैं, क्या खाते हैं, उनका प्रजनन व्यवहार कैसा है और स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी पहुंच कितनी है।

इसके समृद्ध जिला-स्तरीय आंकड़ों ने नीति-निर्माताओं, शोधकर्ताओं, पत्रकारों और नागरिक समाज संगठनों को स्वास्थ्य सेवाओं की कमियों की पहचान करने, कल्याणकारी योजनाओं की निगरानी करने और सुधार की कोशिशों में भूमिका निभाई है।

इसी प्रतिष्ठा के कारण एनएफएचएस-6 (2023-24) की फैक्ट शीट जारी होने के बाद सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में तीखी बहस छिड़ गई है। जहां केन्द्र सरकार ने संस्थागत प्रसव, टीकाकरण कवरेज और कई अन्य स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार को आगे रखा है, वहीं आलोचकों का कहना है कि सर्वे की सबसे उल्लेखनीय बात यह नहीं है कि वह क्या बताता है, बल्कि यह है कि वह क्या छिपा रहा है।

विवाद का केन्द्र उन कई महत्वपूर्ण संकेतकों को हटाया जाना है, जो सर्वे के पिछले चरणों में प्रमुखता से शामिल थे। सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का तर्क है कि इन्हें हटाने से पारदर्शिता कम होती है, पिछले सर्वेक्षणों से तुलना कठिन हो जाती है और प्रमुख सरकारी योजनाओं के प्रदर्शन का स्वतंत्र मूल्यांकन नहीं हो पाता। हटाए गए संकेतकों में खासकर वे संकेतक हैं जो सीधे तौर पर नरेन्द्र मोदी सरकार की कुछ प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं से जुड़े हुए थे।


पिछली बार स्वच्छ ईंधन और स्वच्छता सुविधाओं तक पहुंच के आंकड़ों ने प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना और स्वच्छ भारत मिशन के प्रभाव का मूल्यांकन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इनसे शोधकर्ताओं को यह समझने में मदद मिलती थी कि केवल एलपीजी कनेक्शन या शौचालय उपलब्ध कराए गए हैं या उनका उपयोग भी हो रहा है।

इस बार इनके गायब हो जाने से चिंता बढ़ गई है, खासकर इसलिए कि इन योजनाओं की दीर्घकालिक स्थिरता को लेकर पहले से ही सवाल उठ रहे हैं। उज्ज्वला योजना के तहत सब्सिडी वाले एलपीजी सिलेंडरों की संख्या प्रति वर्ष नौ से घटाकर चार कर दी गई है। पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, इस योजना के तहत लगभग 10.55 करोड़ एलपीजी कनेक्शन दिए गए हैं। लेकिन ईंधन उपयोग और स्वच्छता व्यवहार संबंधी जिला-स्तरीय आंकड़ों के अभाव में यह आकलन कठिन हो गया है कि इन योजनाओं के लाभ स्थायी हैं या लाभार्थी फिर पुराने ढर्रे की ओर लौट रहे हैं।

जन्म के समय लिंगानुपात (एसआरबी) और शिशु एवं बाल मृत्यु दर से जुड़े संकेतकों को हटाया जाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। एसआरबी को लंबे समय से लैंगिक भेदभाव की निगरानी और ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियानों का असर मापने का एक महत्वपूर्ण पैमाना रहा है।

हालांकि इस जानकारी का कुछ हिस्सा अभी भी सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) जैसे माध्यमों से उपलब्ध है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि एनएफएचएस की विशेषता उसकी जिला-स्तरीय सूक्ष्मता थी। राष्ट्रीय या राज्य-स्तरीय औसत अक्सर स्थानीय स्तर की विफलताओं को छिपा देते हैं। एनीमिया यानी खून की कमीं के आंकड़ों को हटाया जाना सबसे चिंताजनक है।एनएफएचएस-5 ने खुलासा किया था कि भारत की आधे से अधिक महिलाएं और बच्चे एनीमिया से पीड़ित हैं। इससे पोषण अभियान जैसे कार्यक्रमों पर गंभीर प्रश्न खड़े हुए थे।


सरकार का तर्क है कि इन आंकड़ों को हटाने का कारण राजनीतिक नहीं बल्कि वैज्ञानिक है। विशेषज्ञ कहते रहे हैं कि सर्वे के पिछले चरणों में इस्तेमाल किया गया उंगली से खून का नमूना लेने का तरीका बहुत सटीक नहीं है, इसमें खून पतला होने का खतरा रहता है। इसी कारण एनीमिया के आकलन को ‘डाइट एंड बायोमार्कर्स सर्वे इन इंडिया’ (डीएबीएस-1) के तहत कर दिया गया है, जहां शिरा से लिए गए नमूनों का प्रयोगशालाओं में ऑटो-एनालाइजर से परीक्षण किया जाता है।

हालांकि वैज्ञानिक समुदाय मानता है कि यह तरीका अधिक सटीक है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि इस सटीकता की कीमत जानकारी के नुकसान के रूप में चुकानी पड़ी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय यह है कि एनएफएचएस-6 से एनीमिया को हटाने से एनीमिया की समस्या समाप्त नहीं हो जाती। इसके बजाय यह समस्या केवल कम दिखाई देने लगती है।

स्वास्थ्य कार्यकर्ता डॉ. ए. के. अरुण इसमें एक व्यापक पैटर्न देखते हैं। उनके अनुसार, “वे सभी संकेतक हटाए जा रहे हैं जो किसी कमी को उजागर करते हैं, चाहे वह समाज के स्वास्थ्य की कमी हो या व्यवस्था की।”

