असहयोग, सत्याग्रह, पदयात्रा: सामूहिक लामबंदी के लिए महात्मा गांधी के तौर-तरीकों से कदमताल

बीते 8 वर्षों के दौरान भारत बदल गया है। आज केंद्र में ऐसी सरकार है जो चंद व्यापारिक घरानों पर खास मेहरबान है और जिसने सोचे-समझे तरीके से उन सभी लोकतांत्रिक संस्थानों-संस्थाओं को कमजोर कर दिया है जिन पर कार्यपालिका के कामकाज पर नजर रखने की जिम्मेदारी थी।

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गणेश एन देवी

दमनकारी औपनिवेशिक शासन के खिलाफ लड़ने के गांधी के तरीके गुजरे वक्त की बात लग सकते हैं, लेकिन विरोध और प्रतिरोध के लिए उनकी शब्दावली में 'पदयात्रा' और 'सत्याग्रह', असहयोग और सविनय अवज्ञा जैसा बहुत कुछ है, जिसे आज हमें याद रखने की जरूरत है, और शायद आज के भारत के भीतरी शत्रुओं से मुकाबले के लिए उनका इस्तेमाल करने की जरूरत है जो भारत जोड़ो यात्रा से हो रहा है। 2 अक्टूबर को बापू की जयंती के मौके पर हमने कुछ बुद्धिजीवियों और जागरूक नागरिकों के विचार लिए हैं, जिसे हम आज आपके सामने सिलसिलेवार रूप से पेश करेंगे। बापू के शांतिपूर्ण लेकिन मजबूत प्रतिरोध करने, लोगों के मन को जीतने और उन्हें कदम से कदम मिलाकर चलने के तरीकों को याद कर हम आज महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि दे रहे हैं।

1942 उथल-पुथल वाला साल था। भारत में मुस्लिम लीग मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग कर चुकी थी और फिज़ा में सांप्रदायिकता का जहर घुल चुका था। यूरोप के युद्ध ने अन्य महाद्वीपों को अपनी जद में ले लिया था और अंग्रेज चाहते थे कि भारत युद्ध में उनका साथ दे। मार्च, 1942 में क्रिप्स मिशन को भारत भेजा गया। इसकी इस मांग पर पूरे देश में गुस्सा भड़क उठा कि भारत को युद्ध में अंग्रेजों की ओर से लड़ना चाहिए। यह गुस्सा खास तौर पर इसलिए था कि इस बारे में भारतीय नेताओं से राय-मशविरा नहीं किया गया था।

भारत के बाहर रास बिहारी बोस के नेतृत्व में इंडियन नेशनल आर्मी (आईएनए) का गठन किया गया था और उसी साल इसकी कमान सुभाष चंद्र बोस को सौंपी गई थी। हिटलर की सेना रूस के काफी अंदर तक घुस गई थी। जर्मन सेनापति रोमेल ने अफ्रीकी युद्ध-थियेटर में दुश्मन को रौंद दिया था। जून, 1942 में टोब्रुक में रोमेल ने दसियों हजार सैनिकों को बंदी बना लिया। हिटलर के आदेश से चेकोस्लोवाकिया के लिडिस गांव को को राख में बदल दिया गया।

4 जुलाई, 1942 को जर्मन बमवर्षक ने दुश्मन देशों के काफिले जिसका कोड नाम पीक्यू-17 था, पर ऐसा हमला बोला कि काफिला पूरी तरह छिन्न-भिन्न हो गया और हफ्तों तक 210 विमानों और 3,350 वाहनों सहित इसके 1,00,000 टन माल का अता-पता नहीं मिला। ऐसे हालात में कांग्रेस के भीतर तीखी बहस छिड़ गई कि आगे क्या रुख अपनाया जाए। कांग्रेस के समाजवादी गुट ने अपना एक अलग संगठन या दल बनाना जरूरी समझा। सिर्फ एक दशक पहले की कांग्रेस की स्थिति से यह बिल्कुल उलट था।

बात 1931 की है। उस कमजोर से दिखने वाले साबरमती के संत ने अंग्रेजों के आदेश के खिलाफ अहमदाबाद से दांडी तक की पैदल यात्रा की और इससे दुनियाभर को कांग्रेस की ताकत का अहसास कराया। उसके बाद सालों तक कांग्रेस अपने अहिंसक संघर्ष के जरिये पूरे भारत की युवा पीढ़ी को स्वराज के अपने विचार की ओर आकर्षित करती हुई ताकतवर होती गई। ठीक यही वे साल थे जब यूरोप में फासीवाद उफान पर था।


