खरी-खरीः अब कश्मीर बनेगा दूसरा फिलिस्तीन !

अब कश्मीरियों का होगा क्या! वही जो इस समय फिलिस्तिनियों का हश्र है। फिलिस्तिनी भी मौजूदा अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के बंदी हैं। उनके संघर्ष का दुनिया में कोई संगी-साथी नहीं। अब कश्मीर भारतीय फौज के साये में ही चलेगा और कश्मीरी जान से जाता रहेगा।

फोटोः सोशल मीडिया
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ज़फ़र आग़ा

जिस वक्त यह लेख लिखा जा रहा था, उस रोज ईद का दिन था। सारे भारत में मुसलमान मस्जिदों में नमाज पढ़कर आपस में गले मिलकर एक दसूरे को ईद की मुबारकबाद दे रहे थे। इसके बरखिलाफ भारत के मुस्लिम बहुल प्रांत वादी-ए-कश्मीर में अधिकांश मस्जिदों में ताला पड़ा था। श्रीनगर और अधिकांश वादी में कर्फ्यू लगा था। शहर में मौत का सन्नाटा छाया हुआ था। केवल सुरक्षा बलों के बूटों की आवाज सन्नाटे को चीरती हुई दरवाजे के पीछे लोगों के दिलों को दहला रही थीं। बस्तियों और मोहल्लों की सड़कों की कांटेदार तारों से नाकाबंदी कर दी गई थी।

सरकारी ऐलानों के अनुसार कश्मीर में अमन और अमान था। जबकि ‘बीबीसी’ और ‘न्यूयार्क टाइम्स’ सहित अधिकांश अंतरराष्ट्रीय मीडिया श्रीनगर तथा कुछ और कश्मीरी नगरों से भारत विरोधी प्रदर्शनों और वीडियो की खबरें दे रहे थे। उधर, जम्मू से भी यह खबरें आ रही थीं कि सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 हटाने के पश्चात वहां भी बेचैनी है। बीजेपी सहित जम्मू के अन्य राजनीतिक दलों में इस बात पर गहरी चिंता थी कि 370 हटने के पश्चात जम्मू की नौकरियां और जमीन-जायदाद पर बाहर से आए पंजाबियों और बिहारियों का कब्जा हो जाएगा। परंतु लद्दाख में शांति थी। लेकिन वहां के शहर कारगिल से विरोध प्रदर्शनों के समाचार आ चुके थे।

वादी में स्थिति इतनी बिगड़ चुकी थी कि ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने अपने 12 अगस्त के दिल्ली संस्करण के प्रथम पृष्ठ पर महिलाओं के प्रदर्शन का एक चित्र छापा। अनुच्छेद 370 की समाप्ति के पश्चात कश्मीर घाटी अब जन्नत से पूरी तरह जहन्नुम बन चुकी है और जम्मू तथा लद्दाख में भी हलचल है। यूं तो पिछले तीन दशकों में पाकिस्तान ने कश्मीर को आतंकवाद के जरिए पहले ही जहन्नुम के दरवाजे तक पहुंचा दिया था। जो कुछ बची-खुची कसर थी वह अब केंद्रीय सरकार ने पूरी कर दी। पिछले दो सप्ताह के अंदर यह तय हो गया कि कश्मीर में दशकों-दशकों तक शांति का अनुमान ही नहीं किया जा सकता है। अब कश्मीर भारतीय फौज के साये में ही चलेगा और कश्मीरी जान से जाता रहेगा।

बेचारा कश्मीरी! राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति का 1947 से ही मोहरा बन कर रह गया। कश्मीर पहले पाकिस्तानी हमलों का रणस्थल बना और फिर 1980 के दशक में पाकिस्तानियों ने कश्मीरियों को बंदूक देकर आतंक का रास्ता ऐसा दिखाया कि आजादी के नाम पर उसको केवल मौत ही मिली। खुद सरकारी अनुमान के अनुसार पिछले तीन दशकों में लगभग चार लाख कश्मीरी नौजवान मौत की नींद सो चुके हैं। दरअसल 1980 के दशक में जनरल जिया उल हक ने बदलती अंतरराष्ट्रीय स्थिति का लाभ उठाकर कश्मीर को आतंक के जहन्नुम में झोंक दिया।

