गांधी की विरासत में गोहत्या बंद करने के लिए मानव हत्या की आवश्यकता नहीं

गांधी मानते थे कि सभी को किसी भी धर्म के पालन का अधिकार है। हालांकि वह स्वयं एक धर्मनिष्ठ हिंदू थे, तथापि उन्होंने अन्य धर्मों में आस्था रखने वालों से सदैव संवेदनशीलता के साथ बातचीत की और तर्क दिया कि हर धर्म सत्य के लिए अलग मार्ग का प्रतिनिधित्व करता है।

फोटोः सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

बौद्धिक समुदाय में यह विमर्श का विषय रहा है कि सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक संरचना की व्याख्या के संदर्भ में महात्मा गांधी और बी आर आंबेडकर अनिवार्य रूप से अलग-अलग ध्रुवों पर खड़े थे। इस तरह के सफेद और स्याह अर्थों में उनके विचारों तथा मूल्यों को समझना ऐतिहासिक रूप से गलत और धारणात्मक रूप से पूर्वाग्रही होगा। यह गांधी की दो भिन्न मुद्राओं, जो हमारी कल्पना में पहले से ही स्थित हैं, की अलग-अलग अर्थों जैसी व्याख्या करने जैसा है- जिसमें, पहले वाले में वह भगवान बुद्ध की तरह बैठे हुए हैं और ध्यान मग्न हैं और दूसरे में वह एक लाठी लेकर चलने वाले व्यक्ति के रूप में सामने आते हैं, जैसा कि नंदलाल बोस ने उन्हें चित्रित किया है।

गांधीजी के विचारों में समाई हुई यह गहरी असंगति उनकी पब्लिक इमेज के मुकाबले पहली दृष्टि में स्वयं आधुनिकता के विचार में निहित एक ऐतिहासिक विरोधाभास है। आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था की नींव के रूप में, ‘पश्चिमी ज्ञानोदय’ की परंपरा ने सोचा कि दार्शनिक रूप से मानव विवेक और बुद्धि आजादी और अहिंसा जैसी धारणाओं की उन्नति के लिए प्रबल रहेगी, अगर इन्हें नियमों, कानूनों, मानदंडों और हमारे समय के सामाजिक व्यवहार के ढांचे में सम्मिलित कर दिया जाए।

हिंसा और श्रेणी क्रम- यानी स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आधुनिकता के सिद्धांतों से डिगने- को एक नागरिक समाज, जिसका आधार सार्वभौमिक समानता, तार्किकता, आर्थिक तरक्की, वैज्ञानिक उन्नति और शांति है, एक बाइनरी में देखता है। फिर भी, व्यवहार में आधुनिकता ने मानव सभ्यता के खिलाफ जुल्म और श्रेणी क्रम को चिरायु रखने के लिए हिंसा की सबसे निर्मम तकनीकों को बनाने का मार्ग आसान किया है।

गांधीजी का जीवन और दर्शन हमें यह समझने का न्यौता देते हैं कि हम परिवर्तन को किस तरह संदर्भित करते हैं और कैसे हम भविष्य को पुनर्निर्मित करते हैं, एक ऐसे समय के रूप में जो कि उम्मीद और आशावाद से भरा हो। उनका पूरा जीवन न केवल उपनिवेशवाद के खिलाफ बल्कि आजादी की लड़ाई के साथ-साथ सामाजिक विरोधाभाषों के विरुद्ध संघर्ष का पर्यायवाची बन जाता है। हमारे सामने एक ऐसा आदमी आता है जो अपने समय के विपरीत अहिंसा का देवदूत बन जाता है, जिसने नैतिक मूल्यों पर जोर दिया और व्रत से लेकर ध्यान तक जो भी उसके सामने था उसे एक प्रतिरोध के साधन के रूप में उपयोग किया और फिर भी आधुनिकता के अधिकांश प्रतिनिधि उस इंसान के साथ सामंजस्य नहीं बैठा सके।

महात्मा और उनकी अहिंसा दोनों ही आधुनिक सार्वजनिक क्षेत्र में नया हस्तक्षेप थे। जहां हिंसा और प्रतिहिंसा रोजमर्रा की जिंदगी का सच बन गई हो, उस श्रेणी क्रम समाज में वह एक व्यवधान थे। उनकी अहिंसा, आधुनिकीकरण के विरूद्ध उनकी लड़ाई, ग्रामीण व्यवस्था की तरफ वापस मुड़ना या फिर उनका एक ऐसा व्यक्ति होना जो कि हृदय में किसी के लिए कोई घृणा लेकर नहीं चलता, लगता है यही सब गांधीजी को एक विरोधाभासों का व्यक्ति बनाता है।

हालांकि हमारे पास वह ऐसे इंसान थे जिन्होंने अपने समाज के सुधार के लिए लेनिन या माओ से भी ज्यादा किया था, फिर भी उन्हें गलत समझा गया, क्योंकि लगातार ऐसी कोशिशें हुईं कि भ्रम पैदा किए जाएं, उसमें से छवियां पैदा हों उनसे एक व्यक्ति बनाया जाए। उनको असंगति के स्तर तक गिरा दिया गया। राजनीति में एक ऐसा दृष्टिकोण है जिसने सदा गांधी को नकारा है, लेकिन साथ ही जरूरत पड़ने पर उनके प्रतीक का इस्तेमाल भी किया है।

