विचार

राजमोहन गांधी का लेख: सिर्फ विपक्ष नहीं, पूरे देश के लिए सुखद नहीं कहे जा सकते चुनाव नतीजों के मायने

भारत का एक राष्ट्र के रूप में स्वतंत्र होना ही पर्याप्त नहीं है। लोगों को ये भी महसूस होना चाहिए कि वे बोलने, विश्वास करने, प्रार्थना करने या जो भी वे करना चाहते हैं, उसके लिए स्वतंत्र हैं और राज्य के आदेश के अनुरुप काम करने से इनकार करने के लिए भी स्वतंत्र हैं।

फोटोः सोशल मीडिया
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राजमोहन गांधी

बहुत सारे उन लोगों के लिए जो दूसरी तरह के परिणाम की अपेक्षा कर रहे थे दुख अपरिहार्य है, लेकिन जो कुछ हुआ उसे समझने के लिए हमें आगे बढ़ना चाहिए। पुलवामा, बालाकोट, अतिविशाल फंड, तीखे रूप से झुका हुआ खेल का मैदान, बंटे हुए अंपायर, विपक्षी ‘टीम’ में विभाजन, और इस मैच में कमेंटेटरों के ऊपर नियंत्रण का मोदी की जीत में बहुत योगदान रहा।

किंतु ऐसा नहीं कि विपक्ष की आवाज सुनी नहीं गई। सब कुछ सुनने के बाद, मतदाता यानी ‘मालिक’ ने पूरे जोर के साथ मोदी को चुना। एक लहर तो थी। राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी के प्रत्यक्ष रूप से गुणा-भाग और सवालों के जवाब न देने के बर्ताव की तुलना में बहुतों के दिलों को अपनी सहजता-स्वाभाविकता, खुलेपन और बेबाकी के साथ छुआ। फिर भी बहुत सारे लोग थे जिनकी इच्छा थी कि वे भारत का भविष्य मोदी के हाथों में दे दें। मतगणना के प्रतिशत ने मोदी के प्रशंसकों के प्रभुत्व का खुलासा किया।

अतः लोकप्रिय समर्थन के साथ 2019 में भारत एक ऐसा राज्य बन चुका है, जो भिन्न मत रखने वालों के लिए खतरे की घंटी है। मैं इसे एक ‘क्रोधी (इन्डिग्नन्ट) राज्य’ कहूंगा। एक काल्पनिक गद्दार के खिलाफ, राष्ट्र के कुछ महान नायकों को झूठे इतिहास के तहत गलियाना और वह भी मात्र इसलिए कि उन्होंने भारत को हिंदू भारत कहने से इंकार कर दिया, अल्पसंख्यकों और भिन्न मत रखने वालों को पिशाच बना देना और हिंदू बहुसंख्यकों में एक पीड़ित के भाव को डालना, पिछले कई वर्षों से चलाए जा रहे अभियान के प्रमुख तत्व हैं।

संकल्प और ऊर्जा से निर्मित नफरत की नींव पर खड़ा यह क्रोधी राज्य अब इस अभियान के निमित्त काम करेगा। लेकिन एक बात है, इस क्रोधी राज्य की धमकियां कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, पंजाब और छत्तीसगढ़ की विपक्षी सरकारों तक सन्निकटता के विभिन्न स्तरों तक पहुंचेंगी। मोदी ने जीत के बाद संविधान के प्रति प्रतिबद्धता और सबका साथ, सबका विकास की बात कही, जिसका स्वागत है, और उनकी नई सरकार को इन आश्वासनों पर परखना चाहिए।

लेकिन लोकतांत्रिक अधिकारों पर उनकी पहली पारी, या उनके तथा उनके उम्मीदवारों के हालिया शब्दाडंबरों ने कोई उम्मीद पैदा नहीं की। जबरदस्ती का वातावरण पूरे राष्ट्र के लिए एक आम चुनौती पेश करता है। 23 मई का फैसला बताता है कि बहुत सारे भारतीय आज इस तरह के वातावरण की परवाह नहीं करते, या इसे पहचानने से इनकार करते हैं। सौभाग्य से, इस जबरदस्ती से कुपित लोग भी बड़ी तादाद में मौजूद हैं।

