विष्णु नागर का व्यंग्यः अब चोरी करो, नंगा नाचो और जाकर सत्ता के चरण छू‌ लो, फिर कुछ नहीं बिगड़ता

यही अमेरिका और भारत के बीच व्यापार समझौते की स्थिति है। चार दिन शोर मचेगा कि नरेन्दर ने 'होलसेल सरेंडर' कर दिया, फिर यह बवंडर भी थम जाएगा! नरेन्दर फिर छप्पन इंची हो जाएगा! जनरल एम एम नरवणे की किताब छपी या नहीं छपी, इस पर भी बहस खत्म हो जाएगी।

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विष्णु नागर

हमारा देश आजकल महान हुआ पड़ा है। पहले केवल नारों में 'महान' था, अब कार्य में 'महान' है। इतना अधिक 'महान है' कि यहां कुछ होकर भी कुछ नहीं होता। मसलन आजकल सेक्स कांड की एपस्टीन फाइल की चर्चा है। मंत्री हरदीप पुरी और उद्योगपति अनिल अंबानी का नाम साफतौर पर सामने आ चुका है, माननीय महामानव जी भी उसकी लपेट में आते से लग रहे हैं।चार दिन या एक हफ्ते इसकी चर्चा होगी या बीच-बीच में सुविधानुसार होती रहेगी, फिर ये झाग बैठ जाएंगे। पवित्र नदियों की तरह मल-मूत्र ढोकर भी ये भारतीय एपस्टीनिये गंगा जिस तरह 'निर्मल' हो चुकी है, ये भी 'निर्मल' हो जाएंगे!

यही अमेरिका और भारत के बीच व्यापार समझौते की स्थिति है। चार दिन शोर मचेगा कि नरेन्दर ने 'होलसेल सरेंडर' कर दिया, फिर यह बवंडर भी थम जाएगा! नरेन्दर फिर छप्पन इंची हो जाएगा! जनरल एम एम नरवणे की किताब छपी या नहीं छपी, इस पर दो-चार दिन और बहस होगी, मोदी जी, राजनाथ सिंह जी की भूमिका की थोड़ी और थू-थू हो जाएगी। ये थू-थू करवाने में एक्सपर्ट हैं। थू-थू करवाकर फिर ये आगे बढ़ जाएंगे! नया थू-थू प्रोग्राम शुरू कर देंगे! धंधा चलता रहना चाहिए। वोट की आमदनी होती रहनी चाहिए!

इनका मतलब किसी भी तरह सधना चाहिए, बाकी बेवजह थू-थू करना इन्हें भी खूब आता है बल्कि जितना इन्हें आता है किसी को नहीं आता! हां जिस उद्योगपति ने पिछले करीब बारह वर्षों में देश का खून पी रखा है, मांस पचा रखा है और डकार लेने तक का जिसने कष्ट नहीं किया है, बैंकों ने जिसे कर्ज दे-देकर, महामानव जी ने जिसे कर्ज दिलवा-दिलवाकर राष्ट्रीय ध्वज की तरह ऊपर उठा रखा है, उसकी तथाकथित 'प्रतिष्ठा' पर आंच नहीं आना चाहिए।

एक पत्रकार की लेखनी से 'आंच' आ गई तो पत्रकार एक साल के लिए जेल में है! इतना तो इस देश में पहले भी होता रहा है। अंतर यह है कि अब बुलेट ट्रेन की गति से हो रहा है और कल हवाई जहाज की गति से होना संभव है! सावधान, आगे यह अंतरिक्ष यान की गति से भी हो सकता है! उधर आप बीस साल भी अदालत में धक्के खाएं तो कुछ नहीं होता मगर इन्हें न्याय मिलने में देर नहीं लगती! न्याय इन्हें तश्तरी में सजा मिलता है!


तब भी कुछ नहीं हुआ था, जब पहली बार फ्रांस से राफेल लड़ाकू विमान खरीदने में छाती ठोककर घोटाला किया गया था। बेशक तब शोर हुआ था। भारत ही नहीं, फ्रांस में भी शोर हुआ था। इस शोर को किसी और शोर में डुबा दिया गया। उसकी फूली हुई लाश ऊपर कुछ समय तक तैरती रही! फिर उसे मछलियों खा गईं!

प्रधानमंत्री की डिग्रियां जाली होने की बात उठी, केंद्रीय सूचना आयोग ने इसकी सच्चाई उजागर करने के आदेश दिए। अंत में नतीजा यह निकला कि गुजरात उच्च न्यायालय ने सवाल उठाने वाले अरविन्द केजरीवाल पर 25 हजार रुपए का जुर्माना ठोंक दिया! इस तरह जिन्हें 'न्याय' मिलना पहले दिन से तय था, उन्हें 'न्याय' मिल कर रहा! सच सबको मालूम है मगर जब मामला सरकार बहादुर का हो तो फिर झूठ ही सच होता है!