हुआ कुछ यूं कि जब भूतपर्व सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर आक्रमण कर उसको अपनी छावनी बना दिया, तो अमेरिकी व्यवस्था ने अफगानिस्तान को सोवियत संघ का वियतनाम बना देने की ठान ली। इसके लिए अमेरिका ने आतंकवाद की रणनीति का इस्तेमाल किया। तब अमेरिका को पाकिस्तान की आवश्यकता पड़ी। पाकिस्तान ने ओसामा बिन लादेन से लेकर दुनिया भर के जिहादियों के लिए अपनी सरजमीं के दरवाजे खोल दिए। वहां आतंक की ट्रेनिंग लेकर जिहादियों ने अफगानिस्तान में सोवियत फौज को ऐसा घेरा कि 1990 के दशक में इतिहास के पन्नों से सोवियत संघ ही खत्म हो गया।

यह अमेरिका के लिए पाकिस्तान की इतनी बड़ी सेवा थी कि उसने जब अमेरिका से कश्मीर में आतंकवाद को जन्म देने की मंशा चाही, तो अमेरिका पाकिस्तान के इस गुनाह पर चुप होकर बैठ गया। बस पाकिस्तानी फौज को कश्मीर को आतंकी और जिहादी रणस्थल बनाने का मौका मिल गया। पाकिस्तानी फौज की समस्या यह थी कि 1971 में जब इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए, तो वहां की फौज भारत से डर गई। उसको यह डर पैदा हो गया कि भारतीय फौज अब बचे-खुचे पाकिस्तान पर भी आक्रमण कर उसको भी तोड़ सकती है। इस स्थिति से बचने के लिए पाकिस्तान ने कश्मीर घाटी में भारतीय फौज को एक ‘प्रॉक्सी वॉर’ में फांस दिया।

उधर कश्मीरी यह समझा कि उसे अब आजादी मिली, तब आजादी मिली। जबकि पाकिस्तान कश्मीरी आजादी में नहीं अपितु भारतीय फौज को फंसाने में दिलचस्पी रखता था। भारत के लिए यह चिंताजनक स्थिति थी। विभिन्न भारतीय सरकारों ने जब-जब पाकिस्तान के साथ शांति के प्रयास किए, तो पाकिस्तानी फौज ने आतंक के रास्ते हर प्रयास को विफल कर दिया। अंततः यह स्थिति आई कि मोदी सरकार ने पूरी ताकत झोंक कर अनुच्छेद 370 तो समाप्त किया ही, साथ ही जम्मू-कश्मीर का विभाजन कर उसका राज्य का दर्जा ही समाप्त कर दिया।

परंतु मोदी सरकार को कश्मीर में केवल आतंक समाप्त करने में दिलचस्पी नहीं है। वह ‘नए भारत’ के निर्माण में देश में संघ का हिंदुत्व का एंजेडा लागू करने में अधिक दिलचस्पी रखती है। अतः मोदी सरकार की दूसरी पारी के संसद के पहले सत्र में ही संघ का हिंदू राष्ट्र का एजेंडा पूरा करने का कार्य आरंभ हो गया। पहले तीन तलाक गया, फिर आरटीआई पर अकुंश लगा, साथ ही हिंदुत्व विरोधी आवाज उठाने वाली हर आवाज को कुचलने के लिए यूएपीए जैसे अधिनियम में संशोधन करके नागरिक आजादी पर अकुंश लगा दिया गया। सदन का सत्र समाप्त होने से पहले अंततः मोदी-शाह और डोभाल ने नागपुर को कश्मीर की भेंट दे दी। अब कश्मीर की किस्मत का फैसला श्रीनगर में नहीं, दिल्ली में होगा।