आज हमें यह स्वयं को याद दिलाने की आवश्यकता है कि गांधी के प्रमुख प्रतीक जैसे कि उनकी विचारधारा मात्र खादी, चरखा, स्वच्छता, बकरी का दूध या कुष्ठ रोगियों के लिए ही नहीं है- जैसा कि आजकल हम इन्हें उनकी व्यक्तिगत विशिष्टता के रूप में देख रहे हैं। गांधीजी को केवल ऊपर लिखे गए लक्ष्यों के जीवन निर्वाह या जीवनशैली तक सीमित करना उनकी विरासत को खतरे में डालने जैसा होगा, क्योंकि गांधीजी एक सकारात्मक स्वतंत्रता सिद्धांतकार के घिसे-पिटे चित्रण को ललकारते हुए हमेशा अपने विचारों को बेहतर बनाते रहे और नागरिक स्वतंत्रताओं के मामले में लगातार सक्रिय रहे।

गांधीजी के लिए नागरिक अधिकार आधुनिक समाज और राज्य की एक मिलीजुली जिम्मेदारी थी। गांधीजी हमारे समय में भी प्रासंगिक हैं, क्योंकि उनकी राजनीति में सार्वजनिक स्थान पर अलग-अलग पहचानों का एक साथ काम करना विशिष्ट रूप से एक गैर-पश्चिमी लोकतंत्र और धार्मिक विविधता के उभार का मार्ग प्रशस्त करती है। गांधीजी मानते थे कि सभी लोगों को किसी भी धर्म के पालन का अधिकार है और उस उपासना पर राज्य का कोई हुक्म नहीं होना चाहिए। हालांकि वह स्वयं एक हिंदू धर्मनिष्ठ थे, तथापि उन्होंने अन्य धर्मों में आस्था रखने वालों के साथ संवेदनशीलता के साथ सदैव बातचीत की और तर्क दिया कि सत्य के लिए हर धर्म भिन्न मार्ग का प्रतिनिधित्व करता है।

हिंदू-मुस्लिम एकता को स्थापित करने का उनका संघर्ष और कट्टरपंथी हिंदूवाद में अस्पृश्यता जैसे घृणित व्यवहार का अंत करने की उनकी लड़ाई उनके मुख्य कार्यभार थे। वह इस सत्य को जानते थे कि मात्र ब्रिटिश शासन के अधीन राजनीतिक गुलामी को ही नहीं उखाड़ फेंकना था बल्कि भारत को और भी कई सारे बंधनों से आजाद कराना था, जैसे अस्पृश्यता, गरीबी, सांप्रदायिकता, सफाई-व्यवस्था की कमी, खुदगर्जी और यहां तक कि धार्मिक दोगलेपन से।

आज सम-सामयिक संघर्षों का भूतापेक्ष (रेट्रस्पेक्टिव) अध्ययन गांधी और आंबेडकर को अलग-अलग खड़ा कर देता है, जबकि इतिहास की परख दलितों की पुरानी पीढ़ी के हाथ में है जो कि गांधीवादी संघर्षों के सीधे लाभार्थी थे। वर्तमान परिदृश्य को निश्चित रूप से आंबेडकर को सघर्षों का एक आदरणीय आइकन (प्रतिरूप) मानने की आवश्यकता है। फिर भी आंबेडकर हिंदूवाद के ढांचे के लिए एक ‘बाहरी’ व्यक्ति बने रहे। इतिहास को गांधी- एक ‘भीतरी’ व्यक्ति- की आवश्यकता थी जो स्वयं प्रैक्टिशनर के शब्दकोष में से असमानता का खत्म करें, जैसा कि स्वतंत्रता पर उनके विचारों में मुखर होता है।

उनके विचारों और व्यवहारों के द्वारा आधुनिकता की एक प्रति-विचारधारा (काउंटर आइडियोलॉजी) तैयार हो रही थी जो कि मेट्रोपॉलिटन दुनिया या विश्वविद्यालयों में उभरकर सामने नहीं आई, बल्कि लगातार मिलने और बातचीत के द्वारा मुफस्सिल क्षेत्रों के निरक्षरों के दिमागों में उभरी। हमारे सामने एक नेता था जो पुरजोर तरीके से यह तर्क देने की कोशिश कर रहा था कि आजादी के संघर्ष से सामाजिक स्थिति बदलने की प्रेरणा मिलनी चाहिए और जिसके राजनीतिक सत्याग्रह ने आध्यात्मिक आत्म शुद्धि के संकेत दिए, जिसने बड़ी व्यवहारिकता से आधुनिक पूंजीवादी समाज के लिए रचनात्मक योगदान दिया।

एक ऐसी दुनिया में जो कट्टरपंथी मतभेदों में बंटी पड़ी है जहां राजनीति का उपयोग मात्र सांप्रदायिक लक्ष्यों के लिए किया जा रहा है, वहां गांधीवादी विरासत सदा बनी रहेगी। गांधीजी का भारत की एकता को लेकर एक सार्वलौकिक विजन था। वह अपने पीछे धर्मनिरपेक्ष भारत की एक मजबूत विरासत छोड़ गए हैं जहां गोहत्या बंद करने के लिए मानव हत्या की आवश्यकता नहीं है। रोक और निषेध का सही तरीका प्रबोधन और प्रोत्साहन था और रचनात्मक कार्यों के लिए मानसिकता में खादी द्वारा परिवर्तन की आवश्यकता थी, जो कि मात्र एक वस्त्र नहीं बल्कि जीवन का एक तरीका था। ये गांधीजी के वे सिद्धांत हैं जो उनके जीवनकाल में और आज हमारे समय में भी राजनीति को मानवता के लिए संवेदनशील बनाए हुए हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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