आने वाले महीनों और वर्षों में, जबरदस्ती की मौजूदगी के प्रति सतर्कता, जहां भी संभव हो इसका प्रतिरोध, मेरे ख्याल से, कम से कम भविष्य के चुनाव जीतने के लिए महत्वपूर्ण होगा। प्रत्येक घटना जहां राज्य या निजी भीड़ लोगों को उनकी इच्छा के खिलाफ कार्य करने को विवश करेगी, तो वह खुलासे और विरोध का वारंट होगी। भारत का एक राष्ट्र के रूप में स्वतंत्र होना ही केवल पर्याप्त नहीं है। वैयक्तिक रूप से भारतीय लोगों को यह महसूस होना चाहिए कि वे बोलने, विश्वास करने, प्रार्थना करने, जो भी कार्य वह करना चाहते हैं उसके लिए स्वतंत्र हैं और प्रार्थना, बोलने, गाने या राज्य की कमांड के रूप में कार्य करने से इनकार करने के लिए भी स्वतंत्र हैं।

यह वही है जिसकी गारंटी संविधान देता है, जिस पर मोदी ने अपनी आस्था दोहराई है। नैतिक और कानूनी दोनों ही अर्थों में, स्वतंत्रता एक उपसिद्धांत (कॉरलेरी) वहन करती है: प्रत्येक भारतीय को अपने साथी भारतीयों तक आजादी का विस्तार करना चाहिए। किसी का किसी के खिलाफ कोई जबरदस्ती नहीं, सिवाय जब राज्य के सेवकों को कानून लागू करना होता है- यही सिद्धांत है। जब सिद्धांत के खिलाफ जाकर जबरदस्ती होती है तो पुलिस को अपने पीड़ित की रक्षा के लिए अवश्य ही हस्तक्षेप करना चाहिए। इसमें मोदी के पहले कार्यकाल के दौरान शासन के अंग विफल रहे हैं।

जबरदस्ती के खिलाफ संघर्ष चयनात्मक नहीं हो सकता। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने अपने विजयी भाषण में केरल, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा में अपनी पार्टी के पीड़ितों का जिक्र किया, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। उनकी और उनकी पार्टी की सरकारें, चाहे वह केंद्र में हो या फिर राज्यों में, जब भी और जहां भी पीड़ितों के लिए जबरदस्ती दिखती है तो उन सरकारों को उनके कर्तव्यों की हर हाल में याद दिलाई जानी चाहिए, यहां तक कि चाहे ये पीड़ित उन दलों या आस्थाओं में विश्वास रखते हों जो उनकी पार्टी से अलग हैं।

यही बात विपक्ष की सरकारों पर भी लागू होती है। यदि, मोदी के शब्दों का इस्तेमाल करें, तो ऐसे लोग थे जो चुनावों में अपने संघर्ष के दौरान ‘रुके, थके, या झूके’ नहीं। निश्चित रूप से ममता बनर्जी इस तरह की सूची के शीर्ष कोष्ठक में थीं। मोदी-शाह के दबाव पर उनकी अविचलित और जोशीली प्रतिक्रिया ने हर स्वतंत्रता प्रेमी को प्रोत्साहित किया। फिर भी ममता दीदी को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनकी पार्टी के सदस्य अपने विरोधियों के खिलाफ जबरदस्ती न करें। इस पैमाने पर टीएमसी का रिकॉर्ड अभी तक बहुत अच्छा नहीं रहा है।

गैर-बीजेपी सरकारें और उनके समर्थक टारगेट किए गए हर व्यक्ति के जीवन और अधिकारों की सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता दिखा सकते हैं। यह भारत के सहिष्णुता के वातावरण को पुनः हासिल करने के संघर्ष, जो संभवतः लंबा हो सकता है, में एक ठोस योगदान होगा। जबरदस्ती को हाल के वर्षों में मिले राज्य के लाइसेंस की तुलना में समान दुश्मन का सामना कर रहे राजनीतिकों की मिलकर काम करने में विफलता आजाद भारत में पुरानी कहानी है।

एक बार फिर हमारे पास जवाब से ज्यादा सवाल हैं। एक बैचेन करने वाली समझ है कि वर्तमान राजनीतिक पैटर्न, जो बहुतों के लिए रोमांचक और अन्य के लिए कष्टदायी है, कुछ समय तक रह सकता है। मोदी-शाह की सफलता के बारे में उत्साह ने मुझे उस उत्साह की याद दिला दी जिसने चालीस वर्ष पहले 1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति का स्वागत किया था। यद्यपि जोश जल्दी समाप्त हो गया, और जबरदस्ती ने क्रांति के विरोधियों के साथ-साथ समर्थकों को भी घायल किया था, लेकिन शासन चलता रहा। सादृश्य शायद ही सही है, लेकिन 23 मई के बाद एक भारतीय के लिए जो विचार इसने संप्रेषित किया है वह सुखद नहीं है। हालांकि, आशावान अपने संघर्ष को कभी नहीं टालते। स्वप्न और दुस्वप्न, शीघ्र या बाद में चला ही जाएगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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