अब सवाल है कि आखिर कश्मीर का होगा क्या? पिछले आठ-दस वर्षों में अंतरराष्ट्रीय स्थिति फिर बदली है। 1980 के दशक में पाकिस्तान को उस समय जो ‘एडवांटेज’ था वह अब समाप्त हो चुका है। आज भारत इस स्थिति में है कि अंतरराष्ट्रीय ताकतें कश्मीर पर भारत के साथ खड़ी रहेंगी। भारत इस समय विश्व की तीसरी सबसे बड़ी विकासशील अर्थव्यवस्था है। भारत दुनिया का एक बहुत बड़ा मार्केट है, जहां सारे पश्चिमी देशों को अपना माल खपाना है। भला इस स्थिति में कोई भी देश क्यों कश्मीरियों और पाकिस्तानियों के साथ खड़ा होगा। रहा चीन का सवाल, तो उसके लिए भी भारत अरबों डॉलर का एक मार्केट है। चीन केवल चूं-चां करेगा। अंततः भारत के साथ खड़ा दिखाई पड़ेगा।

पाकिस्तान को भी यह बात भली-भांति समझ में आ रही है। पाकिस्तान के लिए युद्ध का रास्ता बंद हो चुका है। अंतरराष्ट्रीय स्थिति बदलने के कारण अब पाकिस्तान की आतंकी रणनीति खोटा सिक्का हो चुकी है। उधर अफगानिस्तान में जल्द ही तालिबान सरकार बनाने जा रहे हैं। अर्थात अफगानिस्तान में भी अमेरिका को पाकिस्तान की आवश्यकता बहुत कम हो चुकी है। ऐसे में अब पाकिस्तान, कश्मीर में ज्यादा छेड़छाड़ नहीं कर सकता। अर्थात कश्मीरी अब संपूर्णतया भारत के रहमोकरम पर है।

यह तो रहा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का लेखा-जोखा। परंतु हर प्रकार की राजनीति का एक मानवीय ‘पक्ष’ भी होता है। अंततः राजनीति का केंद्र मानव ही होता है। इस परिप्रेक्ष्य में कश्मीर का मानव पक्ष कश्मीरी है और अधिकांश कश्मीरियों का यह विचार है कि घाटी में जो कुछ हो रहा है वह उनकी स्वतंत्रता पर एक प्रहार है। आजादी एक ऐसा जज्बा है जो मनुष्य को कठिनतम परिस्थितियों में भी संघर्ष पर मजबूर करता है। मानव इतिहास ऐसी गाथाओं से भरा हुआ है। स्वाभाविक है कि यही इतिहास एक बार फिर कश्मीर में भी दोहराया जाएगा।

परंतु न तो पाकिस्तान और न ही अंतरराष्ट्रीय ताकतें कश्मीरियों के साथ खड़ी नजर आएंगी। तो फिर कश्मीरियों का होगा क्या! वही जो इस समय फिलिस्तिनियों का हश्र है। फिलिस्तिनी भी मौजूदा अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के बंदी हैं। उनके संघर्ष का दुनिया में कोई संगी-साथी नहीं। परंतु फिलिस्तीन अकेले पत्थर से अपनी लड़ाई लड़ रहा है। कश्मीरी भी हाथ में पत्थर तो उठा ही चुका है, वह उसी का प्रयोग करेगा और दशकों जान गंवाता रहेगा।

उधर नागपुर को कश्मीरी नहीं, कश्मीर चाहिए है। उसकी मंशा कश्मीर में कश्मीरी जनसंख्या घटाकर वहां हिंदू जनसंख्या बढ़ाना है। इसलिए भारतीय फौज की छत्रछाया में इजराइल की तरह भारतीय सरकार भी अब कश्मीर घाटी में नई बस्तियां बसाएगी। इस प्रकार धीरे-धीरे कश्मीर एक दूसरा फिलिस्तान बन जाएगा। जिसमें कश्मीर तो भारत के पास होगा, परंतु कश्मीरी कदापि अब कभी भारतीय न होगा। निःसंदेह यह एक मानव त्रासदी होगी। परंतु राजनीति में मानव त्रासदी की किसको परवाह।

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