1933 में हिटलर सत्ता में आ गया था और जर्मनी की ब्रिटेन से कट्टर दुश्मनी को देखते हुए भारत के युवाओं के सामने फासीवाद की ओर मुड़ जाने की एक मजबूत वजह थी। लेकिन गांधीजी के प्रेरक नेतृत्व के कारण ऐसा नहीं हुआ। आरएसएस को छोड़कर किसी ने भी हिटलर के फासीवाद को स्वतंत्रता संग्राम के संभावित विकल्प के तौर पर नहीं देखा। तब भी नहीं जब शीर्ष नेताओं में मतभेद उभरे- उदाहरण के लिए, डॉ. आंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच के मतभेद को ही ले लें। यहां तक कि आजादी पाने के लिए यह विकल्प सुभाष चंद्र बोस के लिए भी नहीं था जिनके विचार गांधीजी से बिल्कुल अलग थे। सुभाष चंद्र बोस की दृष्टि में कोई नस्लीय भेदभाव नहीं था। आजाद हिन्द सेना में मुस्लिम, हिंदू, ईसाई तो कंधे से कंधा मिलाकर लड़े ही, इसमें महिलाएं भी पुरुषों से पीछे नहीं रहीं। विभिन्न मुद्दों पर परस्पर मतभेद के बाद भी देश के सभी बड़े नेताओं में इस बात पर अव्यक्त सहमति थी कि लोकतंत्र के रास्ते पर चलकर ही भारत के लोगों का भविष्य बेहतर हो सकता है।

1921 के दांडी मार्च से लगभग एक दशक पहले कांग्रेस नरमपंथियों और उग्रपंथियों के बीच के तीखे मतभेदों से बाहर निकल रही थी। बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल जैसे नेताओं की पीढ़ी फीकी पड़ गई थी। 1920 में गांधी ने लोगों से संपर्क करने और उन्हें कांग्रेस से जोड़ने के लिए भारत का व्यापक दौरा किया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन को इसके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने के लिए जरूरी है कि 1920 से 1942 के बीच कांग्रेस की यात्रा पर गौर करें, खास तौर पर 1931 के घटनाक्रम और इसके प्रभाव पर।

तब के संदर्भ और आज जिस संदर्भ में ‘भारत जोड़ो’ आंदोलन छिड़ा है, उसमें काफी समानता है। 2002 में कांग्रेस एनडीए सरकार की 'इंडिया शाइनिंग' की शोशेबाजी का मुकाबला करने में एकदम असहाय दिख रही थी। एक दशक बाद 2012 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम जिसे मनरेगा के नाम से जानते हैं, समेत शिक्षा का अधिकार और सूचना का अधिकार जैसे तमाम अभूतपूर्व कानून बनाने में कामयाब रही।


लेकिन पिछले आठ वर्षों के दौरान भारत एकदम बदल गया है। आज केन्द्र में ऐसी सरकार है जो चंद अति-समृद्ध व्यापारिक घरानों पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान है और जिसने बड़े ही सोचे-समझे तरीके से उन सभी लोकतांत्रिक संस्थानों को कमजोर कर दिया है जिन पर कार्यपालिका के कामकाज पर नजर रखने की जिम्मेदारी थी। मुख्यधारा का मीडिया सरकार का पिट्ठू बन गया है और संविधान ने जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी दे रखी है, वह जैसे महज यह याद दिलाते रहने के लिए है कि वास्तविक जीवन में उसके लिए कोई जगह नहीं। प्रवर्तन निदेशालय जैसी केन्द्रीय जांच एजेंसियों को ऐसे कानूनों से लैस कर दिया गया है जो उन्हें तलाशी लेने, जब्त करने, गिरफ्तार करने की बेलगाम ताकत देते हैं। 2014 के बाद से अल्पसंख्यकों के खिलाफ अभद्र भाषा और घृणा अपराधों में इतनी तेज वृद्धि हुई है कि आजादी के बाद इसकी कोई मिसाल नहीं मिलती।

