प्रकृति को नेस्तनाबूद करते ही संस्कृति खुद-ब-खुद विलीन हो जाएगी, सिर्फ बचेगा बाजार !
घाटियों-पहाड़ों का खरबों साल का इतिहास बताता है कि वे बहुत पहले के हैं। सेपियन्स और आदि मानव से भी पहले के हैं। वे तो अपना रुख मोड़ लेंगे। मगर तब तक शायद हम नहीं बचेंगे।

माधव गाडगिल नहीं रहे। गाडगिल ने भारतीय पारिस्थिकी केन्द्र के संस्थापक और संचालक के रूप में गहन पर्यावरणीय काम किया। यह भी कह सकते हैं कि उन्होंने एक पूरी सदी की औपनिवेशिक पर्यावरणीय समझ को चुनौती दी। वन्य प्राणी अभ्यारण्य, नैसर्गिक विशिष्ट संरक्षित स्थान बनाना अपने आप में अंग्रेजी साम्राज्यवादी विस्तार की देन थी। प्रकृति और मानव समाज के लिए अलग-अलग रिहायशी इलाके तय करना उसी का भाग है, वरना सदियों से स्थानीय जन समूह प्रकृति के साथ प्राकृतस्थ होकर रहते रहे हैं। उनकी जीवन शैली में ऐसा कोई खाका नहीं है। आज भी सर्वाधिक वन संपदा उन्हीं इलाकों में है जहां जनसमूह की घनी आबादी है। उनकी संस्कृति प्रकृति में बसती है।
इस दौर में सत्तारूढ़ लोग संस्कृति के प्रति बड़ी चिंता जता रहे हैं। संस्कृति को भले ही कई पाश्चात्य मानवशास्त्री मिथक मानते हैं, संस्कृति इन मिथकों से भले पोषित होती है, पर संस्कृति ही सभ्यता की कहानियां कहती है, वह सभ्यता का ननिहाल है। सांस्कृतिक तजुर्बे को सहेजना हर देश के लिए जरूरी है। पर यह याद रखना चाहिए कि संस्कृति का बीज प्रकृति है। बिना प्रकृति के किसी तहजीब का कोई मायने नहीं है।
प्रकृति को नेस्तनाबूद करते ही संस्कृति खुद-ब-खुद विलीन हो जाएगी। शेष बचेगा बाजार। गंगा-जमुनियत पर थोपा जा रहा बाजार और एकाधिपत्य हमारी हिमालयी संस्कृति और प्रकृति की जड़ों को काट रहा है। यदि भारतीय उपमहाद्वीप की संस्कृति को समझना है तो पहले उसकी प्रकृति को समझना होगा। उस प्रकृति ने हमें पहचान दी है और सांस्कृतिक चेतना को पनपाया है। ख्याल रहे कि भारत के आबाद होने के बहुत पहले हमारी प्रकृति बन चुकी थी। पारिस्थिकी ढांचा तैयार होने लगा था।
आज हम वह देश हैं जहां दुनिया की सबसे पुरानी और सबसे छोटी पहाड़ी है। ऐसी नदियां हैं, जो बहुत छोटी है और ऐसी जो बहुत पुरानी। आज हमारी दोनों पहाड़ियों का अस्तित्व डगमगा रहा है। हमारे स्वार्थ और बाजार के कारण।
भारत की प्रकृति का भूगर्भीय इतिहास इतना सुंदर, पुराना और कौतूहल भरा है कि उसकी समय-सीमा की सहज कल्पना नहीं की जा सकती। अरावली की पहाड़ी तब बन चुकी जब भारत आज के भूगोल का भाग नहीं था। जब भारत, अफ्रीका, मेडागास्कर आदि एक साथ थे। यहां तक कि सबसे पुराने प्रायद्वीपों के बनने और बिछुड़ने से पहले वह बनने लगा था। अरावली की पहाड़ी तीन बिलियन साल की विरासत को संजोए हुए है जबकि प्राचीनतम प्रायद्वीप कोलंबिया, रोदिनिया और गोंडवाना भी बने-बिछुड़े नहीं थे। गोया कि यह सारे नाम भूगर्भ वैज्ञानिकों द्वारा दिए गए हैं। जब दो क्रेटनिक पत्थर समूह टकराए, तब अरावली की पहाड़ियां बनने लगीं। यह आज भी उतने साल पहले की भूगर्भीय निशान को धारण करती है।