सिर्फ संकेतकों को ही नहीं हटाया गया, एक पूरे प्रदेश को ही सर्वे से बाहर कर दिया गया है। एनएफएचएस-6 के तहत देशभर के लगभग 6.8 लाख परिवारों से जानकारी एकत्र की गई, लेकिन मणिपुर को इससे बाहर रखा गया क्योंकि वहां लंबे समय से जारी जातीय हिंसा और अस्थिरता के कारण फील्डवर्क बाधित हुआ। इससे एक बड़ा सूचना-रिक्त क्षेत्र बन गया है। हाल के भारतीय इतिहास के सबसे गंभीर आंतरिक संकटों में से एक का सामना कर रहे इस राज्य में अब नीति-निर्माताओं, शोधकर्ताओं और मानवीय सहायता एजेंसियों के पास यह आकलन करने के लिए व्यापक आंकड़े नहीं हैं कि संघर्ष ने पोषण, मातृ स्वास्थ्य, बाल स्वास्थ्य और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को किस प्रकार प्रभावित किया है।


एक और बड़ा नुकसान दिव्यांगता के आंकड़ों का है। दिव्यांगता से जुड़े प्रश्न पहली बार एनएफएचएस-5 में शामिल किए गए थे, जिससे शोधकर्ताओं को यह अध्ययन करने का अवसर मिला था कि दिव्यांगता का मातृ स्वास्थ्य, तपेदिक और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच जैसे विभिन्न स्वास्थ्य परिणामों से क्या संबंध है।

सरकार ने इस निर्णय का बचाव करते हुए कहा है कि दिव्यांगता की व्यापकता समय के साथ बहुत धीरे-धीरे बदलती है और एनएफएचएस इसे सटीक रूप से मापने के लिए आदर्श रूप से तैयार नहीं किया गया था। अधिकारियों ने यह भी कहा कि एनएफएचएस के अनुमान अन्य सर्वेक्षणों की तुलना में काफी कम थे। हालांकि, दिव्यांग अधिकार समूह इस तर्क से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि यदि आकलन की चुनौतियां थीं भी, तो प्रश्नों को पूरी तरह हटा देना एक गंभीर सूचना-शून्यता पैदा करता है।

एनएफएचएस-6 को लेकर बहस का संबंध एक पूर्व विवाद से भी है, जिसमें सर्वेक्षण कराने वाली मुंबई स्थित संस्था इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंसेज (आईआईपीएस) शामिल थी। जुलाई 2023 में, जब एनएफएचएस-6 की तैयारियां चल रही थीं, केन्द्र सरकार ने भर्ती प्रक्रियाओं में कथित अनियमितताओं का हवाला देते हुए आईआईपीएस के निदेशक के.एस. जेम्स को निलंबित कर दिया। इस कार्रवाई ने अकादमिक जगत में तुरंत अटकलों को जन्म दिया। आलोचकों का दावा था कि जेम्स से पहले इस्तीफा मांगा गया था क्योंकि सर्वेक्षण के कुछ निष्कर्ष सरकार की कुछ योजनाओं की प्रभावशीलता पर सवाल उठाते थे।

हालांकि सरकार का कहना है कि यह कार्रवाई पूरी तरह प्रशासनिक थी, लेकिन इस घटना ने संस्थागत स्वायत्तता और बड़े पैमाने पर सार्वजनिक आंकड़ा-संग्रह अभियानों की स्वतंत्रता को लेकर चिंताओं को और बढ़ा दिया। विडंबना यह है कि कई संकेतकों के गायब होने के बावजूद जो आंकड़े उपलब्ध हैं, वे भी गंभीर चुनौतियों की ओर संकेत करते हैं।


एनएफएचएस-6 गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) के बढ़ते बोझ को दर्शाता है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत अब कुपोषण के “दोहरे बोझ” का सामना कर रहा है। जहां लगभग पांचवां हिस्सा वयस्कों का अभी भी कम वजन वाला है, वहीं शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में मोटापा तेजी से बढ़ रहा है। सर्वेक्षण के अनुसार, अब 30.7 प्रतिशत महिलाएं और 27.3 प्रतिशत पुरुष मोटापे या अधिक वजन की श्रेणी में आते हैं, जो पिछले सर्वेक्षण की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि है। इसके साथ ही उच्च रक्त शर्करा और उच्च रक्तचाप के मामलों में भी वृद्धि दर्ज की गई है, जो भारत की रोग-प्रोफाइल में एक बड़े बदलाव का संकेत है। बढ़ते स्वास्थ्य उद्योग से जुड़ा मोटापा इस सर्वेक्षण के सबसे अधिक चर्चित निष्कर्षों में से एक बन गया है।

अन्य चिंताएं भी कम गंभीर नहीं हैं। केवल स्तनपान (एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग) की दर में गिरावट आई है, आधुनिक गर्भनिरोधक साधनों का उपयोग कम हुआ है और सिजेरियन प्रसव लगातार बढ़ रहे हैं।

एनएफएचएस हमेशा केवल आंकड़ों का संग्रह भर नहीं रहा है। यह लोकतांत्रिक जवाबदेही का औजार रहा है। चिंता केवल इस बात की नहीं है कि कुछ संकेतकों को हटा दिया गया है। चिंता इस बात की है कि इन्हें हटाने से सरकारी योजनाओं का मूल्यांकन करना, संवेदनशील आबादी की पहचान करना और दीर्घकालिक रुझानों की निगरानी करना कहीं अधिक कठिन हो गया है।

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