भारत के बाहर युद्ध के बादल गहराते जा रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं आक्रामक इरादों और युद्धों को प्रभावी ढंग से रोकने में अक्षम दिख रही हैं। अफगानिस्तान में तालिबान का उदय, श्रीलंका में विद्रोह, भारत और उसके पड़ोसियों के बीच तनाव का बढ़ना, बेरोजगारी और गरीबी में तेज वृद्धि- ये सब ऐसे कारक हैं जो हिटलर के उदय की यादें ताजा कर रहे हैं। बीजेपी का बेलगाम दुष्प्रचार युद्ध और उग्र राष्ट्रवाद को बढ़ावा देना भी हमें उस समय की याद दिलाता है। विपक्षी खेमे में टूट-फूट और विपक्षी दलों की आंतरिक गुटबाजी भी 2022 को काफी हद तक 1942 के हालात के समान बना रही है।

हो सकता है कि ये समानताएं उतनी स्पष्टता के साथ नहीं दिख रही हों लेकिन अगर हम भविष्य में जाकर किसी सुविधाजनक बिंदु से 2022 की इस भारत जोड़ो यात्रा की समीक्षा करें, तो धुंधलका छंट जाएगा और ये समानताएं साफ-साफ दिखेंगी। 1942 में ‘करो या मरो’ के नारे के लगभग तुरंत बाद ही गांधी को गिरफ्तार कर लिया गया था। उनके साथ कस्तूरबा और महादेव देसाई को भी जेल ले जाया गया जहां दोनों की मृत्यु हो गई। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और इसकी तीन क्षेत्रीय समितियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया; एक लाख लोग जेल गए और लगभग इतने ही लोग आंदोलन जारी रखने के लिए भूमिगत हो गए। इसके पांच साल बाद भारत को आजादी मिली थी।

इसी समय अंतराल में इटली और जर्मनी में फासीवादी शासन की चूलें हिल गईं। 1942 तक दुनिया की सबसे ताकतवर सेनाओं की कमान संभालने वाले मुसोलिनी और हिटलर की 1947 में स्थिति यह हो गई कि उनका नाम घृणा के साथ ही लिया जाता था। 1942 में उपनिवेशवाद अपनी शोषक शक्ति के चरम पर था लेकिन 1947 तक यूरोपीय उपनिवेशवाद मध्यकालीन अंधकार युग के अवशेष की तरह दिखने लगा था।


1942 में भी गांधी के प्रतिरोध के तरीके से हर कोई आश्वस्त नहीं था, फिर भी उन्होंने करके दिखाया कि पिछले दशकों के दौरान क्या कुछ संभव था। उनके आलोचक सवाल करते थे कि आप अहिंसा और असहयोग से औपनिवेशिक ताकतों और फासीवादियों की सैन्य शक्ति से कैसे लड़ पाएंगे? ऐसी ही शंका आज भारत जोड़ो यात्रा को लेकर व्यक्त की जा रही है। सवाल दागे जा रहे हैं कि यह ताकतवर राजनीति का मुकाबला कैसे करेगी? लगातार निगरानी के जरिये लोगों को डराना-धमकाना कैसे रोकेगी? भय, झूठ, दुष्प्रचार को कैसे जड़ से उखाड़ सकेगी?

गांधी के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन और वर्तमान ‘भारत जोड़ो’ यात्रा में सतही तौर पर जितनी समानताएं दिखती हैं, वास्तव में उससे कहीं ज्यादा हैं। शायद दोनों की सबसे बड़ी समानता यह अहसास है कि आजादी के लिए प्रयास आम लोगों को करना होगा और इसके लिए जरूरी है जन-जागरण। राहुल गांधी ने जो गांधीवादी तरीके को अपनाया है, उसके पीछे उनका यह दृढ़ विश्वास है कि मौजूदा आर्थिक विषमताओं, सांप्रदायिक तौर पर लोगों को बांटने, लोकतांत्रिक संस्थानों के पतन के खिलाफ उनकी लड़ाई दरअसल आम लोगों की लड़ाई है। यह लोगों को निडर बनाने और उनके मन पर शासन की जकड़न को ढीला करने का तरीका है। यह वह तरीका है जिसने लोगों को आत्म-नियमन या स्वराज की ताकत सिखाई। इसने तब काम किया जब कोई उम्मीद नहीं थी। ऐसे में यह अब काम क्यों नहीं करेगा?

(गणेश एन देवी भाषाविद, शिक्षाविद और सांस्कृतिक कार्यकर्ता हैं)

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