अरावली पहाड़ की प्राचीनतम चगोस लखदीव चोटी का दक्षिणी हिस्सा अरब सागर में डूबा हुआ है। इसी चोटी पर लक्षद्वीप के मूंगा प्रवाल वलय बने हैं। उन पर मूंगा वलय दिखाई देते हैं। यानी अरावली की दक्षिणी चोटी पर ही लक्षद्वीप के प्रवाल हैं। कितनी हैरतंगेज बात है कि उत्तर भारत की एक निष्ठुर पर्वत श्रृंखला का दक्षिणी भाग प्रवाल समुद्री द्वीप में तब्दील हो गया। वह भी आज जलवायु परिवर्तन से जूझ रहा है। अरावली ही है जो उत्तर भारत को अनावश्यक बवंडर, मौसमी दबाव से बचाती है। हमारे तहजीब को तटस्थता प्रदान करती है।
ऐसी ही विरासत पश्चिम और पूर्वी घाटी की पर्वत श्रृंखलाओं की है। माधव गाडगिल ने अपने जीवन का लंबा समय पश्चिम घाटी को संवर्धित करने के जन प्रयास में बिताए। पश्चिम घाटी की ढलान और उठाव भारत के यूरेशियाई टकराव का नतीजा है। जब अरब सागर बन गया और हमारी पारिस्थिकी स्थान में आमूल परिवर्तन आया- करीब 200 से 150 मिलियन साल पहले। आज की पूर्व की ओर बहती पश्चिमी नदियां उस टकराव से भी पहले की जल व्यवस्था है। पूर्वी घाटी में आज भी पूर्वी अंटार्टिका के पहाड़ी चिन्ह और वानस्पतिक समताएं देखी जाती हैं।
हिमालय की पहाड़ी उसी भूगर्भीय टकराव का नतीजा है- सबसे शैशव अवस्था के पहाड़। ऐसे ही अंडमान के द्वीप समुद्री तल में दब चुके मलेशियाई पहाड़ श्रृंखला का हिस्सा हैं।
आज इन सब पर हमला जारी है। मानव इतिहास में एक तरफ स्वार्थवश तेजी से प्रकृति के दोहन की मिसाल है, तो दूसरी तरफ जन समूहों के द्वारा अपनी प्रकृति के साथ सौहार्दमय जीवन जीने के भी अनेक उदाहरण हैं। जल, जंगल, जमीन के साथ के अंतर्संबंध निसर्ग को जीवंत रखते हैं। वन विभाग के बजाय जन समूह के जरिये वन संवर्धन की पहल माधव गाडगिल जी का बड़ा योगदान था। हालांकि व्यावसायिक चाय काफी बागान मालिकों ने उनकी रिपोर्ट को लागू होने नहीं दिया। उसकी गहन आलोचना हुई, उन्हें जन विरोधी कहा गया। मगर उनकी अपनी प्रतिबद्धता विज्ञान और पर्यावरण को लोकोन्मुखी बनाने पर अडिग रही।
जब पर्यावरण की बात आती है, तब यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि बात पर्यावरण बचाने की नहीं है। इन सब घाटियों-पहाड़ों का खरबों साल का इतिहास यह बताता है कि वे इतिहास से बहुत पहले के हैं। सेपियन्स और आदि मानव से भी पहले के हैं। उनके सामने भौतिकी, रसायनिकी और जीव विज्ञान पनपे। वे इस धरती के पहले-पहल निवासी हैं। तो वे अपना ख्याल रख लेंगे, अपने को बदल लेंगे, अपना रुख मोड़ लेंगे। मगर तब तक शायद हम नहीं बचेंगे।
गाडगिल इस बात को पक्के तौर जान गए थे और इसलिए निरंतर जन समूहों के साथ वानिकी को समझने-सहेजने में लगे रहे। आज के घोर संकट काल में यही एकमात्र रास्ता है कि जन समुदाय के नैसर्गिक विवेक के साथ अपने को बचाया जाए। अरावली पश्चिम पूर्वी घाटी हिमालय तो खुद को बचा ही लेंगे। धरती अपने को मोड़ ही लेगी। वरना संस्कृति को विकृति होने से कोई नहीं बचा पाएगा।
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