खरी-खरीः अब देश में बन रहा है बीजेपी विरोधी ‘वोट बैंक’

दिल्ली में बीजेपी की ध्रुवीकरण की नग्न राजनीति का दांव उसी पर भारी पड़ गया। उसकी इस राजनीति से दिल्ली में बीजेपी विरोधी मतदाताओं के बीच एक काउंटर पोलराइजेशन हो गया।अलग-अलग वर्ग जो हिंदुत्व अथवा मोदी विरोधी थे, सभी एकजुट हुए और उन्होंने बीजेपी को रोक दिया।

फोटोः सोशल मीडिया
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ज़फ़र आग़ा

भारतीय जनता पार्टी ने संशोधित नागरिकता कानून पर आधारित ‘संघी राष्ट्रवाद’ को दिल्ली चुनाव में खुलकर दांव पर लगा दिया, लेकिन दिल्ली की जनता ने बीजेपी की बाजी ही उलट दी। दरअसल दिल्ली चुनाव के परिणाम बीजेपी की करारी हार ही नहीं है, बल्कि यह तो भारतीय जनता पार्टी और संघ की राजनीति की खुली हार है।

कारण यह है कि दिल्ली ने ध्रुवीकरण की राजनीति ठुकरा कर अरविंद केजरीवाल की ‘कामकाज’ की राजनीति को चुना है। बीजेपी अपने शीर्ष नेतृत्व सहित इस चुनाव में केवल और केवल खुलकर हिंदुत्व की राजनीति का खेल खेल रही थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह से लेकर पार्टी कार्यकर्ता तक सबने मिलकर चुनाव को ‘शाहीन बाग बनाम केजरीवाल’ बना दिया था।

प्रधानमंत्री ने स्वयं अपनी सभा में ‘कपड़ों से पहचाने जाते हैं’ जैसी बात कही। फिर अमित शाह ने ‘फूल का बटन ऐसे दबाओ कि शाहीन बाग में झटका लगे’ जैसा असभ्य और सांप्रदायिक भाषण दिया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने जहरीले भाषण दिए और एक केंद्रीय मंत्री ने तो ‘गोली मारो’ जैसी बातें तक कीं।

सत्य तो यह है कि भारत के चुनावी इतिहास में कभी भी चुनावी प्रचार-प्रसार का स्तर इतना ओछा नहीं रहा जैसा इस बार दिल्ली चुनाव का था। इस चुनाव में केवल भाषा ही नहीं बिगड़ी। इस चुनाव में खुलकर सांप्रदायिक हथकंडे अपनाए गए। शाहीन बाग की आड़ में खुले तौर पर हिंदू-मुस्लिम कार्ड खेला गया। लब्बोलुआब यह कि दिल्ली में हिंदुत्व राजनीति अपने नग्न स्तर तक पहुंच गई जो भारत जैसे महान देश और उसकी प्राचीन सभ्यता को शोभा नहीं देता।

परंतु बीजेपी और संघ को भारतवर्ष से प्रेम नहीं। बीजेपी के लिए केवल उसकी विचारधारा ही प्रिय है। पर उस विचारधारा में ऐसा कोई महान आकर्षण नहीं कि जनता उसको सदा वोट देती रही। साल 2014 के लोकसभा चुनाव से अब तक नरेंद्र मोदी हिंदुत्व का मिश्रण विकास के साथ बेचकर गद्दी चलाते रहे हैं। लेकिन विकास के नाम पर मोदीजी ने तो देश को बेरोजगारी, चौपट अर्थव्यवस्था, भूखा मरता किसान और बेरोजगार नौजवान थमा दिया।

अब उनके पास केवल हिंदुत्व राजनीति ही बची है। जिसका नंगा नाच दिल्ली में दिखाई पड़ा। दिल्ली में शाहीन बाग के नाम पर ध्रुवीकरण का ऐसा निम्न प्रयास हुआ कि दिल्ली वासियों ने कानों में ऊंगलियां डाल लीं और केजरीवाल को जी भरकर वोट डाले और उनको एक तिहाई से अधिक बहुमत देकर तीसरी बार दिल्ली का ताज पहना दिया।

परंतु दिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी की विजय केवल केजरीवाल की ‘कामकाज’ की राजनीति की विजय नहीं है। बहुत जोर-शोर से यह कहा जा रहा है कि केजरीवाल ने एक नई ‘काम की राजनीति’ को जन्म दिया है और दिल्ली वासियों ने उसी को सफल बनाया है। परंतु यह अर्द्धसत्य है क्योंकि दिल्ली के गरीबों ने काफी हद तक बिजली, पानी, मोहल्ला, क्लिनिक और शिक्षा सुधार के नाम पर वोट जरूर दिया। परंतु केजरीवाल को केवल बिजली-पानी पर ही वोट नहीं मिला।

दरअसल बीजेपी की ध्रुवीकरण की नग्न राजनीति से स्वयं बीजेपी को इस बार उल्टा नुकसान हुआ। क्योंकि इस राजनीति से दिल्ली में बीजेपी विरोधी वोटर के बीच एक प्रति ध्रुवीकरण (काउंटर पोलराइजेशन) भी हुआ। और वह ध्रुवीकरण था- बीजेपी रोको। यानी वे अलग-अलग वर्ग जो हिंदुत्व अथवा मोदी विरोधी थे, वे सबके सब मोदी को हटाने के लिए ‘आप’ के झंडे तले इकट्ठा हो गए। उन सब ने मिलकर बीजेपी को सत्ता में आने से रोक दिया।

