विष्णु नागर का व्यंग्यः देश का स्वाभिमान नहीं, मोदी जी के लिए ट्रंप की ‘प्रेम’ की भाषा बड़ी है!

यह इंदिरा गांधी का नहीं, मोदी का ‘न्यू इंडिया’ है। इसे भारत समझने की गलती नहीं कर सकते। मोदी को भगवान समझने की गलती भक्त कर सकते हैं, मगर ट्रंप के इस प्रेम को धमकी समझने की गलती वे नहीं कर सकते। वैसे भी परस्परं प्रशंसंति के पहले ही मामला खत्म हो चुका था!

फोटोः सोशल मीडिया
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विष्णु नागर

यह संकट काल है। इसमें हमें मोदी जी से पूर्ण सहयोग करना चाहिए। वह जिस किसी की भी मदद करना चाहें, हमें उसमें भी उनकी मदद करना चाहिए। आलोचना बिल्कुल नहीं करना चाहिए और व्यंग्य तो कतई नहीं लिखना चाहिए। सबसे जरूरी यह है कि किसी भी तरह की अफवाह नहीं फैलाना चाहिए। जैसे यह अफवाह फैलाई जा रही है कि ट्रंप जी ने, मोदी जी को धमकाया। ऐसा कुछ नहीं है, हां इतना जरूर कहा कि ठीक है, मोदीजी आप हमें मलेरिया की दवा हाइड्रोक्सीक्लोरिकिन मत भेजो, फिर हम भी आपको देख लेंगे।

इसे धमकाना नहीं माना जा सकता! मोदी जी की कसम, ट्रंप जी, मोदी जी पर हमेशा इसी तरह लाड बरसाया करते हैं। यह ट्रंप जी का जाना-माना तरीका है। ट्रंप जी से जब भी मोदीजी मिलने जाते हैं या उन्हें यहां बुलाते हैं, ट्रंप जी की प्यार की, इकरार की यही भाषा होती है। मोदी जी से ज्यादा अच्छी तरह इस बात को कौन जानता है?

यह धमकी नहीं, ट्रंप जी की बात करने की शैली है। अरे, विश्वभर में मोदी जी के वही तो एकमात्र दोस्त हैंं, वह क्यों अपने मित्र को धमकाने लगे? मोदी जी ऐसा कोई काम ही नहीं करते कि ट्रंप को धमकाने की जरूरत पड़े। मोदी जी मित्रता का मोल जानते हैं। और क्या ट्रंप को इतना भी हक नहीं है कि वह मनचाही भाषा में अपने मित्र से बात कर सकें?

मोदी जी हमेशा ट्रंप की प्यार की भाषा का जवाब बहुत विनयशीलता से, बेहद प्यार से देते हैं। मित्रता के वास्ते कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। जो मित्र चाहे, जिस शर्त पर चाहे, समझौता करने को तैयार रहते हैं। चौबीस घंटे में फैसला बदल देते हैं। जी खोल कर खर्च करना पड़े, खर्च कर देते हैं। मित्र कहता है- ऐ, तुरंत हाइड्रोक्सीक्लोरोकिन भिजवाओ जरा औऱ मोदी जी, जी हुजूर कहते हुए तुरंत भिजवा देते हैं!

उन्हें बाद में याद आता है कि अरे, ये तो मेरा पक्का यार है। इसे हुजूर क्यों कहा? मगर मोदी जी से हमेशा यही गलती हो जाती है और ट्रंप को हुजूर सुनना हमेशा अच्छा लगता है! हुजूर सुनकर और दवा मिलने का आश्वासन पाकर वह मोदी जी की भूरी-भूरी प्रशंसा कर देते हैं। उन्हें मानवता का उद्धारक बता देते हैं। ट्रंप घाव करने के दो-तीन दिन बाद भी मलहम लगा दे, इतना काफी है!

कुछ लोगों ने पता नहीं क्यों मुझसे पूछा कि ट्रंप की इस भाषा को हमारे मोदीजी ने बर्दाश्त कैसे कर लिया? इतने बड़े देश का खुलेआम इतना बड़ा अपमान इस परम राष्ट्रवादी ने कैसे सह लिया?हाइड्रोक्सीक्लोरोकीन निर्यात पर प्रतिबंध लगाया और फिर उस फैसले को धमकी में आकर बदल कैसे दिया?

वैसे यह सवाल ही गलत है। दरअसल ट्रंप जी महज दो सौ साल पुरानी अमेरिकी संस्कृति की भाषा में बोलते हैं और आप तो जानते ही हो, मोदी जी हमेशा, हरेक से (पाकिस्तान को छोड़कर) पांच हजार साल पुरानी भारतीय संस्कृति की भाषा में ही बतियाते हैं। आप समझते हो, ट्रंप धमका रहा है, जबकि ट्रंप-संस्कृति की गहरी समझ रखने वाले मोदी जी समझ जाते हैं कि जब उनके बेस्ट फ्रेंड को उन पर ज्यादा लाड आता है तो वह पब्लिकली भी इसी भाषा में लड़ियाना आरंभ कर देता है।मस्तमौला है, पब्लिक-प्राइवेट का फर्क भूल जाता है!

यह भारत की जनता की भाषा नहीं है, ट्रंप की भाषा है, इसे सहना और सुनना पड़ता है। उस पर अमल करना पड़ता है। यहां भले ही मलेरिया से लोग मर जाएं, अमेरिकी लोगों को कोरोना से बचाने के लिए ट्रंप अगर हाइड्रोक्सीक्लोरिकिन को रामबाण दवा समझता है तो उसकी उस जरूरत को पूरा करना जरूरी होता है। इसे वहां फौरन भेजना जरूरी होता है।

भारत में दो लाख से अधिक लोग हर साल मलेरिया से मरते हैं। यहां के लोग ऐसी मौतों के अभ्यस्त हैं, मगर अमेरिका के लोगों ने तो कोरोना से भी मरने की आदत नहीं डाली है। यहां दो लाख की बजाय चार लाख-छह लाख भी मर जाएं, कोई बात नहीं। देश का स्वाभिमान बड़ा नहीं, ट्रंप की 'प्रेम' ( धमकी) की भाषा बड़ी है। यह ट्रंप है, इसके घर बार-बार मत्था टेकने जाना है, इसे घर में घुसकर मारेंगे, चुन-चुन कर हिसाब लेना मेरी फितरत में है, यह कहने की हिम्मत नहीं की जा सकती। ट्रंप, इमरान खान नहीं है, ट्रंप है। वह कपड़े भी उतरवाए तो उतारकर देना पड़ता है।

यह इंदिरा गांधी का नहीं, मोदी जी का 'न्यू इंडिया' है। इसे भारत समझने की गलती नहीं की जा सकती। मोदी को भगवान समझने की गलती भक्त कर सकते हैं मगर भक्त, ट्रंप के इस प्रेम को धमकी समझने की गलती भी नहीं कर सकते। वैसे भी परस्परं प्रशंसंति के पहले ही मामला खत्म हो चुका था।

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