कोरोना में मरने वालों की संख्या पर सवाल उठे, आक्सीजन की कमी से  मौतों पर सवाल उठे, हल्ला भी हुआ। फिर वह हल्ला अपनी जान बचाने के लिए कहीं ऐसा दुबका कि आज तक उसके मरने-जीने की खबर तक नहीं! अभी पीएम केयर्स फंड, राष्ट्रीय राहत कोष और राष्ट्रीय सुरक्षा कोष के बारे में संसद में सवाल उठाने से भी रोक दिया गया। कहा गया कि प्रधानमंत्री इन कोषों के सर्वेसर्वा हैं तो क्या हुआ, फिर भी ये सरकारी कोष नहीं हैं, स्वैच्छिक हैं!

वसूला गया होगा सरकारी कंपनियों-कारखानों से जमकर पैसा, सरकारी कर्मचारियों के वेतन से भी धन काटा गया होगा तो क्या? हम इस हजारों करोड़ रुपयों का हिसाब नहीं देंगे तो नहीं देंगे क्योंकि भारत में 'लोकतंत्र' है और 'लोकतंत्र' में  हमारा कोई कुछ कर नहीं सकता! एक पत्ता तक नहीं हिला! पत्ते भी लगता है कि हिलने-डुलने से डरने लगे हैं। हवा चलती है और ये हिलते तक नहीं! पत्तों का बुनियादी स्वभाव भी बदल चुका है। 'लोकतंत्र' में सबकुछ संभव है! वैसे भी मुमकिन वाली बात तो आपको ज्ञात ही है, उसे बार-बार क्या कहना!


हमारे यहां कुछ भी हो जाने पर कुछ न होने की परंपरा इतनी मजबूत हो चुकी है कि लगता है कि यही असली सनातन है। गर्व से कहो, हिंदू है। चौकीदार चोरी करता और करवाता है तो ऐसा आभास दिया जाता है कि जैसे स्वदेशी जागरण मंच का प्रोग्राम चल रहा है। कोई किसी को गो हत्या या गोमांस खाने के कथित अपराध में जान से मार देता है तो बताया जाता है कि अरे कुछ नहीं हुआ, विश्व हिंदू परिषद के नेता का जोशीला भाषण चल रहा है। राष्ट्रवाद का शंखनाद हो रहा है! विश्व में भारत का डंका बज रहा है। ताली-थाली बजाने का समय आ चुका है!

हमारे यहां सरकार के अंदर भ्रष्टाचार मिटाने के लिए लोकपाल की स्थापना हुई। मांग उनकी थी, जो आज भ्रष्टाचार कर रहे हैं। अब लोकपाल का पता ही तब चलता है, जब भ्रष्टाचार मिटाने के अत्यंत पवित्र और महान उद्देश्य के लिए लोकपाल की ओर से उसके सदस्यों के लिए लक्जरी कारें खरीदने का टेंडर दिया जाता है। लोकपाल फिर जोकपाल बनकर नमो-नमो करने लग जाता है! वोट चोरी का मुद्दा उठता है तो जवाब में सरकार पूरा का पूरा चुनाव आयोग ही चुरा लेती है! कर लो, जो कर सको!

भारत जोड़ो यात्रा निकलती है। हम जैसे अतिउत्साह में आ जाते हैं कि अब तो भारत बदल कर ही रहेगा। सांस में सांस फिर से आने लगेगी मगर बदलकर भी, कुछ खास नहीं बदलता! मनरेगा खत्म हो जाता है, 26 करोड़ गरीब मजदूरों की रोजी-रोटी पर बन आती है। इस पर चार-छह-आठ-दस लेख इधर-उधर छप जाते हैं। संसद में शोर मच जाता है और चूंकि संसद में शोर मचना स्वाभाविक सा बना दिया गया है तो इसे एक और शोर, एक और हंगामा मानकर इस सवाल को अवकाश दे दिया जाता है!

अब चोरी करो, बलात्कार करो, हत्या करो, नंगा नाचो और जाकर सत्ता के चरण छू‌ लो तो कुछ नहीं बिगड़ता बल्कि बिगड़ा हुआ सुधर जाता है। हिंदू राष्ट्र के स्पांसरों की ओर से भव्य जुलूस का आयोजन कर दिया जाता है। दिल्ली से कोई मंत्री आकर पीठ पर हाथ रखकर फोटो खिंचवा आता है! और मान लो गलती से, जेल हो ही गई तो वहां भी मजे रहते हैं और इतनी बार जेल से बाहर आने-जाने की छूट मिलती है कि इधर भी मौजां और उधर मौजां! च्वाइस उसकी है, जिसे जेल हुई है! फरलो और परोल जब भी वह चाहेगा, किसी के पिताजी और चाचाजी मिलकर भी नहीं रोक सकते!


भगवा धारण कर लो तो पुलिस आपकी छाया से भी डरेगी और गलती से छाया को छू ही लिया, पास आ ही गई तो सेल्यूट मार कर सादर साथ ले जाएगी! इस सदी के शुरू में हुए हत्याकांड के अपराधियों को हिंदू हृदय सम्राट द्वारा येन-केन-प्रकारेण छुड़वा लिया गया और अपराधियों को चिह्नित करने वाले जेल‌ भेज दिए गए!

यह नहीं कि इस देश में कुछ नहीं होता। होता है मगर अब जो भी होता है, भगतसिंह, गांधी, नेहरू और अंबेडकर की लाश पर कूदते-फांदते होता है!

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