मुख्यतः ऐसे तीन वर्ग थे, जिनकी इस चुनाव में केवल यह प्राथमिकता थी कि किसी भी प्रकार बीजेपी को रोको। एक, मुस्लिम वर्ग जिसने केजरीवाल प्रेम में नहीं, अपितु बीजेपी विरोध में एकजुट होकर आम आदमी पार्टी के पक्ष में वोट डाला। सत्य यह कि मुस्लिम वोटर का झुकाव इस बार कांग्रेस की ओर था, परंतु उसको यह प्रतीत हो रहा था कि कांग्रेस, बीजेपी को चुनाव हराने की स्थिति में नहीं है। अतः इस वर्ग ने खुलकर एकजुट होकर आम आदमी पार्टी को वोट दिया।

फिर दूसरा वर्ग जिसकी प्राथमिकता बीजेपी को हटाने की थी वह था उदारवादी वर्ग। इसकी बड़ी संख्या भी कांग्रेस के पक्ष में है। लेकिन इसने भी केजरीवाल से मतभेद होते हुए भी ‘आप’ को वोट डाला। तीसरा वामपंथी वोटर जो मजबूरन इसी कारणवश आम आदमी पार्टी के साथ गया। फिर कांग्रेस पार्टी ने अंतिम समय पर स्वयं अपने को लगभग चुनाव से दूर कर बीजेपी विरोधी वोट को विभाजित होने से रोक दिया।

इस प्रकार दिल्ली में बीजेपी की हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण की राजनीति के विरोध में एक उल्टा बीजेपी हटाओ ध्रुवीकरण हुआ, जिसने केजरीवाल की ‘कामकाजी राजनीति’ को पूर्णतः सफल बना दिया और इस प्रकार अरविंद केजरीवाल तीसरी बार दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए और बीजेपी मुंह ताकती रह गई।

परंतु इसका यह अर्थ कतई नहीं कि बीजेपी की ध्रुवीकरण की राजनीति समाप्त हो गई। अथवा उसका खतरा टल गया। बीजेपी ने स्वयं यह कहना प्रारंभ कर दिया है कि इस चुनाव में उसका वोट औसत लगभग छह प्रतिशत बढ़ा है। अतः वह अभी भी संशोधित नागरिकता कानून और एनपीआर/एनसीआर के मुद्दे पर राजनीति करेगी। अर्थात् दिल्ली चुनाव के बाद होने वाले सभी विधानसभा चुनावों से लेकर 2024 लोकसभा चुनाव तक बीजेपी देश को औरअधिक ध्रुवीकरण की छोर तक ले जाने का भरपूर प्रयास करेगी।

देश में जगह-जगह विभिन्न आड़ में शाहीन बाग उत्पन्न कर हिंदू आक्रोश उत्पन्न किया जाएगा। इस राजनीति के दो परिणाम होंगे। एक तो देश में ध्रुवीकरण होगा जिसका लाभ बीजेपी को होगा। परंतु दूसरी ओर इसके विरूद्ध एक प्रति ध्रुवीकरण (काउंटर पोलराइजेशन) भी होगा, जैसा कि दिल्ली में हुआ। शाहीन बाग राजनीति अब एक दोधारी तलवार बन चुकी है। यदि बीजेपी शाहीन बाग के नाम पर हिंदू वोट बैंक बनाने की चेष्टा कर रही है, तो दूसरी ओर शाहीन बाग के सहयोग में एकत्रित होकर बीजेपी विरोधी जनता दूसरा मोर्चा खड़ा कर रही है।

इस प्रकार देश में एक खुला बीजेपी विरोधी वोट बैंक बन रहा है जिसकी प्राथमिकता केवल बीजेपी को हराना है। जाहिर है कि अपनी लोकप्रियता की चरम सीमा पर बीजेपी का पिछले लोकसभा चुनाव में वोट प्रतिशत केवल 37 प्रतिशत है। अर्थात बीजेपी विरोधी वोट बैंक देशव्यापी स्तर पर कहीं बड़ा है।

स्पष्ट है कि दिल्ली मॉडल पर बीजेपी विरोधी वोट को एक जगह इकट्ठा करने से 2024 के लोकसभा चुनाव में और उससे पहले विधानसभा चुनावों में बीजेपी को हराया जा सकता है। परंतु यह कोई बड़ी सरल राजनीति नहीं है। इसके लिए बीजेपी विरोधी राननीतिक दलों को बड़ी उदारता का स्वरूप अपनाना होगा, जो कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने दिल्ली में अपनाया है। दिल्ली के चुनाव परिणाम से जनता ने यह स्पष्ट कर दिया कि देश की अधिकांश जनसंख्या मोदी और हिंदुत्व राजनीति को खारिज करने को तैयार है।

अब गेंद विपक्ष के पाले में है। यदि विपक्ष के राष्ट्रीय स्तर के दल और क्षेत्रीय नेता दिल्ली से सबक हासिल कर बीजेपी विरोधी वोट दिल्ली के समान बंटने से रोक सकते हैं तो फिर बीजेपी और उसकी ध्रुवीकरण की राजनीति को हराया जा सकता है। देश की जनता ने दिल्ली मे अपना निर्णय स्पष्ट कर दिया। अब विपक्ष को ‘दिल्ली मॉडल’ की राजनीति की तैयारी करनी होगी। यह तय है कि आने वाले अधिकांश चुनाव ‘शाहीन बाग’ मुद्दे पर ही लड़े जाएंगे। और यह भी तय है कि इस राजनीति को प्रति ध्रुवीकरण की राजनीति से ही हटाया जा सकता है।

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